श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 739, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें७२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १४
दानेन सदृशानीह तानि सर्वाणि भूसुर। स्तोत्राणामुत्तमं चेदं भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥५८॥ एवं सुतीक्ष्ण ते प्रोक्तमष्टोत्तरशतं शुभम्। सीतानाम्नां पुण्यदं च श्रवणान्मङ्गलप्रदम् ॥५९॥ नरैः प्रातः समुत्थाय पठितव्यं प्रयत्नतः। सीतापूजनकालेऽपि सर्ववाञ्छितदायकम् ॥६०॥ अन्यत्सीतातोषदानि व्रतादीनि महान्ति च। यानि संत्यत्र ते शिष्य तानि सम्यग्वदाम्यहम् ॥६१॥ नारीभिस्तु सदा कार्यं सीतायास्तुष्टिहेतवे। वसन्तशीतलागौरीस्नानं तथै तु तत्कृते ॥६२॥ यत्र सीताकृतं तीर्थं रामतीर्थं न वर्तते। तथा लक्ष्म्याश्च गौर्याश्च सरस्वत्यादियोषिताम् ॥६३॥ तीर्थेषु च सदा कार्यं तदभावे नदीषु च। यत्र यत्र रामतीर्थं तद्वामे जानकीकृतम् ॥६४॥ ज्ञेयं तीर्थं तु सर्वत्र नैकं ज्ञेयं तु राघवम्। वसन्तशीतलागौरीस्नानं सौभाग्यवर्धनम् ॥६५॥ न कुर्वन्त्यथ या नार्यः स्नानन्ताः सप्तजन्मसु। भवन्ति विधवास्तस्मात्सदा स्नानं समाचरेत् ॥६६॥
सुतीक्ष्ण उवाच भो गुरो शीतलागौरीस्नानस्योद्यापनं कथम्। स्त्रीभिः कार्यं वदस्वाद्य सविस्तारं शुभावहम् ॥६७॥
अगस्तिरुवाच सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सुतीक्ष्ण शृणु सादरम्। चैत्रमासे सिते स्त्रीभिस्तृतीयायाः षडाह्न वै ॥६८॥ कार्यं तु शीतलागौरीस्नानं त्रिंशद्दिनानि हि। वैशाखस्य सिते पक्षे द्वितीयायामुपोष्य च ॥६९॥ स्त्रीभिश्च विधिना कार्यं निशायामधिरोचनम्। पूर्वोक्तञ्च प्रकर्तव्यं मण्डपादिकमुत्तमम् ॥७०॥ तत्र रघूनामपदमष्टोत्तरसहस्रकम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं वृक्षाणान्यन्यानि वा क्रमात् ॥७१॥ स्थापनीयं मध्यदेशे तन्मध्ये पद्मजोपरि। धान्यराशिं तोयपूर्णः स्थापनीयो घटः शुभः ॥७२॥ तन्मुखे ताम्रपात्रं च स्थापनीयं तु विस्तृतम्। आच्छाद्य पात्रं कौशेयवस्त्रेण तन्मनोरमम् ॥७३॥ तस्मिन्सीतारामयोश्च द्वे मूर्ती रूपविनिर्मिते। स्थापनीये पूजनीये षोडशैरुपचारकैः ॥७४॥ नवमाषात्मको रामः सीताऽष्टमाषनिर्मिता। निजशक्त्याऽथवा कार्ये द्वे मूर्ती रजतस्य वा ॥७५॥
बराबर नहीं हो सकते । यह स्तोत्र सब स्तोत्रोंमें उत्तम तथा भुक्ति-मुक्तिदायक है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! इस तरह मैंने तुमसे सीताजीका अष्टोत्तरशतनाम कहा, जो पुण्यदायक और सुननेसे मङ्गलदाता है ॥ ५९ ॥ लोगोंका चाहिय कि रोज सबेरे उठकर और सीताका पूजन करके अवश्य इसका पाठ करें । ऐसा करनेसे उनके कामनाएं पूर्ण हो जायँगी । इसके अतिरिक्त और भी बहुतसे ऐसे व्रत आदि हैं, जिनसे सीताजी प्रसन्न हो सकती हैं। हे शिष्य ! उन्हें आज मैं तुम्हें बतलाता हूँ । ६० । ६१ ॥ सीताजी- को प्रसन्न करनेके लिए स्त्रियोंको चाहिए कि सीताके द्वारा स्थापित किसी भी तीर्थमें जाकर शीतलागौरीका व्रत करे ॥ ६२ ॥ यदि आसपास कोई सीताकृत न हो तो लक्ष्मी, गौरी तथा सरस्वती आदि किसी भी देवीके तीर्थमें उक्त जप करें । यदि वह भी न हो तो किसी नदीके तटपर जाकर व्रत करें । जहाँ-जहाँ रामतीर्थ है, उसके वामभागमें सीतातीर्थ अवश्य रहता है। कहींपर भी अकेला रामतीर्थ नहीं रहता । वसन्तशीतला गौरी नामक व्रत स्त्रियोंका सौभाग्य बढ़ाता है ॥ ६३ ६४ ॥ जो स्त्रियां इस व्रतको नहीं करतीं, वे सात जन्म तक नष्ट विधवा रहकर जीवन बिताती हैं। इससे स्त्रियोंको सदा शीतलागौरीका स्नान करना चाहिए ॥ ६६ ॥ सुतीक्ष्णने कहा-हे गुरो ! इस शीतला गौरीका स्नान करनेके अनन्तर इसका उद्यापन कैसे करना चाहिए। सो मुझे आप विस्तारपूर्वक बताइए । ६७॥ अगस्त्यजीने कहा-हे शिष्य सुतीक्ष्ण ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सुनो। चैत्रशुक्ल तृतीयासे लेकर तीस दिनतक शीतलागौरीका स्नान करें और वैशाख शुक्ल द्वितीयाको उपवास करके रात्रिके समय पूर्वोक्त विधिके अनुसार मण्डप आदि बनावे ॥ ६८-७० । उसमें अष्टोत्तरसहस्रात्मक रघूनामतोभद्र, षष्टीत्तरशतात्मक या और कम संख्याका भद्र बनाकर उसके मध्यमें कमलपर धान्यराशि रखकर जलसे भरा घट स्थापित करे । ७१ ॥ ७२ । कलशके मुखपर एक बड़ा-सा ताम्रपात्र रक्खे और उसको रेशमी वस्त्रसे ढांक दे ॥ ७३ ॥ उसपर सुवर्णकी बनी हुई सीता