भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् १४३

सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् १४३

एवं नानोत्सवास्तत्र बभूवु रामवेश्मनि । अथ ते बालकाः सर्वे स्यन्दनादिषु संस्थिताः ॥१३०॥ दिव्यवस्त्राणि चित्राणि परिधाय समंततः । अयोध्याराजमार्गेषु हट्टेषु च चतुष्पथे ॥१३१॥ आरामोपवनारण्यवाटिकासु नदीतटे गमनागमने चक्रुः सेनया मंत्रिबालकैः ॥१३२। एवं साकेतनगरे बालकैः सीतया सुखम् । रेमे स बंधुभिर्युक्तश्चिरं राजा रघूद्वहः ॥१३३। एवं शिष्य मया प्रोक्तं जन्मकांडमिदं तव । कुशादीनां च जन्मानि वर्णितान्यत्र विस्तरात् ॥१३४॥ रम्यं पवित्रमानंददायकं च मनोहरम् । पुत्रपौत्रप्रदं जन्मकांडमेतत्सुखावहम् ॥१३५॥ जन्मकांडमिदं पुण्यं ये शृण्वंति नरोत्तमाः । तेषां पुत्रैश्च पौत्रैश्च वियोगो न भविष्यति ॥१३६॥ जन्मकांडमिदं ये भक्त्या शृण्वंति मानवाः । तेषां स्त्रीणां वियोगो हि न कदाप्यत्र जायते ॥१३७॥ जन्मकांडमिदं पुण्यं याः शृण्वंत्यत्र वै स्त्रियः । स्वभर्तृभिर्वियोगं ता न गच्छंति यथा रमा ॥१३८। ग्रामं देशान्तरं तीर्थं ये गताश्चिरं नराः । तेषामागमनार्थे हि जन्मकांडं पठेदिदम् ॥१३९। येषां भावीनि कार्याणि लब्धुं त्वरयते मनः । तैनरैः पठनीयं वै जन्मकांडं दिने दिने ।१४०॥ पूर्वे दिने चैकवारं द्विवारं चापरे दिने । एवं नवदिनं वृद्धिन्नयैकं क्षयोऽपि हि ।१४१। कार्यो नरैः स्वस्थचित्तैस्तेषां कार्यं भविष्यति । वर्षमेकं पठेद्भक्त्या ह्यपुत्रोऽपि लभे सुतम् ॥१४२॥ पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । इष्टान् कामांश्च कल्याणं जन्मकाण्डश्रवणालभेत् ॥१४३॥


इस तरह रामचन्द्रजीके भवनमे अनेक प्रकारके उत्सव हुए । वे सब रथ, हाथी, घोड़े आदि सवारियोंपर सवार हो-होकर बगीचे, उपवन, वन तथा नदीतट आदिपर अयोध्याके चौराहों तथा बाजारमें अनेक प्रकारके वस्त्र-आभूषण पहनकर मन्त्रियोंके लड़कोंके साथ आने जाने लगे ॥ १२६-१३२ ॥ इस तरह उस साकेतपुरमें उन बालकों तथा सीताके साथ आनन्दपूर्वक रामचन्द्रजी रहने लगे । हे शिष्य ! यह जन्मकाण्ड मैंने तुम्हें सुनाया । जिसमें कुश आदि बालकोंकी विस्तृत जीवनी वर्णित है । १३३ ॥ १३४ ॥ यह जन्मकाण्ड परम रम्य आनन्ददायक, मनोहर, सुखसौभाग्यका देनेवाला और पुत्र पौत्रादिका दाता है । जो लोग जन्मकाण्डको सुनते हैं, उनका कभी अपने पुत्रपौत्रादिके वियोगका दुःख नहीं उठाना पड़ता । जो लोग भक्तिपूर्वक इस जन्मकाण्डका श्रवण करते हैं, उनका अपनी स्त्री का भी वियोग कभी नहीं होता । यदि स्त्रियां इसे सुनती हैं तो उन्हें अपने स्वामीसे कभी वियुक्त नहीं होना पड़ता बल्कि लक्ष्मीके समान वे जन्मभर आनन्दसे अपना जीवन बिताती हैं ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ यदि किसीके परिवारका कोई मनुष्य किसी तीर्थ या परदेशको चला गया हो तो उस लोगनके लिए इस जन्मकाण्डका पाठ करना चाहिए । जिसको अपना कोई भावी कार्य सिद्ध करना हो उसको चाहिए कि पहले दिन एक बार, दूसरे दिन दो बार, तीसरे दिन तीन बार, इस क्रमसे बढ़ाते-बढ़ाते नवें दिन नौ बार जन्मकाण्डका पाठ करे । नवें दिनसे एक-एक पाठ घटाता हुआ फिर नवें दिन केवल एक पाठ करे । इस तरह यदि स्वस्थचित्तसे इसका पाठ किया जाय तो प्रत्येक कार्यकी सिद्धि हो सकती है। यदि इस विधिसे एक वर्ष पर्यन्त जन्मकाण्डका पाठ किया जाय तो पुत्रहीन व्यक्ति भी पुत्र प्राप्त कर सकता है । १३७-१४२ ॥ कहनेका

३४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

आनन्दरामायणमध्यसंस्थं श्रीजन्मकाण्डं तनयप्रदं च ।
पारायणं संश्रवणं तथा वा करोति यो ना स लभेत्सुपुत्रम् ॥१४४॥

इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे
कुशलवादीनां जन्मकथनयतवंशविस्तारो नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


जन्मकाण्डे सर्गा आनन्दरामायणे नवैव ज्ञातव्याः । चतुरुत्तराष्टशतश्लोका विष्णुदासरूपरामदासामुखोपदिष्टाः ॥१॥
उपवनदर्शनम् ॥ १ ॥ उपवनक्रीडा ॥ २ ॥ सीतातत्यागः ॥ ३ ॥ कुशलवोत्पत्तिः ॥ ४ ॥ रामरक्षा ॥ ५ ॥
कमलहरणम् ॥ ६ ॥ पुत्रभ्यां संग्रामः ॥ ७ ॥ सीताग्रहणम् ॥ ८ ॥ बालकानामुपनयनम् ॥ ९ ॥


मतलब यह कि जन्मकाण्डका पाठ करनेसे पुत्रार्थी पुत्र, धनार्थी धन तथा किसी भी प्रकारकी कामनावालेकी कामनापूर्ण हो सकती है इस आनन्दरामायणके मध्यमें स्थित जन्मकाण्ड सन्तानदायक है। जो मनुष्य इसका पारायण करता या सुनता है, उसे सुपुत्रकी प्राप्ति होती है ॥ १४३ ॥ १४४ ॥ इति श्रीमत्शतकोटिरामचरि-तान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचितज्योत्स्ना भाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

इस जन्मकाण्डमें कुल नौ सर्ग तथा आठ सौ चार श्लोकों द्वारा श्रीरामदासने विष्णुदासको उपदेश दिया है। ॥ १ ॥ उन नवों सर्गोंमें ये कथाएँ वर्णित हैं (१) उपवनदर्शन, (२) उपवनक्रीडा, (३) सीतातत्याग, (४) कुशलवकी उत्पत्ति, (५) रामरक्षा, (६) लव द्वारा कमलहरण, (७) पुत्रोंके साथ रामका संग्राम, (८) सीताका पुनर्ग्रहण और (९) बालकोंका उपनयनसंस्कार ।

इति श्रीमदानन्दरामायणे जन्मकाण्ड समाप्तम् ।

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत–

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


विवाहकाण्डम्

प्रथमः सर्गः

(स्वयंवरके प्रसंगमें रामका तथा भूरिकीर्तिकी पुरीको प्रस्थान)

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः सभामध्ये मन्त्रिभिः परिवेष्टितः । तस्थौ सिंहासने रम्ये वरच्छत्रोपशोभितः ॥ १ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र कश्चिद्दूतः समाययौ । नत्वा सभायां श्रीरामं स्वामिवृत्तं न्यवेदयत् ॥ २ ॥
पूर्वदेशाधिपतिना राज्ञा श्रीभूरिकीर्तिना । प्रेषितोऽस्मि महाराज द्रष्टुं त्वत्पादपङ्कजे ॥ ३ ॥
पत्रं पाठयित्वा श्रीराम कार्या मत्स्वामिने कृपा । इत्युक्त्वा रामदूतस्य करे पत्रं समर्पयत् ॥ ४ ॥
रामदूतोऽपि सौमित्रेः पुरस्तात्पत्रमादधात् । नत्वाऽऽयामास वेगेन गत्वा तस्थौ निजस्थलीम् ॥ ५ ॥
ततः स लक्ष्मणः पत्रं वस्त्रबन्धनवेष्टितम् । समुद्घाट्य राघवाग्रे पपाठ मञ्जुलस्वरः ॥ ६ ॥
हेमकृत्रिमपुष्पाद्यैरङ्कितं कुङ्कुमान्वितम् । दर्शनादेव माङ्गल्यसूचकं तोषकारकम् ॥ ७ ॥
उवाच पत्रलिखितैरक्षरैर्लक्ष्मणः शनैः । स्थितः श्रीरामपुरतो वरासिंहासनांतिके ॥ ८ ॥

श्रीमान् श्रीराघवेन्द्रो जयतु दशशिरश्छेदनाथं जगत्त्यां
कौसल्यायां नृपेंद्राद्दशरथतनयोऽसि नाम्नाऽवतीर्णः ।
तस्याहं भूरिकीर्तिः पदजलहरुहयोगन्धमात्रातुकामः
कृत्वा नैजं शिरस्तु भ्रमरवदनिशं प्रार्थनां प्रार्थयामि ॥ ९ ॥


