भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 740, कुल 811 में से

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पृष्ठ 740

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७२३

गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यवसनादिकम् । सर्वं पृथगष्टविधं जानक्यै तु निवेदयेत् ॥७६॥ ततः स्त्रीभ्यो वायनानि वस्त्रालंकारसंयुभिः । कुंकुमादिपूरितानि देयानि विविधानि च । ७७॥ देयानि कांस्यपात्राणि पक्वान्नपूरितानि च । त्रयस्त्रिंशत्तथा ऽष्टाविंशतिर्देयानि शक्तितः । ७८॥ त्रयस्त्रिंशच्च युग्मानि भोजयेच्च प्रयत्नतः । अथवा ऽष्टौ यथाशक्त्या भोजनीयानि पट्टशैः । ७९॥ रात्रौ जागरणं कार्यं गीतवाद्यादिमङ्गलैः । प्रातःकाले तृतीयायां स्नात्वा सम्पूज्य जानकीम् ८०। होमश्चापि प्रकर्तव्यः सीतामन्त्रेण यत्नतः । तिलाज्यैः पायसैश्चापि सहस्राण्यष्टभूसुरैः । ८१॥ मुद्गहीनं नवान्नं च ज्ञेयमशानमुत्तमम् । तन्मीतातोपदं ज्ञेयं तेन वा जुहुयात्सुखम् ॥८२॥ ततः स्वयं सुहन्मित्रैर्भुक्त्वा च यथासुखम् । एवमुद्यापनविधिस्तत्राग्रे विनिवेदितः ॥८३॥

श्रीरामदास उवाच

अगस्तिना सुनीथाय यदिदं कथितं पुरा । तत्सर्वं च त्वया पृष्टं मया तेऽद्य निवेदितम् ॥८४॥

विष्णुदास उवाच

कथं रमारामभद्रं कार्यं स्त्रीभिः प्रपूजने । तत्सर्वं विस्तरेणाद्य कथयस्व महाप्रभो । ८५॥

श्रीरामदास उवाच

यथा प्रोक्तं मया शिष्य रामतोभद्रमुत्तमम् । कार्यं रमारामभद्रं तथैव सकलं शुभम् ॥८६॥ किंचिद्विशेषस्तत्रास्ति नवभ्यः षट्पदाष्टकम् । लिंगस्थलेषु कर्तव्या वापिकाश्चैव पूर्ववत् ॥८७॥ मुद्रायामेव किंचिच्च विशेषोऽस्ति शृणुष्व तम् । नकारश्च मकारश्च पर्यटन्नूर्ध्वमेवचः ॥८८॥ ऊर्ध्वं रमेश्वक्षरे द्वे रचनीये तु पूर्ववत् एवं कृत्वा रमानाम् क्षेत्रवर्णं निरीक्षयेत् ॥८९॥ एतद्रमारामभद्रं देवानां पूजनादिषु । नानाकर्मसु सर्वेषु कर्तव्यं च प्रयत्नतः ॥९०॥ विना रमारामभद्राद्यानि देव्याः कृतानि हि । पूजनादीनि कर्माणि तानि ज्ञेयानि मानवैः ॥९१।


और रामकी दो मूर्ति रख और पाद्यप्रचारसे उनका पूजा करे ॥ ७४ ॥ मूर्तियोंमे नौ मासे सुवर्णसे रामकी और आठ मासे सुवर्णसे सीताकी मूर्ति बनवावे । यदि ऐसा न हो सके तो अपनी शक्ति अनुसार चाँदी-की दो प्रतिमाएं बनवा ले ॥ ७५ ॥ इसके अनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा आठ प्रकारके वस्त्र आदि सीताको अर्पण करे ॥ ७६॥ इसके बाद वस्त्र-अलंकार आदि वस्तुय तथा कुमकुम आदिके साथ विविध प्रकारके बायन दे ॥ ७७॥ तदनन्तर तरह-तरहके पक्वान्नसे भरकर तेतीस, आठ अथवा तीन कांस्यपात्र अपण करे ॥ ७८ ॥ इसके बाद तेतीस बाह्मणदम्पती, आठ ब्राह्मण अथवा जैसी अपनी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार ब्राह्मणदम्पतियोंको भोजन कराये । ७९ ॥ रात्रिभर गीत-वाद्य आदि मङ्गलमय कार्य करता हुआ जागरण करे । तृतीयाको प्रातःकाल स्नान करके जानकीजीका पूजन करे और तिल, घो तथा खीरसे आठ ब्राह्मणोंके साथ सीतामन्त्रसे होम करे ॥ ८० ॥ ८१ ॥ मूंगको छोड़कर अन्य नौ प्रकारके अन्न सीताजीको बहुत प्रिय हैं यदि हो सके तो उन्होंसे हवन करे ॥ ८२ । इसके बाद अपने हित मित्रोदिके साथ सुखपूर्वक भोजन करे । इस तरह उद्यापनविधि मैने तुमसे कही ॥ ८३ । श्रीरामदासने कहा-तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैने यह सब बातें कह दीं, जो सुनीथजीको अगस्त्यजीने बतलायी थीं ॥ ८४ । विष्णुदासने कहा कि जब स्त्रियां पूजन करने लगें तो रमारामक भद्रकी रचना किस प्रकार करें । वह आप हमें विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ ८५ ॥ श्रीरामदासने कहा-पहले मैने जो रामतोभद्र रचनाकी विधि बतायी है, ठीक उसी तरह रमारामतोभद्रकी भी रचना होगी ॥ ८६ ॥ ८७॥ इसकी मुद्रामें थोड़ासो विशेषता है । सो मैं तुमको बताये देता हूँ, सुनो । वकार और मकार ये दोनों पहलेकी ही तरह निचले भागमें बनावे ॥ ८८ ॥ ऊपर रना इन दो अक्षरोंको भी पहले ही की तरह रचना करे। ऐसा कर लेनेके बाद रमा इस नामका भद्रके इर्दत भागम उथड़ा देखे । ८६ ॥ देवी आदिकी पूजाके अवसरपर अथवा और-और प्रकारके शुभ कर्ममे प्रयत्न करके इस रमानामनो भद्र-

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