भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १३ ] मनोहरकाण्डम् ७१५

अद्वैतानन्दचैतन्यशुद्धसत्त्वैकलक्षणः । बहिराः सुतीक्ष्णात्र रामचन्द्रः प्रकाशते ॥ ५० ॥ सत्त्वविद्यार्थिनो नित्यं रमते चित्सुखात्मनि । इति रामपदेनाभौ परब्रह्मभिधीयते ॥ ५१ ॥ जय रामेति यन्नाम कीर्तयन्ननिशं नयेत् । सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम् ॥ ५२ ॥ श्रीरामेति परं मन्त्रं तदेव परमं पदम् । तदेव तारकं विद्धि जन्ममृत्युभयापहम् । श्रीरामेति वदन् ब्रह्मभावमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ५३ ॥ अस्य श्रीरामकवचस्य अगस्त्यऋषिः अनुष्टुप्छन्दः सीताक्ष्मणोपेतः श्रीरामचन्द्रो देवता श्रीरामचन्द्रप्रसादसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः । अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि सर्वाभीष्टफलप्रदम् । नीलजीमूतसङ्काशं विद्युद्वर्णाभ्वरावृतम् ॥ ५४ ॥ कोमलाङ्गं विशालाक्षं पुन्नामनिगुन्दुरम् । सीतासौमित्रिसहितं जटामुकुटधारिणम् ॥ ५५ ॥ सासितूणधनुर्बाणपाणि दानवमर्दनम् । सदा चोरभये राजभये शत्रुभये तथा ॥ ५६ ॥ ध्यात्वा रघुपतिं युद्धे कालानलसमप्रभम् । चीरकृष्णाजिनधरं भस्मोद्धूलितविग्रहम् ॥ ५७ ॥ आकर्णाकृष्टसशरकोदण्डञ्चमडितम् । रणे रिपून् रावणादींस्तीक्ष्णमार्गद्वृष्टिभिः ॥ ५८ ॥ महद्रथं महावीरसुग्रीवेन्द्रव्यपस्थितम् । लक्ष्मणायंर्महद्वीरैर्वृतं हनुमदादिभिः ॥ ५९ ॥ सुग्रीवार्यभदावीर्यैः शैलवृक्षकरोद्यतैः । दैत्यान्करालहुङ्कारैर्भुम्डुकारमहारवैः । ६० ॥ नदद्भिः परिपादाद्भिः समरे रावणं प्रति । श्रीराम शत्रुमपान्ये हन मर्दय खादय । ६१ ॥ भूतप्रेतपिशाचादीन् श्रीरामाशु विनाशय । एवं ध्यात्वा जपेद्रामकवचं सिद्धिशायकम् ॥ ६२ । सुतीक्ष्ण यच्चकवचं श्रृणु वक्ष्याम्यनुत्तमम् । श्रीरामः पातु मे मूर्ध्नि पूर्वं च रघुवंशजः ॥ ६३ ॥ दक्षिणे मे रघुवरः पश्चिमे पातु पावनः । उत्तरे मे रघुपतिर्भालं दशरथात्मजः ॥ ६४ ॥

मुनीक्षण ! सुनिए, मैं आज सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाला रामकवच बतलाऊँगा ॥ ४९ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! इस संसारके बाहर-भीतर सब व्योमोर व अद्वैत, आनन्दस्वरूप, शुद्ध और सत्त्वगुणमय रामचन्द्रजी प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ५० ॥ परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखनेवाले लोग जिसके चिन्मयरूप आनन्द लूटते हैं, वे ही परब्रह्म 'राम' इस नामसे पुकारे जाते हैं ॥ ५१ ॥ जो मनुष्य 'जय राम' इस मन्त्रका कीर्तन करता है, वह सब पापोस छूटकर विष्णुभगवान्के परम पदको प्राप्त होता है । ५२ ॥ श्रीराम यह सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है, यह परमपद है, यह मृत्यु-भय आदिको दूर कर देता है और 'श्री राम' कहता हुआ प्राणी परब्रह्मको प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। विनियोगके बाद सब कामनाओंका पूर्ण करनेवाला ध्यान बतला रहा हूँ। जिनका नील मेघके समान श्याम शरीर है, जो बिजलीके समान चमकते हुए पीले वस्त्रको धारण किये हुए हैं, जिनके कोमल अङ्ग हैं, बड़ी-बड़ी आंखें हैं, जो अतिशय सुन्दर और पुष्ट हैं, जिनके साथ सीता और लक्ष्मण विद्यमान हैं, जो जटा-मुकुट धारण किये हैं, तलवार, तरकस, धनुष-बाण हाथमें लिये हैं और जो दानवोंका संहार करते हैं। मनुष्यको चाहिए कि राजभय, चोरभय और संग्रामका भय आ जाय तो कालानलके समान क्रुद्ध रामचन्द्रजीका ध्यान करे। जो पीताम्बर तथा कृष्णमृगचर्म धारण किये हैं और धूलिसे जिनका शरीर धूसरित हो रहा है ॥ ५३-५७ । कानतक जिन्होंने धनुषकी डोरी खींच रक्खा है संग्रामभूमिमे रावण आदि राक्षसोंपर जो तीक्ष्ण बाणवृष्टि कर रहे हैं ॥ ५८ ॥ इन्द्रके रथपर बैठे जो महावीर शत्रु का संहार करनेमें लगे हुए हैं और जो लक्ष्मण हनुमान्जी आदि वीरोंसे घिर हुए हैं ॥ ५९ ॥ जिनके साथ सुग्रीव वादि योद्धा हाथमें पाषाणखण्ड और बड़े-बड़े वृक्ष लिये शत्रुओंका संहार कर रहे हैं। ऐसे हे राम ! इसको मारो—इसको खा-जाओ और भूत प्रेत, पिशाच आदिको नष्ट कर दो। इस प्रकार रामचन्द्रजीका ध्यान करके सिद्धिदायक रामकवचका जप करे ॥ ६० । ६१ । ६२ ॥ अगस्त्यजी कहते हैं कि हे सुतीक्ष्ण ! मैं अतिशय उत्तम रामकवच कहता हूँ। श्रीराम मेरे मस्तक और पूर्व दिशाकी रक्षा करें। दक्षिणकी ओर रघुवर तथा

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