श्रीरामदास बोले—एक दिन रामचन्द्र सभामें अपने राजसिंहासनपर बैठे थे। उनके ऊपर सुन्दर छत्र लगा हुआ था और उनके चारों ओर कितने ही मंत्री बैठे हुए थे। इसी समय एक दूत आया और वह अपने प्रभुका सन्देश सुनाने लगा। उसने कहा— पूर्व देशके अधिपति महाराज भूरिकीर्तिने आपके चरणोंका दर्शन करनेके लिए मुझे भेजा है। आप मेरे स्वामीपर कृपा करके यह पत्र पढ़ लीजिए। इतना कहकर उसने वह पत्र रामके दूतको दे दिया। उस दूतने लक्ष्मणके हाथमें दिया और प्रणाम करके पूर्ववत् बैठ गया ॥ १-५ ॥
लक्ष्मणने सुन्दर कपड़ेमें बँधे हुए उस पत्रको खोला और मधुर स्वरसे बाँचकर रामको सुनाने लगे। पत्रपर सुवर्णके फूल बने हुए थे और कुमकुमके छींटे पड़े थे। जिसे देखनमात्रसे वह मांगल्‍यसूचक तथा आनन्ददायक प्रतीत होता था ॥ ६॥ ७ । पत्रमें जो लिखा था, उसे रामके पास जाकर धीरे-धीरे लक्ष्मण सुनाने लगे—। ८॥ रघुकुलमें उत्पन्न श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो राम रावणको मारनेके लिए दशरथके पुत्र

२४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १ ]

मम पौत्र्यावुभे राम चंपिका सुमतिरिति च । तयोः स्वयंवरार्थं ह्यायाताश्च बहवो नृपाः ॥ १०॥ बंधुपुत्रैर्बंधुभिस्त्वं स्वसुताभ्यां च मंत्रिभिः । सुहृज्जनैस्तथा पौरैः सावरोधः स्वसेनया ॥ ११॥ आगच्छस्व मम पुरं मयि कृत्वा महन्कृपाम् । द्विषतां प्रार्थनां मे त्वं मा कुरुष्व विफ्लां प्रभो । १२॥ इति पत्रार्थमाकर्ण्य स्वस्थचित्तो रघूत्तमः । स्वयंवरं ततो गन्तुं गुरुणा निश्चय व्यधात् ॥ १३॥ ततोऽब्रवीन्म सौमित्रिमद्य सेनां प्रषोदय । श्वोऽहं गच्छामि युष्माभ्यां स्वया मंत्रिजनैः सह ॥ १४॥ भरतेनापि युष्माकं पुत्रैः शत्रुघ्नसंयुतः । स्वयंवरं सावरोधः पौरैर्जानपदैः सह ॥ १५॥ विजयो नगरीं गन्तुं पालितुं स्थापितो मया । अद्य वै वस्त्रगेहानि बहिर्नेयानि लक्ष्मण ॥ १६॥ पंथानं शोधयंत्वद्य नानादातृनरान्विताः । गच्छन्तु सकला नार्यः पुष्पकेण विहायसा ॥ १७॥ तथेति लक्ष्मणश्चोक्त्वा सत्कार स गशोधितम् । राघवेण समाभव्ये प्रबद्धकरसंपुटः ॥ १८॥ ततो द्वितीयदिवसे प्रभाते रघुनन्दनः । स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा निनाग्नीन्वै स पुष्पके । १९॥ स्थापयामास कुण्डेषु भुक्त्वा सह सुहृज्जनैः । ततः सीतां समाहूय त्वरयामास राघवः ॥ २०॥ ततः स्त्रियस्तदा सर्वाः सीताद्या रत्नभूषिताः । यानमञ्जुरुहुः शीघ्रं दिव्यवस्त्रादिमण्डिताः ॥ २१॥ ततो रामो गजारूढो वरच्छत्रोपशोभितः । ययौचाग्रे चामरैर्वीजितश्च मुहुर्मुहुः ॥ २२॥ रामाग्रे वारणारूढो ययौ शीघ्रं गुरुस्तदा । राघवस्य पृष्ठभागे करिस्थो लक्ष्मणो ययौ ॥ २३॥ ततः कुशाद्यास्ते हृष्टा बाला जग्मुर्गजस्थिताः । ततो भरतशत्रुघ्नौ नामतुर्गजसंस्थितौ । २४॥ ततः सर्वे मंत्रियश्च पौर जानपदादयः । नानावहनसंस्थास्ते ययुः सर्वे त्वरान्विताः ॥ २५॥ चतुर्दन्ते शुक्लवर्णं वारणंश्वतरोद्भवे । संस्थितो राघवो रेजे मुक्ताजालविराजिते ॥ २६॥ एवं रामः सुनेमार्गे वंदिमंगलशब्दनुतः । मृदंगद वाद्यनिनादैश्च ययौ पूर्वदिशं शनैः ॥ २७॥

होकर कौशल्याभी काममे अस्मे है। मैं मूर्खकीकी आपकी नाई जनक चरणकमलोंके संघनकी कामनासे रात-दिन प्रार्थना करता रहता हूँ ॥ ६ ॥ हे राम ! मेरो चम्पिका तथा सुमति नामकी दो पोतियां हैं। उनके स्वयंवरमें बहुतसे राजे आये हुए हैं। अतएव आपस भी प्रार्थना है कि अपने भ्राताओं पुत्रों, भ्राताओंके पुत्रों, मंत्रियों, मित्रों, घरकी नारियों, पुरवासियो तथा सेनाके साथ मेरे यहाँ पधारे हे प्रभो ! मेरी इस प्रार्थनाको विफल मत कीजिये ॥ १०-१२ ॥ इस प्रकार उस पत्रके अर्थको स्वस्थचित्त होकर रामचन्द्रजीने सुना और स्वयंवरमें जानेके लिए गुरु सहित निश्चय किया । इसके बाद रामने लक्ष्मणसे कहा कि आज सेना भेज दो । कल हम, तुम, सब, दूता, मंत्रियों, भरत तथा तुम लोगोंके पुत्रों, स्त्रियों तथा पुरवासियोंको साथ लेकर स्वयंवरमे चलेंगे। विजयको अयोध्या नगरी तथा दशकी रक्षाके लिए नियुक्त कर दिया जाय । हे लक्ष्मण ! तुम आज अभी तम्बूकनात आदि भेज दो १. १३-१६ ॥ झम्पट कुछ दूतोंको रास्ता साफ करनेके लिए आगे भेज दो। घरकी सारी स्त्रियं को पुष्पक विमान द्वारा पहले ही भेज दो । १७ ॥ लक्ष्मणने रामकी सब बातें मान लीं और जैसा उन्होंने कहा था, सो सब ठीक कर दिया । १८ । दूसरे दिन रामने सवेरे उठकर स्नान और नित्यकर्म करनेके अनन्तर सब बालकोंके साथ बैठकर भोजन किया । अग्निहोत्रकी अग्नि मँगवाकर पुष्पक विमानपर रखी ॥ १९ ॥ इसके बाद सीताको बुलाया और जल्दी तैयार होनेके लिये कहा ॥ २० ॥ सीता आदि नारियोंने सुनहले वस्त्र एवं आभूषण पहने और पुष्पक विमान पर जा बैठीं ॥ २१ ॥ इसके बाद राम एक सुन्दर हाथीपर बैठकर चले । उस समय उनके ऊपर श्वेत छत्र लगा हुआ था और सेवक उनपर चंवर डुला रहे थ ॥ २२ ॥ सबसे आगे गुरु वसिष्ठका हाथी था, उनके पीछे राम और रामके पीछे लक्ष्मणका हाथी था ॥ २३ ॥ उनके पीछे कुश आदि शांडों इष्टों और भरत-शत्रुघ्नका हाथी चल रहा था ॥ २४ ॥ इन सबके पीछे मन्त्री तथा पुरवासी अनेक प्रकारकी सवारियोंपर सवार होकर शीघ्रतासे चले जा रहे थे ॥ २५ । रामचन्द्रजी ऐरावतके कुलमे उत्पन्न चार दांतवाले तथा मोतियोंके झुमकेसे सुशोभित हाथीपर बैठे हुए बड़े सुन्दर लग रहे थे ॥ २६ ॥ इस तरह बन्दीजन-मगाध आदिकोंके हाथ

सर्गः ३] विवाहकाण्डम् ३६७


लवादिनेत्रगां बत्वा सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं बालिके बालं लवं श्रीराघवात्मजम् ॥३२॥ स्वीकर्त्तुं स्वल्पवयसं सीतालालितमुत्तमम् । वाल्मीकिकृपया लब्धविद्यं रूपं कृशानुजम् ३३॥ गुणोपेतेन मुखेनैव कण्ठेऽस्य मालिकां कुरु । कुशार्क चपिकंर ते मग्ना पद्धस्तिथाऽद्य हि ॥३४॥ तथा त्वमपि भो मुग्धे लवांके संस्थिता भव । इति तस्या वचः श्रुत्वा सुनन्दायाः स्मितानना ।३५॥ लवस्य कण्ठे हर्षेण लज्जाऽवनतमानना । समर्पिनिजबाहुभ्यामर्पयामास मालिकाम् ॥३६॥ तदा निनेदुर्वादित्राणि जगुस्ते गायकास्तदा । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः । ३७॥ भूरिकीर्त्तिर्नृपस्तुष्टो लवांके सुमतिं तदा । शीघ्रं निवेशयामास परिपूर्णमनोरथः । ३८॥ तोषमाप रघुश्रेष्ठः सीता प्रासादसंस्थिता । जानक्यैः सञ्चनाश्च लवं दृष्ट्वा तुतोष सा । ३९॥ ततः सर्वांन्नृपान् पूज्य भूरिकीर्त्तिर्नृपोत्तमः । प्रार्थयामास विनयवचनेनभृगुत्तमः स्थितः ॥४०॥ विवाहकौतुकं दृष्ट्वा भवद्भिर्गम्यतामिति । तथेति ते नृपाः प्रोचुर्ययुर्मार्गस्थलांनि हि ॥४१॥ रामार्थे समरं कर्त्तुमसमर्था गतश्रियः । म्लानानना गतोत्साहाः कामबाणप्रपीडिताः ॥४२॥ रामोऽपि बन्धुभिश्चालेयैयीं वामस्थल मुदः । अथपरे दिने गत्वा भूरिकीर्त्तिः समाययौ ॥४३॥ पुरोधसोपविष्टः सन्मन्त्वा रामं रथोऽब्रवीत् । द्रष्टव्या लग्नदिवासाः सुमुहूर्त्तः सुखावहः ॥४४॥ मामङ्गीकृत्य रामाय त्वत्पादाश्रयकामुकम् । उभयोश्च मण्डपयाः कार्याण्याज्ञापय प्रभो । ४५॥ तथेति राघवोक्त्वा वसिष्ठ चादचत्तदा । सोऽपि गमाज्ञया ज्योतिःशास्त्रज्ञः परिवेष्टितः ॥४६। मुहूर्त्तं कथयामास पञ्चमेऽहनि राघवम् । ततस्तुष्टो भूरिकीर्त्तिर्गणेशां लग्नपत्रिकाम् ॥४७॥

