श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 731, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३ |
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तं वेदशास्त्रपरिनिष्ठितशुद्धबुद्धिं शर्मप्रदं सुरमुनीन्द्रनुतं कपीन्द्रम् ।
कृष्णत्वचं कनकपिंगजटाकलापं व्यासं नमामि शिरसा तिलक मुनीनाम् ॥३८॥
य इदं प्रातरुत्थाय पठेत् कवचं सदा । आयुरारोग्यसंतानैस्तस्य स्तुत्यः स्तवो भवेत् ॥३९॥
एवं गिरीन्द्रजे श्रीमद्धनुमत्कवचं शुभम् । त्वया पृष्टं मया प्रीत्या विस्तराद्विनिवेदितम् ॥४०॥
श्रीरामदास उवाच
एवं शिवमुखाच्छ्रुत्वा पार्वती कवचं शुभम् । हनूमतः सदा भक्त्या पपाठ तन्मनाः सदा ॥४१॥
एवं शिष्य त्वयाऽप्यद्य यथा पृष्टं तथा मया । हनूमत्कवचं चेदं त्वदग्रे विनिवेदितम् ॥४२॥
इदं पूर्वं पठित्वा तु रामस्य कवचं ततः । पठनीयं नरैर्भक्त्या नैकमेकं पठेत्कदा ॥४३॥
हनुमत्कवचं चात्र श्रीरामकवचं विना । ये पठन्ति नराश्चात्र पठनं तद्वृथा भवेत् ॥४४॥
तस्मात्सर्वैः पठनीयं सर्वदा कवचद्वयम् । रामस्य वायुपुत्रस्य मद्भक्तैश्च विशेषतः ॥४५॥
इति हनुमत्कवचम्
अथ रामकवचम्
इदानीं रामकवचं शृणु शिष्य वदामि ते । परं गुह्यं पवित्रं च सर्ववांछितपूरकम् ॥४६॥
सुतीक्ष्णस्त्वेकदाऽगस्तिं प्रोवाच रहसि स्थितम् ।
भगवन् परमानन्द तत्त्वज्ञ करुणानिधे । गुरो त्वं मां वदस्वाद्य स्तोत्रं रामस्य पावनम् ॥४७॥
आजानुबाहुमरविन्ददलायताक्षमाजन्मशुद्धरमहारवपुष्प्रसादम् ,
श्यामं गृहीतनिशचापमुदाररूपं रामं सशरमभिरामनुस्मरामि ॥४८॥
शृणु वक्ष्याम्यहं सर्वं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम । श्रीरामकवचं पुण्यं सर्वकामप्रदायकम् ॥४९॥
रहा हूँ, वह काम पूरा हो जाय ॥ ३५ ॥ ऐसा कहकर जो किसी दूसरे गाँवको जाता है, वह कुशलपूर्वक अपना काम पूरा करके शीघ्र लौटता है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीके कहनेपर रावणके भ्राता विभीषण परम प्रसन्न हुए । उन्होंने रामके चरणोंकी वन्दना की और सपरिवार अपनेको धन्य माना ॥ ३७ ॥ समस्त वेदों और शास्त्रोंमें जिनकी बुद्धि प्रविष्ट है, देवता तथा मुनिगण जिनकी वन्दना करते हैं, ऐसे शुभदाता हनुमान्जी और जिनके शरीरकी त्वचा कृष्णवर्णकी है, सुवर्णके समान पीली जिनकी जटा है, ऐसे मुनियोंके अग्रणी श्रीव्यासजीको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ३८ ॥ जो मनुष्य सवेरे उठकर सदा इस कवचका पाठ करता है, उसे आयु आरोग्य और सन्तान आदि सब वस्तुय प्राप्त हो जाती हैं और सब लोग उसकी स्तुति करने लग जाते हैं ॥ ३९ ॥ हे गिरीन्द्रजे ! जैसा तुमने प्रश्न किया, उसके अनुसार मैंने तुम्हें हनुमत्कवच बतलाया ॥ ४० ॥ श्रीरामदास कहते हैं—हे शिष्य ! इस तरह शिवजीके मुखसे हनुमत्कवच सुनकर पार्वतीजीन उसी दिनसे तन्मयताके साथ उसका पाठ आरम्भ कर दिया ॥ ४१ ॥ जैसे तुमने पूछा, मैंने भी तुमको हनुमत्कवच कह सुनाया ॥ ४२ ॥ पहले इसका पाठ करके ही भक्तिपूर्वक श्रीरामकवचका पाठ करना चाहिये । अकेले किसी भी कवचका पाठ न करे ॥ ४३, जो लोग हनुमत्कवचका पाठ किये बिना रामकवचका पाठ करेंगे, उनका वह पाठ व्यर्थ हो जायगा ॥ ४४ ॥ इस लिए सब लोगोंको चाहिए कि सदा दोनो कवचोंका पाठ किया करें । रामके भक्त तो इस बातपर विशेष ध्यान रक्खें ॥ ४५ ॥ हे शिष्य ! अब तुमको रामकवच बतलाता हूँ । यह भी परम गोप्य, परम पवित्र और सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाला कवच है ॥४६॥ एक बार सुतीक्ष्णने अपने गुरु अगस्त्यको एकान्तमे देखकर कहा हे भगवन् ! हे परमानन्ददाता ! हे तत्त्वज्ञ ! हे करुणानिधे ! आज हमें श्रीरामचन्द्रजीका कोई पुनीत स्तोत्र सुनाइए ॥ ४७ । अगस्त्यने कहा कि आजानुपर्यन्त जिनकी बाहु हैं, कमलदलके समान जिनके विशाल नेत्र हैं, जन्मसे ही जिनका प्रसन्नमुख है, जिन्होंने धनुष और बाणको धारण कर रक्खा है, जिनका उदार रूप है, ऐसे अभिराम रामका मै ध्यान करता हूँ ॥४८॥ हे मुनिसत्तम