सुनन्दाका आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ ३० ॥ इसी प्रकार स्वादु, पुष्कर, तैल, चित्रकेतु तथा अंगदको छाडता हुई वह लवके पास पहुंचा । ३१॥ जब सुमति लवकी ओर देखने लगा तब सुनन्दा बाला -ने बोले। इस बालकको देख, यह रामका पुत्र है । यह अपना विवाह करना चाहता है। इनकी थोड़ी उमर है । सीताके द्वारा इसका पालन-पोषण हुआ है। वाल्मीकिजी कृपासे इस लब्ध विद्या प्राप्त हुई है और यह कुशका छोटा भाई है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ तू मानन्द इस अपना दान बनाकर इसके गलेमें वरमाला डाल दे जिस तरह तुम्हारी बहिन चन्द्रिका कुशकी गोदमे बैठी हे उस तरह मा तुम तू भी उसकी गोदमें बैठ जा इस प्रकार सुनन्दाकी बात सुनकर वह मुसकुराता ओर लज्जावश मस्तक झुकाकर उसने अपने हाथोंसे लवके गलेमें वरमाला डाल दी ॥ ३४-३६ ॥ उस समय अनेक प्रकारके बज बज, गायकोंने गाने गाये, वेश्यायें नाचने लगी और बन्दीजन स्तुति करने लगे । ३७॥ महाराज भूरिकीर्त्तिने प्रसन्न होकर सुमतिको लवकी गोदमे बिठा दिया । ३८ । यह देखकर रामचन्द्रजी तथा मंदारोपर बैठी सीता दोनों प्रसन्न हुए। जब जानकीने सीताने सबवा मानन्द सुमतिकी देखा तब ता उनकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं रहा ॥ ३९ ॥ इसके अनन्तर राजा भूरिकीर्त्तिने वहाँ आये हुए सब राजाओंका पूजा करके विनयपूर्वक प्रार्थना की-॥ ४० ॥ अब आप लोग विवाहका भी उत्सव देखकर जाइयेगा। राजाओंने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और अपने-अपन डेरेपर चल गये ॥ ४१ ॥ वे सब राज रामसे युद्ध करनेम असमर्थ थे । अतएव उनकी श्री नष्ट हो गयी थी, मुख कुम्हला गया था, उत्साह भंग हो गया था और बेजार कामके बाणोंसे पाडित हो रहे थे ॥ ४२ ॥ राम भी अपने भाइयों और बच्चोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक डेरेपर गये । इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्त्ति रामके पास पहुंचे ॥ ४३ ॥ पुरोहित उनके साथ था, वे रामके समक्ष बैठे और कहा कि कोई अच्छा लग्न- दिवस तथा सुखदायक मुहूर्त्त विचारिए । फिर कहा हे राम ! मदने वरणके भक्त मुझ दासकी प्रार्थनाको अंगीकार करके दोनों मण्डपं के लिए जो कार्य करने हों, उनके लिए आज्ञा दीजिए ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ "अच्छा" कहकर रामने वसिष्ठकी ओर सङ्केत किया । वसिष्ठने रामकी आज्ञा से ज्योतिषशास्त्रको जाननेवाले कितने ही पंडितोंके साथ विचार करके उनके पांचवें दिन विवाहका शुभ मुहूर्त्त बतलाया । इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे भूरिकीर्त्तिने गणेशजी, लग्नपत्रिका, गणकों, पण्डितों, वैदिक बादियों तथा रामके साथवाले बंधुजनों को

३४८ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

काचित्पक्त्वा भोजनं तु काचित्पाकस्य मञ्चिकाम् । काचिन्मज्जयतीदन्ता मुक्तकेशा ययौ जवात् ॥४६॥ स्तनालिंगिता काचित्क्षिप्त्वोपस्थने कन्दू । ययौ वेगेन ललना वस्त्राणामवलम्बकम् ॥४७॥ क्षालयन्ती पतेः पादमेकं प्रक्षाल्य भामिनी । पादमन्यङ्गलङ्गां तु नावच्छुन्द्रा मवागमत् ॥४८। मीनना गमनेन्द्रं हि शीघ्रं दृष्टार मा तदा । काचिद्दर्शो नुग्रथनान् दूरं कृत्वा पतेर्मुखम् ॥४९॥ ददर्श गच्छं दृष्टुं प्रासादे घस्तयहृष्टा । काचिद्विनिद्रिताऽऽरात्री व्यक्त्वा निद्रां तरान्विता ५०॥ विस्मृतार्धवसना मन्दान्ध्रा निद्राशणान्विता । नेकभ्यां कुचितन् केशान् यपयन्ती तदाशयौ ॥५१॥ त्यक्त्वाऽऽख्यां द्विकाञ्चित्पा कुर्वन्तं कर्माणिधिप । ययौ वेगेन प्रासादं श्रुत्वा राघवमागतम् ॥५२॥ काचिदङ्गेऽनुलेपी मा कुर्वती चापरे भुजे । कर्तुकामा ययौ शीघ्रं तथैव प्रमदोत्तमा ॥५३। काचिदेके पदे कृत्वा नूपुरंऽदानि भामिनी । अपरे कर्तुकामा सा तथैवाट्टाहमारुह्यौ ॥५४। कथयन्ती शुभां वार्ता सपत्न्युः पुरतः स्थिता । श्रुत्वा रामे ममायान्तं दृष्ट्वान गजगामिनी ॥५५॥ क तभिजपति पात्रे कुर्वन्ती पक्वरूपकम् ।भूमौ त्यक्त्वाऽऽद्रवात्र मा ययौ रामं निरीक्षितुम्॥५६॥ काचिन्स्नात्वा द्विज्यवस्था कुर्वन्ती म प्रदक्षिणा । तुलसीं च महादेवं श्रुत्वा रामं ययौ जवात् ॥५७॥ काचिद्रज्जुयन्त्र कूपे कच्वा तोयाद्यमुद्यता । त्यक्त्वा रज्जुघटं कूपे दृष्टावेदुनिभानना ॥५८॥ काचिन्मज्जयन्ती स्तन्यं गृह. पालयन्ती वधः कुचरोवालकं श्रुत्वा तथैव सा ययौ जवात् ॥५९॥ काचिन्मा परिधायाथ वस्त्रं कच्छं करोम सा । कुरुक्रमा ययौ वेगातन्देवाढुलवस्त्रकम् ॥६०॥ एवं कर्माप्यनेकानि कुर्वन्त्यस्ताः पुरस्त्रियः । विक्षिप्य गलि नत्वानि ययौ गमं निरीक्षितुम् ॥६१॥ दृष्ट्वा रामं गजस्थं ता ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः । ऊचुः परस्परं नार्यः शश्वोऽट्टालमस्थिताः ॥६२॥ धन्या सा रामजननी कौमल्या या रघूत्तमम् । सुपुवे गजराजानं पश्चिणेणनीरुथा । ६३॥

भोजन करती थीं और कोई भोजन बना रही थी या उसकी अज्ञा तक छोड़के भागी। कोई बालको संभार रही थी, वह बेशक हाथम याते ही दौड़ पड़ा। किमोका पति आलिंगन कर रहा था। इतनेमें रघूका आगमन सुना तो स्वाभाविक हाव लिङ्गनकर दौड़ आयें। कोई अपने पतिके पैर धो रही थी, उसने एक पैर धोकर डमग पगता हुआ था कि उसे खबर लगी कि संगके सहित राम आ रहे हैं, वह तुरन्त उठकर प्रासादपर चढ़ गयी। कोई पतिके साथ शय्यापर सोती थी ॥४४-५०॥ इससे उसको आंखोका काजल मुँहपरमे पुछ गया यह भी यह समाचार पाने ही झरोखे सम्मुखवाले भागको इटाती हुई दौड़ी ॥५१॥ कोई उबटन लगा रही थी, वह एक हाथसे साडी सम्हालता हुई दौड़ पड़ी किणका पति कामोन्मत्त होकर आलिंगन करता बजता था। वह भी एक हाथमें सांडी सम्हालते हुई चली आयी। ॥५१॥ ५३। कोई कामिनं नूपुर पहिन रही थी। वह कनल एक ही पैरम उसे पहनकर भरना संभालकर दौड़ पडी ॥५४॥ कोई पतिस वात कर रही थी, वह जहाँतक बात कर चुकी थी वहीं हा छोड़कर दौड़ आयी ॥ ५५। कोई पतिके लिए भोजन बना रही थी, वह भी पाथको व्योका त्यों छोड़कर रामको देखने लिए दौड़ पडी ॥ ५६ । कोई स्नान करके तुलसी तथा महादेवकी प्रदक्षिणा कर रही था वह भी रामका आगमन सुनकर उसे अधूरा ही छोड़कर भाग चली। ५७। कोई चण्डयूरा रस्सी बांधकर पानी भरने गयी थी, वह रस्सा और घड़ा कूपमे ही फेककर चल पडी ॥५८॥ कोई बालकत स्तन्यपान करा रही थी, वह बालकका प्रिये हुए ही दौड़ आयी ॥ ५९ कोई भोजन अधिक कामीम निवृत्तकर अट्ट पर जाना चाहती थी, वह माधे काछ पहने हुए ही चली आयी ॥६०॥ इस प्रकार अनेक तरहके काम को करतो हुई स्त्रियां अपना अपना काम छोड़कर रामके दर्शनके लिए छज्जे और हटापर आ खड़ी हुई ॥ ६१॥ हाथीपर बैठे हुए रामको देखकर स्त्रियां उनपर फूलोंकी वर्षा करती हुई आपसमे इस प्रकार बाते करती थी-॥६२। रामकी माता कौशल्या धन्य

सर्गः २ ] विवाहकाण्डम् १४९


काश्चिदूचुश्च सा धन्या सीता जनकनन्दिनी । यस्या बिम्बाधरामृतमुररीकुरुतेऽत्र सः ॥ ६४ ॥
काश्चिदूचुस्तया तप्तं जानक्या दुष्करं तपः । पूर्वजन्मनि यत्पुण्याद्रामाऽप्रियाऽभवत् ॥ ६५ ॥
काश्चिदूचुर्वयं मन्दभाग्यास्तु जगतीतले । न तादृश्यो न जाताः स्य रामस्यैत्र स्तनन्धयाः ॥ ६६ ॥
इति नानाविधा वाचस्तासां शृण्वन् रघूत्तमः । ययौ स गजमगंग तूत्तन्प्यौपमन्दिरम् ॥ ६७ ॥
तत्रावरुह्य नागेन्द्राद्विवेश वरमन्दिरम् । तस्थौ सुखेन जनक्या बंधुभिश्चालिकैः प्रभुः ॥ ६८ ॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे स्वयंवरार्थं भूरिकीर्तेः पुरं प्रति श्रीरामगमनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

( राजा भूरिकीर्तिकी पुत्री चन्द्रकलाका स्वयंवर )

श्रीरामदास उवाच
अथापरदिने रामं भूरिकीर्तिः समागमत् । नत्वा प्राह रघुश्रेष्ठ सभाममागन्तुमर्हसि ॥ १ ॥
तथेति राघवश्चोक्त्वा चालंकारैः स्वमभूषयत् । कनकन्तन्तूद्भवैश्चित्रैः कञ्चुकैरुष्णीषमण्डितः ॥ २ ॥
कटिं बध्वाय त्रिगुणं कटिसूत्रेण चोद्यतः । भूरिवर्गगणैः सार्धं शिविकास्थः समाययौ ॥ ३ ॥
सभार्थं ये नृपाः पूर्वमासनेषु च संस्थिताः । श्रुत्वा रामं समायान्तं सभायास्तत्पुरो ययुः ॥ ४ ॥
चक्रुः सर्वे राघवाय प्रणामान्विधिरोन्मुखाः । तेषां नामानि रामाय दर्शयन्तः पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥
चित्रार्णाशा रामदूताः प्रोचुर्वै वेत्रपाणयः । वस्त्रालंकारभूषाभिर्भूषिता मुदिताननाः ॥ ६ ॥
गजराज नृपश्चायं कर्णाटाधिप ईरितः । विजयस्ते प्रणामंश्च करोत्यत्र विलोकय ॥ ७ ॥
राघवेन्द्र नृपश्चायं श्रीमान् द्रविड़देशजः । कम्बुकण्ठो प्रणामान्ते करोत्यत्र विलोकय ॥ ८ ॥
दीननाथ नृपश्चायं विदर्भविषये स्थितः । अग्रनाथः प्रणामंश्च करोत्यत्र विलोकय ॥ ९ ॥


१ जिन्होंने २ ३ विराज राम जैसे पुत्रको जन्म दिया ॥ ६३ ॥ कोई कहने लगी कि जनकनन्दिनी सीता धन्य है कि रामचन्द्रजी जिनके अधरामृत पान करते हैं ॥ ६४ ॥ कोई बामा-जन कहती हैं कि सीताने पूर्वजन्ममें दुष्कर तपस्या की थी, जिसके प्रभावसे वे आज राजराज रामचन्द्रकी प्रिया वधू बनी हैं ॥ ६५ ॥ कुछ स्त्रियाँ कहने लगीं कि हम लोग बड़े अभागिनी हैं, जो सीताका दासी होकर भी रामकी सेवा नहीं कर सकीं ॥ ६६ ॥ इस तरह नाना प्रकारका वृत्त सुनते हुए रामचन्द्रजी गजमल्लसे चलकर छावनीसे उतरे और राजा भूरिकीर्ति द्वारा सजाये हुए भवनमें गये और सीता, भ्राताजी तथा बालकोंके साथ टिके ॥ ६७ । ६८ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीरामदास बोले इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्ति स्वयं रामके पास पहुंचे और प्रणाम करके हाथ जोड़ - हे रघुश्रेष्ठ ! अब सभामें चलिए । 'अच्छा' कहकर रामने भी सुवर्णके अनेक आभूषण पहने, सोने के सूत्रसे बने अच्छे-अच्छे वस्त्र धारण किये, पगड़ीसे सज्जित कमरबन्द कसा और शिविकापर बैठकर नगर बालकोंके साथ सभाभवनकी ओर चले, १-३ । जो राजे पहले ही से सभामें आकर बैठे हुए थे, वे रामका आगमन सुनकर सकुचकर उठे और रामके सामने जा पहुंचे ॥ ४ ॥ उन्होंने भगवान्को प्रणाम किया । रङ्ग-बिरंगी पगड़ी बाँधे और हाथमें बेंत लिए हुए रामके दूत जोर-जोरसे बोलकर इस प्रकार उनका परिचय बतलाने लगे- हे राजाओंके भी राजा राम ! देखिए कर्नाटक देशका रहनेवाला यह विजय नामका राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ ५-७॥ इधर देखिए हे राघवेन्द्र यह द्रविड़ देशका निवासी कम्बुकण्ठ नामका राजा आपको प्रणाम कर रहा है ! हे दीनानाथ ! यह विदर्भ देशका अधिपति अग्रनाथ नामका राजा आपको

३९०आनन्दरामायणे[ सर्गः २

महाराज नृपश्वाय मगध विषये स्थितः। परंतपः प्रणामांस्ते करोति त्वं विलोकय ॥१०॥
सीताकांत नृपश्वायमवन्तिस्थः प्रतापनान। उग्रबाहुः प्रणामांस्ते करोति त्वं विलोकय ॥११॥
रघुवीर नृपश्वायं स्थितो ह्वैहयपत्तने प्रतापने प्रणामांश्व करोति त्वं विलोकय ॥१२॥
हे राम नृपतिश्वाय शूरसेने स्थितो महान् गुणेश्ने प्रणामाश्व करोति त्वं विलोकय ॥१३॥
कामलद्र नृपश्वाय हस्तद्वागस्थिता महान् नापानव्ये यशस्कीर्त्तः करोति नमनं तत्र ॥१४॥
अयोध्याश नृपश्वायं कलिङ्गविषये स्थितः हेमाङ्गदश्तेऽन्वेद्यश्च करोति नमनं तव ॥१५॥
रामभारे नृपश्वायं नागरत्नसमन्वितः पाण्ड्योऽयं मतिमान् शूरः करोति नमनं तव ॥१६॥
एवं तेषां प्रणामांश्व मानयन् स्वकृतांजलिभिः। विवेश बंधुभिर्बालैः मण्डपं मन्त्रिभिः प्रभुः ॥१७॥
तत्र सिंहासने दिव्ये पश्चिमायां ततो हरिः। उपाविशन्म पूर्वास्यश्छत्रचामरमण्डितः ॥१८॥
रामस्य सव्ये सौमित्रिर्ककेयीतनयस्त्वयाः स्थितः सम्भूस्तथा रामवामे कुशाद्या मंत्रिबालकाः ॥१९॥
शत्रुघ्नसव्ये सतस्थुः सुमन्त्राद्याः सुमन्त्रिण । नभश्चामुत्तरे याम्ये पंक्ती मध्ये नृपादिकाः ॥२०॥
नीभरेखोपमास्तस्थुः स्वसमूहपुरंज्जनान्विः पश्चिमाभिमुख्याः सर्वा ननृतुश्चाग्रतोऽभितः ॥२१॥
अट्टाट्टालसंस्था विप्राद्या ददृशुः कौतुक महन् । नतो नटन्चु वाद्येषु धूपेषु प्रज्वलत्सु च ॥२२॥
नदन्त्सु वारनारीषु गायन्त्सु मागर्घादिषु स्तुवन्त्सु बंदिवृन्वेषु सभायां नृपपोत्रिके ॥२३॥
शिबिकास्ये दिव्यवस्त्रदिव्यालंकारमण्डिते। नवरत्नमहामालाधृत्वाऽन्यकरोपले ॥२४॥
ते सभाङ्गमनू रम्ये समागभ्य विरेजतुः । तयोर्नेत्रकटाक्षेण भिन्नमर्मस्थला नृपाः ॥२५॥
बभूवुर्विकलाः सर्व कामबाणविचेतनः। न तदा लेभिरे शर्म शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ॥२६॥
समार्ता चंद्रिकान्नाम्री वह्निंशीणा दवेश ह। ईशद्योणाच सुमतिः मर्भा तां सविवेश ह ॥२७॥

प्रणाम करता है, इसे देखिए ॥ १० ॥ हे सीतापते ! मगध देशका रहनेवाला यह परन्तप नामक राजा आपको प्रणाम करता है ॥ १० ॥ हे सीताकान्त ! अवन्तिदेशका निवासी और महाप्रताणशाली यह उग्रबाहु नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ ११ ॥ हे रघुवीर ! यह हैहयनगरका रहनेवाला प्रदीप नामक राजा आपको प्रणाम करता है ॥ १२ ॥ हे राम ! शूरसेन नगरका रहनेवाला यह गुणेश नामक राजा आपको प्रणाम करता है हे कामलद्र ! कुद्दलग नगरका रहनेवाला नौपञ्जय यशस्वी नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ १३-१४॥ हे अयोध्यापते ! कुरुदेशका रहनेवाला यह हेमांगद नामका राजा आपको प्रणाम करता है। हे रामप्यारे ! नागरत्ननगरके रहनेवाले बुद्धिमान् तथा अति पराक्रमी पाण्ड्य नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ १५ ॥ १६ ॥ रामचन्द्रजी सबकी ओर निहार तथा संगत साहिसे लोगो के प्रणाम स्वीकार करके अपने भ्राताओं और बालकोंके साथ सभामभवनमे पधारे। वहाँ पश्चिमाभिमुख रखे हुए एक दिव्य सिंहासनपर पूर्वका ओर मुख करके बैठे । उस समय भी उनक ऊपर छत्र लगा था और चमर चल रहे थे ॥ १७ ॥ १८ ॥ रामकी दाहिनी सव्यमे लक्ष्मण भरत आदि भ्राता बैठे। बायें ओर कुश आदि सब लड़के तथा मंत्रिपुत्र बैठे। शत्रुघ्नकी दाहिनी बगलमे सुमन्त्रादि मन्त्री बैठे। सभाकी उत्तर और दक्षिण पंक्ति गोलाकार बनाकर सब राजागणपुत्र तथा मंत्रिपत्रके साथ बैठे थे और पश्चिमाकी ओर मुख करके बैठायें नाच रही थीं ॥ १९-२१ ॥ अट्टालिकापर चढ़े हुए ब्राह्मण आदि नगरनिवासी वहाँका कौतुक देख रहे थे। इसके अनन्तर जब वाद्यू बजने लगे, धूपकी सुगन्धि उड़ने लगी, वेश्याएँ नाचने लगीं मागध-नट आदि विविध प्रकारके गाजन करने लगे और बन्दीजन तरह-तरहकी स्तुति करने लगे। उसी समय शिविकामर चढ़कर दिव्य वस्त्र तथा अलंकार पहिने नवरत्नोंकी बनी एक बड़ी-सी माला हाथोंमें लिये वे दोनों सुन्दरी कन्यायें सभामें आ पहुंची । उनके नेत्रकटाक्षम घायल तथा कामके बाणसे विदीर्णहृदय होकर कितने ही राजे विकल हो गये। उनके होठ और तालु सूख गये । उस समय कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। इस समय अग्निकोणसे चन्द्रिका तथा ईशानकोणसे सुमति नामवाली कन्या प्रविष्ट हुई

सर्गः २ ] विवाहकाण्डम् ३५१

अथोपमाता वृद्धा सा धृतहस्ताग्रयष्टिका मथाया चपकान्ताभ्यै दक्षिणस्थान्पृथक् पृथक् ॥२८॥ क्रमेण वर्णयामास तदा नृपतिसत्तमान् । तथाऽन्या च सभाप्राध धृतहस्ताग्रयष्टिका ॥२९॥ सुनन्दाख्याऽतिजग्धा सुमध्यै नृपतीन्क्रमात् । रणयाम्यौसरस्थनृपमना पृथक् पृथक् ॥३०॥ अथ सा चण्डिकां प्राह नीत्वा तां नृपतेः पुरः । विशवकार्थ्या च.पमाना नन्दा सामग्रीजिता ॥३१॥ राजकन्ये चषिकेत्र शृणुष्व वचनं मम । एन नृप वर्णयाम पश्य स्व मदनोपमम् ॥३२॥ पांड्याख्यं मतिमाणाग्ना नामपत्तनमास्थितः । शूर श्रेष्ठा नृपश्रेष्ठः प्रजापालनतत्परः ॥३३.। यदि ते रोचते चित्ते वरयैनमनुत्तमम् अद्य त्वं महिपी भुक्त्वा नागपत्तनमस्थिता । ३४.। क्रीडस्व मुदिताऽनेन वाप्रामन्द्रातिषु । नन्दीक्त चषिका श्रुत्वा द्वयर्थ वाक्यमनुत्तमम् ॥३५॥ न बबन्ध मनस्तस्मिन्नृपती मतिमत्तरा । चोदयामास नन्दां तामग्रे गन्तुं नृपोत्तमम् ॥३६ । तदाऽन्यं नृपति नन्दा नीन्वा तां शिबिरात्स्थिता । चण्डिकां प्राह चे क्ष पश्येनं बालिके नृपम् ॥३७' कलिङ्गविषयस्योऽयं नाम्ना हेमाङ्गदो महान् । को दृशो वाणदाणा यस्य गण्डस्थलादिषु ॥३८॥ मुक्ताजालानिगुच्छाश्च राजन्ते कमलानने । ** *** ******* ******* * ******* च ॥३९॥ एषापत्नी कौतुक बाले करोषि क्रोडनादिषु । यस्य सांक्रम रे हे मा मुख्योऽय कन्यके ॥४०॥ इत्युक्ताऽपि तथा तन्वी नन्दया चंडिका नृपे । न स्मन नगे न बबन्ध न्य गन्तु नामचोदयत् ।४१॥ सपत्नीभयमालक्ष्य सपत्नीकरण्याजष्यति । अमहानिति शब्देन नन्दया सूचिताऽपि मा ॥४०॥ ततोऽन्यं नृपतिं गन्त्वा नन्दा प्रोवाच चण्डिकाम् । पश्यैनं नपतिं मुग्धे हरिद्वारनिवासिनम् ।४३॥ नीपान्वयममुद्भूत ह्यब्धाविव निशाकरम् । यशानां नृत्नगन्ध कार्य्या जयन्त मण्डले ।४४। यज्ञकीर्तिरिरिति ख्यातः पृथ्वीशः प्रमदाप्रियः । वयैनं नृप भुवि रुक्मभूषणभूषितम् ॥४५.॥


॥ २८-२७ ॥ चण्डिकाके साथ एक उपमाता (धाई) मथायो थी, जो हाथमें एक लाठी लिये खड़ी दिये थी। वह दक्षिणकी तरफ बैठे राजाओंक वर्णन करने लगी । २८-३० ॥ सुनन्दा, चण्डिकाको एक राजाके सामने लायी । उस समय भी चण्डिका कामकीपर बैठी थी और चमर चमर चल रहे थे ॥ ३१ ॥ सुनन्दा चण्डिकाका सम्बोधन करके कहने लगी - हे राजकन्य चण्डिके ! म.. बात सुना इसा, यह कामदेवके समान सुंदर अति बुद्धिमान् पाण्डय नामक गजा नागपत्तनका रहनेवाला बड़ा पराक्रमी, रथी, सब राजाओंमें श्रेष्ठ और प्रजापालने तत्पर है । ३२ ॥ ३३ ॥ यदि इस प्रसन्न लगे तो इस को पसन्द कर लो । तुम इसकी महारानी बनकर नागपत्तनमे आनन्दक साथ अनूप-रूपके मथलोभ क्रीड़ा करोगी । सुनन्दाकी ये बातें उसे दुष्टार्थक तथा व्यर्थ-सी जान पड़ी । उस राजापर उसका तव मन नहीं सटा और दूसरे राजाके पास चलनेका संकेत किया । ३४-३६ ॥ फिर सुनन्दा शिविकापर बैठी चण्डिकाको दूसरे राजाके सामने ले जाकर कहने लगी । ३७ ॥ हे बालिके ! इसे देखो यह महान् कलिंग देशका रहनेवाला, हेमाङ्गद नामका राजा है । इसके गण्डस्थलपर हाथियोंके गजमुक्ताओंसे बने गुच्छू लटकते रहते हैं । इसकी रानी बनकर तुम गङ्गाजीकी खिड़कियोंम समुद्रकी लहरोंक कौतुक देखती हुई विहार करोगी । बस, अब इसे वरण्य करके तुम इसकी समस्त स्त्रियोंकी प्रधान बन जाओ ॥ ३८-४० ॥ इतना कहने-सुननेपर भी उसका मन उस राजापर नहीं जमा और आगे बढ़नेका संकेत किया । ४१ । क्योंकि सम्भावित यह ख्याल हुआ कि इसके यहाँ सपत्नी मौत का डर है। दूसरे 'अमहान्' शब्दका प्रयोग करके नन्दामे भी य०ठा०सा संकेत कर दिया था ॥ ४२ ॥ इसके अनन्तर दूसरे राजाके पास पहुंचकर नन्दा कहने लगी- हे मुग्धे ! इस गजाको देखो, यह हरिद्वारका नवासी है ॥ ४३ ॥ जैसे समुद्रसे चन्द्रमाको उत्पत्ति हुई है उसी प्रकार यह पवित्र नीप राजक वंशम उत्पन्न हुआ है। अनेक यज्ञोंको करनेसे जयन्त् घरमे इसकी कीर्ति फैल चुकी है ॥ ४४ ॥ इसलिए लोग इसे यज्ञकीर्ति कहते हैं । सुवर्णके आभूषणोंसे मण्डित इस राजाको तुम वर लो। यह विस्तृत भूभागका मालिक है और

३६२ आनन्दरामायणे [सर्गः २

अस्याद्य महिषी भूत्वा शृङ्गारैरुपसम्पदा । नौकास्था पश्यसि त्वं ह वर्ण्यनं नृपोत्तमम् ॥४६॥ अस्य पत्नी वसिष्ठा त्वं मय माऽग्रे प्रतापने । इत्युक्ताऽपि तया तस्मिन्न बबन्ध निजं मनः ४७। त्वं वसिष्ठा मा भवेति नन्दायाऽग्रे प्रचोदिता चाढ्य नाम मा नन्दाऽग्रे गन्तुं नृपोत्तमम् ॥४८॥ नन्दाऽन्यं नृपं नीत्वा चम्पिकां प्राह वेगतः। पश्यैनं नृपतिं मुग्धे सुषेणाख्ये वरे ॥४९॥ देशे करोति वै राज्यं सुषेणोऽयमनुत्तमः। तुरगा वायुवेगाश्च यस्य पन्नगो मृगीदृशः। ५०। यस्यांगणे वारनारीनृत्यद्यत्पत्यह्हानिशम् वर्णैन चांपिकेऽद्य य आनन्दवराननम् ॥५१॥ अस्य त्वं महिषी भूत्वा जन्मसाफल्यां कुरु। याश्च विष्ट शृण्वन्त्या वाक्यमनुत्तमम् । ५२। न बबन्ध मनस्तस्मिन्नृपती सा मनोदयम् मथ सा वादिनो कन्या नयाऽन्यं नृपतिं क्षणात् ॥५३॥ निनाय शिविकाध्यो तां चम्पिकामपि भामिनीम् । पश्यैनं नृपतिं बाले स्थितं हैहयपत्तने ॥५४॥ महस्रार्जुनवंशस्य भूषणं कल्पनेपमम् प्रताप इव मन्वानः ख्यातः शूर महारथी ॥५५॥ वर्ण्यनं नृप माऽन्य गच्छ हैमवत्यर्णिवि । अस्य त्वं महिषी भूत्वा रेवायाः पतिना सह ॥५६॥ करिष्यसि जलक्रीडां चम्पिके शृणु मद्रचः । इत्युक्तेऽपि तया तस्यां न बबन्ध मनो नृपे ॥५७। वर्ण्यनं नृपं मेने नन्दास्यादमहारथी । नृपाणां संख्येष्वर्थे वा ह्यथ बद्धुत्तमा । ५८। एवं नाना नृपाणां सा वर्णनं विविधं पृथक् । स्तुतीश्च नृपतीनां शुश्रावा नृपमध्यगा ॥५९॥ जगाम शिविकामंस्था सुनन्दा भरतानुजम् । सुमन्त्रादीन् विहाय श्रुत्वा श्रीरामेमान्तथा ॥६०। ततः प्रोवाच सा नन्दा पश्यैनं भरतानुजम् । कौसलेन्द्रस्य रामस्य लक्ष्मणसोदरोपमम् ॥६१॥ अयोध्यावासिनं रामराज्याज्ञामनुवर्तिनम् वर्ण्यनं चम्पिकेऽद्य श्रुतकीर्त्याः स्वसा भव ॥६२॥ इत्युक्तापि तया तन्वी शत्रुघ्ने निजमानसम् । न बबन्ध भृशं संतामग्रं गतु चकार ताम् ॥६३।

स्त्रियोसे बड़ा प्रेम करता ने। अत यदि तुम इसके साथ ब्याह कर लोगी तो नौकापर बैठकर गङ्गाजीकी अनूप लहरियोंको देखोगी। मेरी बात मान लो और इस राजाकी पति स्वीकार करो। अब आगे मत बढ़ा ऐसा कहनेपर भी उसका मन उस राजापर नहीं रमा और उसने नेका मस्त किया । ४५-४८ ॥ सुनन्दा भी दूसरे राजाके सम्मुख पहुँचकर कहने लगी कुमारी ! इस नरपत्ती ओर देखा। यह अङ्ग नामक दशामे रहता हुआ राज करता है। इसका सुषेण नाम है। कनकगण देवतुल्य बहुमूल्य घोड़े इसके पास हैं कितनी ही मृगीकी तरह नेत्रावाली स्त्रियां भी इसके विलासमे अंगणमें रात वक्वाये नाचती रहती हैं। हे चम्पिके तू इसे पसन्द कर ले। इस तेरे प्रिय मुखके समान इसका भी मुंह है। राजमहिषी बनकर तू अपना जीवन सुफल कर ले। उस राजाकी बड़ाई सुनकर नन्दाने प्रतिज्ञापालन कर राजापर भालती रमा और कन्धाको आगे बढ़नेके लिये संकेत किया। उसके संकेतपर वाहिकाने क्षण भरमें एक दूसरे राजाके पास पहुंचकर बोली हे बाले ! इस राजाको देखा यह हैहयपत्तनका रहनेवाला, कल्पवृक्ष सदृश कामद तथा सहस्रार्जुनका वंशज है। यह बड़ा योद्धा एवं महारथी है और प्रताप इस नामसे विख्यात है। ॥ ४९-५५, इसको वरकर तू अपने भाग्य सम्बन्ध पदपर पहुँचेगी। इसकी महिषी बनकर तू पतिके साथ नर्मदा नदीमे सानन्द विहार करेगी ॥ ५६ ॥ इतना कहनेपर भी उस चम्पिकाको अच्छा नहीं लगा। क्योंकि नन्दान भी कहा था- 'हे नृपोत्तम !' मानो इसे यह पसन्द करे दूसरे 'अमहारथी' शब्दसे भी तिरस्कार ही किया था। इसलिए वह भी अच्छा नहीं लगा। नन्दायें दुष्टकके समान कहा था खुद समझती थी ॥ ५७ ॥ ५८ । इस प्रकार जनक राजाक्त पृथक् पृथक् वचन तथा स्तुतिके अन्तर्गत लयवद्यायाका सुनती हुई पाल्कीपर बैठी हुई चंडिका रामके मन्त्रा सुमन्त्रादिकोंको लांघकर शत्रुघ्नके पास पहुंची ॥ ५९ ॥ ६० ॥ नन्द ने कहा- ये भरतके छोटे भाई हैं किन्तु रामके सगे भाई जैसे मालूम पड़ते हैं ॥ ६१ ॥ ये अयोध्यामे रहते हैं और राजा रामकी आज्ञाका पालन करते हैं । चम्पिके ! तू इन्हीक साथ विवाह करके श्रुतकीर्तिकी बहिन बन जा ॥ ६२ ॥ इतना कहनपर भी शत्रुघ्नमे उसका मन नहीं

सर्गः २ ] विवाहकाण्डम् ३६३


ततः सा भरतं नीत्वा नन्दा तामाह मञ्जुलम् । शत्रुघ्नस्याग्रगं चैनं कैकेय्या जठरोद्भवम् ॥६४॥
रामसेवारतं शान्तं युवानं दयितप्रियम् । वरयैनं बालिकेऽद्य माण्डव्या सरयूजले ॥६५॥
करिष्यसि जलक्रीडां नौकाभ्या मन्मतेन हि । ततस्तत्संज्ञया मन्दा लक्ष्मणं चपिकां जवात् ॥६६॥
नीत्वा सौमित्रिक्रीति तां वर्णयामास मादगम् । पश्यैनं लक्ष्मणं बाले सुमित्राजठरोद्भवम् ॥६७॥
वयोध्यक्षामिनं रामसेवाशक्तं मनोहरम् । वरयैनं चपिकेऽद्य मेघनादप्रमर्दनम् ॥
शेषांशसंभवं चोर्मिलाया वीरस्वसा भव ॥६८॥
सर्वांन् श्रुत्वा रामसेवामक्तान् पत्नीपुत्रानपि । छत्रचामरादींश्च रोषयामास ताञ्च सा ॥६९॥
ततस्तत्संज्ञया नन्दा श्रीरामाग्रे स्वयंवरम् । नीत्वा तामाह मधुरं स्तोतुं तं रघुनन्दनम् ॥७०॥
महत्ते चपिके दैव येन पश्यसि राघवम् । धन्योऽहमपि या रामं दृष्ट्वा स्तोतुं पुरः स्थिता ॥७१॥
क्काहं मंदमतिर्नारी क्व रामो गुणसागरः । नाहं तत्स्तवनने शक्ता बाल्मीकिर्यत्र कुण्ठितः ॥७२॥
शतकोटिभिर्नः श्लोकैश्चरित्रं राघवस्य च । मुनिना वर्णितं तच्च शतकोट्यक्षरान्वितम् ॥७३॥
तस्याहं वर्णनं किञ्चित्करोमि यच्छृणुष्व तत् । सूर्यवंशभूषणं श्रीदशरथनृपात्मजम् ॥७४॥
कौसल्यानन्दनं रामं साक्षान्नारायणं विभुम् । ताटकान्तकरं वीरं गाधिजायज्ञपालकम् ॥७५॥
अहल्योद्धारिणं श्रेष्ठं शिवचापंकारखण्डनम् । जानकीवल्लभं रम्यं जामदग्न्यादवानलम् ॥
नृपवृंदकंजेतारं भरतप्राणदायिनम् ॥७६॥
ताताज्ञापालकं भ्रात्रा सीतयाऽरण्यवासिनम् । विराधमर्दनं श्यामं खरदूषणमर्दनम् ॥७७॥
त्रिशिराश्चमृगमारीचकबन्धवालिमर्दनम् । समुद्रबंधनं लङ्कागर्भसान्तकरं प्रभुम् ॥७८॥
रावणांतप्रकर्तारं सीतया राज्यकारिणम् । तीर्थपुंजप्रकर्तारं लीलाकीडनतत्परम् ॥७९॥


डारा और आगे चलकर कर कट किया ॥ ६३ ॥ इसके बाद नन्दा चम्पिकाको लिए हुए भरतके सामने पहुंचकर कहने लगी - ये शत्रुघ्नके बड़े भाई भरत कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ६४ ॥ ये भी रामकी सेवा करते हैं। इन शान्त युवा एवं दयितप्रिय भरतको वर लेती तुम इसी तथा भरतके साथ सरयूल जलमें विहार करोगी। हे धीठीके नहीं तब तो चम्पिकाका संकेत पाकर नन्दा लक्ष्मणके सामने पहुंची ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ वह चम्पिकासे कहने लगी-ये सुमित्रा के गर्भसे उत्पन्न लक्ष्मण हैं। ये अपाडतोपे युक्त हुए रामकी सेवा करते हैं। तू इन सुन्दर, मेघनादका नाश करनेवाले और शेष भगवान्के अंशसे उत्पन्न लक्ष्मणके साथ व्याह करके उर्मिलाकी बहिन बन जा ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ उस बहिनको रामक सेवक, छत्रचमरादिहीन तथा व्याहे सुनकर उसने तीनों भाइयोंमेंसे किसी को भी नहीं पसन्द किया ॥ ६९ ॥ इसके बाद चम्पैके संकेत करनेपर वह आगे बढती हुई रामचन्द्रजीके सामने जा पहुंची। तब दासी रामकी स्तुति करती हुई इस तरह बोली- ॥ ७० ॥ हे चम्पिके ! तुम्हारा अहोभाग्य है, जो तुम रामचन्द्रजीको देख रही हो और मैं भी धन्य हूँ जो रामकी स्तुति करनेके लिए इनके सामने उपस्थित हुई हूँ ॥ ७१ ॥ कहाँ मैं एक मन्दमति नारी और कहाँ गुणोंके सागर रामचन्द्र । मैं इनकी स्तुति कानम कैसे समझ हा सकती हूँ जब कि वाल्मीकि जैसे महान् कवि भी पूरी तौरसे वर्णन नहीं कर सके ॥ ७२ ॥ उन्होंने सौ करोड़ श्लोकान्नों से वर्णन किया है जो केवल उनके सौ करोड़ अक्षरोंकी स्तुति हुई है ॥ ७३ ॥ मैं अपनी बुद्धिके अनुसार थोड़ी-सी स्तुति कर रही हूँ, सो सुन । ये सूर्यवंशके भूषण, महाराज दशरथके पुत्र, कौशल्याके तनय और साक्षाद्व्यापक महान् नारायण हैं । इन्होंने दुष्ट ताड़काका वध करके विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा की है ॥ ७४ । ७५ । इन्होंने अहल्याका शापसे मुक्त किया और शिवधनुष तोड़ा है । ये सीताके वल्लभ, परशुरामके कोपरूपी वनके दवानल, राजाओंके समूहको जीतनेवाले तथा भरतके जीवनदाता हैं ॥ ७६ । ये पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले, भाई तथा सीता के साथ वनोंमें रहनेवाले, विराधके नाशक, श्यामरूपधारी और खर-दूषणके नाशक हैं ॥ ७७ ॥ त्रिशिरा तथा मृगरूप धारण करनेवाले मारीचके वधकर्त्ता, कबन्ध तथा बालिको मारनेवाले, समुद्रमें सेतु बाँधनेवाले और लङ्कानिवासी राक्षसोंके विना-

३५४ आनंदरामायणे [ सर्गः २

जानकीत्यागकर्त्तारं सीतार्ग्रहणतत्परम् । कुशलवसङ्ग्रावां च वाजपर्थे युद्धकारिणम् ॥८०॥ एकपत्नीव्रतं शांतं सत्यभाषणतत्परम् । एकवाणमसंख्यातनामानं मरुनिध्वजम् ॥८१॥ कोविदारध्वजं वानरध्वजं वज्रध्वजं शुभम् । तार्थ्यध्वजं पुष्पकस्थं तार्थ्यवाय्वजवाहनम् ॥८२॥ नानाराजावतंसस्थमणीदीप्त्यांत्रिशोभितम् । वासिंहासनतासीनं छत्रचामरमण्डितम् ॥८३॥ वरयेनं चंपिकेत्वं सीतया सह राघवम् । सप्तद्वीपशियं सप्तद्वीपविभोर्पीडि च ॥८४॥ बाणः पत्नीचरो यस्य मान्यो यः खेदृदन्तथा । नवरत्नमल्लिकायस्य प्रीत्याथो कुरु मा वृज ॥८५॥ इत्युक्ता नदया बाला स्वरूपपुण्या विशेषतः । न वरञ्च मृगे रामे सीतां संस्मृत्य चंपिका ॥८६॥ एकपत्नीव्रतं शमं सीतया वयनेति च । खेदं मा चर तत्कण्ठे मालां मा कुरु वादिनि ॥८७ तत्सखसंज्ञया नंदा तां निनाय कुशं प्रति । प्रोवाच मधुरं वाक्यं कुशवर्णनहर्षिता ॥८८॥ एनं पश्याल्पवयसं श्रीरामतनयं कुशम् अनर्काण्वगृहं शंतनु भार्य्याथिनं शुभम् ॥८९॥ लवाग्रजं धनुर्वेदिनिपुणं विनयान्वितम् । पित्रा सङ्ग्रामकर्त्तारं वाल्मीकिमुनिशिक्षितम् । ९०॥ एनं वृणीष्व बाले त्वं सुरमानवसन्तनुतम् । नवरत्नमयीं मालायस्य कण्ठे स्वयं कुरु ॥९१॥ इति नन्दावचः श्रुत्वा सस्मिता सा स्मितानना । मुमोच मालिकां कण्ठे स्वकराभ्यां कुशस्य हि ९२॥ तदा निनेदुर्वाद्यानि तुष्टुवुर्वन्दिमागधाः । लज्जयाधोमुखो रेजे सभायां कुशवालकः ॥९३॥ तदा तुष्टो भूरिकीर्तिः कुशांके चम्पिकां शुभाम् । स्थापयामास वेगेन पश्यत्सु नृपतीषु च ॥९४॥


शक महाप्रभू है । ७८ ।। रावणको मारनेवाले सीताके साथ राज्य करनेवाले, तीर्थयात्राकर्त्ता एव सीताके साथ विहारकारी है । ७९ । इन्होंने सीताका त्याग किया और फिर वापस बुला लिया । इन्होंने अपना यज्ञ पूर्ण करनेके लिए अपने बेटो लव कुशके साथ भी युद्ध किया था ॥ ८० ॥ ये एकपत्नीव्रती, शान्त, सत्यवादी, एक बाण तथा असंख्यनामधारी है। ये कोविदारध्वज, वानरध्वज, वज्रध्वज तथा गरुडध्वज हैं। पुष्पक, गरुड़ तथा हनुमान्जी इनके वाहन है। ८१ ।। ८२ ।। ये बहुतस राजाओके मुकुटमणि है ओर मोतियोंके प्रकाशसे इनका चरण सुशोभित रहता है। ये एक अच्छे सिंहासनपर बैठे है और उनपर सुन्दर छत्र चमर शोभित रहता है ।।८३।। हे चम्पिके ! तू इन्हें वर ले ओर सीताके साथ रहती हुई इनकी सेवा कर । ये सबो खण्डा एवं सातूं द्वीपोंके अधिपति हैं ॥ ८४ ॥ ये किसी अन्य स्त्रीविषयक बातोको बाणकी नाईं समझते हैं। अब तू किसी प्रकारका सोच-विचार न करके यह नवरत्नोंकी माला इनके गलेमें डाल दे ।८५ । इस प्रकार नन्दाके समझाने-पर भी भाग्यवश तथा सीताका स्मरण करके राम था उसे पसन्द नहीं आया । ८६ । दूसरे नन्दाने भी अपने वर्णनमें कहा था कि एकपत्नीव्रता है, इसलिए सीतया अर्थात् सीताके साथ रहना पसन्द न कर ।॥८७॥ तत्पश्चात् चम्पिकाके सङ्केतसे नन्दा उसे कुशके सामने ले गयो और इस तरह कुशका भी वर्णन करती हुई कहने लगी-॥ ८८ ॥ इनको देखो, इनका अभी थोड़ी उमर है। ये रामके तनय तथा सीताके पुत्र हैं। इनका नाम कुश है। ये लवके बड़े भाई हैं। अभी इनका विवाह नहीं हुआ है। इसलिए ये भार्यार्थी हैं, ये धनुर्वेदमे निपुण, विनीत स्वभाव पिताके साथ सङ्ग्राम करनेवाले और महामुनि वाल्मीकिके शिष्य हैं ।। ८९ ।। ९० ।। अतएव मनुष्यों और देवताओंस सन्न इन कुशको पसन्द करके तू इनके कंठमे यह नवरत्नमयी माला डाल दे । ९१ । इस प्रकार नन्दाकी बात सुनकर दी हँसकर उसने अपने हाथोंसे कुशके गलेम वरमाला डाल दी ॥ ९२ । उस समय विविध प्रकारके बाज बज उठे और बन्दीजन तथा भाट ने स्तुति की । उस सभामे लज्जासे नीचा मुख किये बैठा हुआ बालककुश ही सुन्दर लग रहा था ॥ ९३ ॥ उस समय प्रसन्न होकर राजा भूरिकीर्तिने सब राजाओके सामने ही चम्पिकाको कुशकी गोदमें बिठा

सर्गः ३] विवाहकाण्डम् [३५५]


वरार्थं जालश्रेन् प्रसार्यैषा विदेहजा मुमोद नितरां स्त्रीभिर्मुमोद राघवोऽपि सः । ९५। इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे चम्पिकास्वयंवरो नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

(द्वितीय राजकन्या सुमतिके स्वयंवरका वर्णन)

श्रीरामदास उवाच

अथार्या सा समादाय सुमतिं भोजगामिनीम् । नृपर्नीत्या नदिग्भागात्सुनन्दा धृतयष्टिका ॥ १ ॥
क्रमेण वर्णयामास द्विपकक्षास्थां सुलोचनाम् । बाले शृणुष्व मे वाक्यं दर्शयन्ती नृपोत्तमम् ॥ २ ॥
अवन्तिस्थं चोद्बाहुनामानं च मनोरमम् । नानेन सदृशः कश्चित्पृथिव्यां वर्तते नृपः ॥ ३ ॥
वरयैनं नृपं माऽग्रे गच्छ त्वं गजगामिनि । अस्य त्वं महिषी भूत्वा क्षिप्रातीरेऽथ संकटे ॥ ४ ॥
दत्तमेधमभिधानेन मृगं क्रीडय भामिनि । अनुत्तमं चेति वाक्यं दृष्ट्वा सा सुमतिः पुरा ॥ ५ ॥
श्रुत्वा मैनं वरयेति सुनदाया वचः पुनः । श्रुत्वा नां संदधौमाम् मा वा नोत्वा नृपान्तरम् ॥ ६ ॥
सुनन्दा सुमतिं प्राह पश्यैनं त्वं नृपं परम् । अंगनावल्लभं श्रेष्ठं विदर्भनिलयान्वितम् ॥ ७ ॥
दूरूढवयसं मा बाले दुर्बलं त्वं नृपोत्तमम् । ह्यद्यापि स्वल्पवयसं भुजकेशरिमण्डितम् ॥ ८ ॥
अस्य त्वं महिषी भूत्वा पयोष्णीजलराशिषु । सुखं कुरु जनक्रीडां नृपेणानेन भामिनि ॥ ९ ॥
एन दुर्गुन्ध मा चेति शृण्वन्त्या सुलोचना । अग्रे गन्तुं सुनन्दां सा नोदयामास सञ्ज्ञया ॥१०॥
ततोऽग्रे नृपतिं नीत्वा सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं नृपतिं बाले देशे मागधसंज्ञके ॥११॥
राज्यं करोत्ययं श्रीमानात्मना ख्यात परः । वरयैनं नृपं माऽग्रे गच्छ त्वं पार्थिवोत्तमम् ॥१२॥
अस्य त्वं महिषी भूत्वा गङ्गासङ्गमवारिदे । कनकौघं सदा क्रीडां हेमन्ते भज भामिनि ॥१३॥


दिया ॥ ९४ ॥ अगरारु राजाने मन में यह सङ्कल्प कर लिया था, बहुत प्रसन्न हुए और रामचन्द्रजी भी अत्यन्त प्रसन्न हुए । ९५ ॥ इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित 'सरल' भाषानुवादसहितो द्वितीयः सर्गः समाप्तः ॥ २ ॥

श्रीरामदास बोले—तदनन्तर सुनन्दा हाथमें छड़ी लिये हुए सुमतिका हाथ पकड़े राजाओंके सामने ले जाकर ईशान कोणसे क्रमशः एक-एक राजाको दिखाकर इस प्रकार वर्णन करती हुई बोली—हे बाले ! मेरी बात सुनो, राजाओमें श्रेष्ठ इस राजाको देखो ॥ १ ॥ २ ॥ यह अवन्ति देशका रहनेवाला है। उद्बाहु इसका नाम है । पृथ्वीमण्डलपर इसके समान कोई राजा नहीं है । हे गजगामिनि ! तू आगे मत बढ़ इनको वर ले। इसकी रानी बनकर तू क्षिप्रा नदीके तटपर बने हुए बागमें आनन्दपूर्वक विहार करोगी । सुनन्दाने "अनुत्तमम्" तथा "एनं मा वरय" इन दो वाक्योंका दो अर्थमें प्रयोग किया था । उसका एकसे प्रशंसा और दूसरेसे निन्दा होती थी। इस कारण सुमतिको वह राजा पसन्द नहीं आया और उसने आगे बढ़नेका संकेत किया ॥ ४-६ ॥ सुनन्दा उसे दूसरे राजाके सम्मुख लाकर कहने लगी—यह विदर्भ देशका निवासी अनुत्थ नामक राजा है ॥ ७ ॥ तू इसे मत छोड़ । इसीको अपना पति बना ले, यह इसक इनका रचता है। इसकी थोड़ी उमर है और बाहुओंमें विपुल बल हुआ है ॥ ८ ॥ पयोष्णी नदीके तटपर इसके साथ सानन्द जलविहार कर ॥ ९ ॥ यहाँ भी बात्रीके 'एनं मा दुर्गुन्ध (इस मत कर )' यह वाक्य सुनकर उसने आगे बढनेका संकेत दिया ॥ १० ॥ तदनन्तर सुनन्दा उसे दूसरे राजाके सामने ले जाकर बोली हे बाले इस राजाको देख, यह कुरुपति मगध देशमें राज्य करता है। यह बड़ा श्रीमान् है। इसे लोग परन्तप कहते हैं। बस, तू इसी श्रेष्ठ राजाको अपना पति बना ले—और किसीके पास मत जा ॥ ११ ॥ १२ ॥ इसको अपना पति बनाकर गङ्गाके दिनोंमें तू सदा अट्टालिकाओंके सामने उसके क्रीड़ा किया करेगी।

२५६आनन्दरामायणे[सर्गः ३

मौनं नृपं वरयति शिक्षिता सा सुनन्दया । सोऽग्रमायेति वृद्धां मां वाग्मिन्निन्द्ये नृपांतरम् ॥ १४ ॥ सुनंदा बालिकामह शृणुष्व मृगलोचने । पश्यैनं नृपतिं रम्यं द्राविडे विषये स्थितम् ॥ १५ ॥ कम्बुकंठाख्य मेनं शान्तिपूर्णां निवासिनम् । एनं नृपं गुणाढ्याद्य मा व्रजान्य दर्शनम् ॥ १६ ॥ कान्तिपूर्णोपवनं त्वं सर्वतीर्थमनोमे । क्रीडां मजस्व विस्तीर्णे हेमकङ्कणशिञ्जिते ॥ १७ ॥ विष्णुं वरदराजाख्यं त्रियत्रेकाम्बराख्यकम् । पूजयस्व मदाज्ञेव कम्बुग्रीवन्मृदेश्वरम् ॥ १८ ॥ कुर्गाच्चैनं नृपं माद्य माहात्म्यनृपसत्तमजः । इति वृद्धावचः श्रुत्वाऽग्रे तां गन्तुं प्रबोदयत् ॥ १९ ॥ सुनंदाऽन्यं नृपं नीत्वा सुमतिं वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं नृपतिं मुख्ये मत्तमातङ्गगामिनि । २० ॥ कर्णाटविषयस्थं म्व विजये पार्थिवात्मजम् । कमलस्य सङ्ग्रहस्तं कमलोद्भिगमूज्ज्वलम् ॥ २१ ॥ स्मितास्यं कञ्जनयनं विजयाख्यपुरस्थितम् । शृणुष्व वचनं मेऽद्य पूर्णायैनं सुरीजनम् ॥ २२ ॥ अस्य त्वं महिषी भूत्वा वने कृष्णादीजले । मुग्य नृपेण क्रीडस्व मद्वाक्यं शृणु मा व्रज । २३ ॥ मद्वाक्यं शृणु मेत्युक्ता श्रुत्वा वाक्यमनुत्तमम् । अग्रेति सूचिता बाला चोदयामास तां पुनः ॥ २४ ॥ एवं नानारूपाणां च वर्णनानि पृथक् पृथक् । स्तुतिरूपनिषेधौनि श्रुत्वा द्व्यर्थानि बालिका ॥ २५ ॥ न वरम् मनः कस्मिश्चिन्नृपौ तेषु सा तदा । ततस्तां शिविकामस्थां सुनंदा च शनैः क्रमात् ॥ २६ ॥ अतिक्रम्य राममंत्रिबालकानपि पूर्ववत् । यूपकेतुं शिशुं नीत्वा बालिको वाक्यमब्रवीत् ॥ २७ ॥ शत्रुघ्नतनयं बालं यूपकेतुं मनोहरम् । पितृव्यं राममनुसद्व्याख्यानुवर्तिनम् । २८ ॥ एनं पश्य बालिके त्वं सावधानमना भव । वरयैनं यूपकेतुं माऽग्रे गच्छ नृपात्मजे ॥ २९ ॥ मैनं वरय गच्छाग्रे वृद्धया हेति चोदिता । सुनन्दा वाद्यमानाग्रे गन्तु सुमतिः पुनः ॥ ३० ॥ सुबाहुं पुष्करं तद्वन्मेवं सा सुमतिः शनैः । चित्रकेतुप्रभृतं च त्यक्त्वा सा तु लवे ययौ ॥ ३१ ॥

॥ १३ ॥ यहाँ तो सुनन्दान "एते नृपा मा वरय (इस राजा को मत वर,' यह द्व्यर्थक वाक्य कहा था जिससे सुमतिने आगे चलनेका संकेत दिया। तब वह उसे दूसरे राजाके सम्मुख ले गयी ॥ १४ ॥ और कहने लगी—हे मृगलोचनी ! इस सुन्दर राजा को देख, यह द्रविड देशका निवासी है ॥ १५ ॥ इसका कम्बुकंठ नाम है। वह शान्तिपुरका रहने वाला है। तू इस सब गुणवान् राजाको वरनेकी इच्छा मत कर ॥ १६ ॥ कान्तिपुरीमें तू अतिशय विशाल सुवर्णकमलोंसे युक्त मनोहर सर्वतीर्थम इसके साथ आनन्द विहार करेगी और इसके साथ वरदराज नामक विष्णु भगवान् तथा त्रियंत्रेकाम्बर नामक शिवका पूजन करेगी। साधारण राजाओंकी तरह इसे भी न छोड़, इसको वर ले। इस प्रकार वृद्धा सुनन्दाकी बात सुनकर सुमतिने उसे आगे चलनेका संकेत किया ॥ १७-१९ ॥ तब सुनन्दा उस दूसरे राजाके पास ले जाकर कहने लगी—हे मुख्ये ! हे मत्तमातङ्गगामिनि ! तू इस राजा को देख ॥ २० ॥ यह कर्णाटक देशका रहनेवाला विजय नामक राजा है। कमलके समान इसका मुख है और कमलके ही समान इसके हाथ-पैर भी हैं ॥ २१ ॥ इसका मुख सदा मुस्कुराता रहता है। कमलोकी कलियोसी नन्हीं इसकी आँखें हैं। यह विजयपुरका निवासी है। तू मेरा बात मानकर इसे अपना पति बना ले ॥ २२ ॥ इसकी राजमहिषी बनकर तू बना तथा कृष्णा नदीके जलमे सानन्द विहार करेगी। मेरी बात मानकर तू और आगे मत बढ़ ॥ २३ ॥ "मद्वाक्यं मा शृणु (मेरी बात सुन)' यह बात सुनकर उसने सुनन्दाको आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ २४ ॥ इस प्रकार अनेक राजाओंके वर्णन जो वास्तवमें निषेधमय थे, किन्तु ऊपरसे स्तुतिवाक्य मालूम पडते थे। ऐसे द्व्यर्थक वाक्योंको सुन-सुनकर बालिकान उन राजाओमें किसको भी नहीं पसन्द किया। तब सुनन्दा शिविकामें बैठी हुई सुमतिको लेकर धीरे-धीरे रामके मन्त्रिगणोको छोडकर यूपकेतुके सामने गयी ओर कहने लगी—। २५-२७ ॥ ये शत्रुघ्नके सुन्दर पुत्र यूपकेतु हैं। ये पितृव्य (ताऊ) रामके बताये हुए कुल वृत्तके अनुगामी हैं ॥ २८ ॥ हे बालिके ! तू अब अपना मन सावधान करके इन्हें देख । हे नृपात्मजे ! अब भाग न जाकर तू इन्हींको अपना पति बना ले ॥ २९ ॥ 'मा एनं वरय अग्रे गच्छ (इसे न वर, आगे चल)' यह सङ्केत पाकर सुमतिने

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५७

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५७

लवार्पणैषणां बालां सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं बालिके बालं लवं श्रीराघवात्मजम् ॥३२॥ स्त्रीकामं स्वल्पवयसं सीतालालितमुत्तमम् । वाल्मीकिकृपया लब्धविद्यं रम्यं कुशानुजम् ॥३३॥ वृणोन्मेनं सुखेनैनं कण्ठेऽस्य मालिकां कुरु । कुशाङ्के चन्द्रिकेयं ते स्वसा यद्वत्स्थिताऽथ हि ॥३४॥ तथा त्वमपि भो मुग्धे लवाङ्के संस्थिता भव । इति तस्या वचः श्रुत्वा सुनन्दायाः स्मयानना ॥३५॥ लवस्य कण्ठे हर्षेण लज्जयाऽवनतानना । सुमतिर्निजहस्ताभ्यामर्पयामास मालिकाम् ॥३६॥ तदा निनेदुर्वाद्यानि जगुस्ते गायकास्तदा । ननृतुश्चाङ्गनाश्चैव तुष्टुवुर्बन्दिसङ्घाः ॥३७॥ भूरिकीर्तिर्नृपस्तुष्टो लवाङ्के सुमतिं तदा । शीघ्रं निवेशयामास परिपूर्णमनोरथः ॥३८॥ तोषमाप स्नुषादृष्ट्वा सीता प्रासादसंस्थिता । जानक्यैः सपत्नीकं लवं दृष्ट्वा तुतोष सा ॥३९॥ ततः सर्वान्नृपान् पूज्य भूरिकीर्तिर्नृपोत्तमः । प्रार्थयामास विनयवचनैस्तत्पुरस्तः स्थितः ॥४०॥ विवाहकौतुकं दृष्ट्वा भवद्भिर्गम्यतामिति । तथेति ते नृपा प्रोचुर्ययुश्चावसथानि हि ॥४१॥ रामेण सङ्गरं कर्तुमसमर्था गतश्रियः । म्लानानना मनोन्मोहाः कामबाणप्रपीडिताः ॥४२॥ रामोऽपि बन्धुमित्रैर्ययौ वासस्थलं मुदा । अथापरे दिने रामं भूरिकीर्तिः समाययौ ॥४३॥ पुरोधसोपविष्टः सन्नत्वा रामं वचोऽब्रवीत् । द्रष्टव्यो लग्नदानाय सुमुहूर्तः सुखावहः ॥४४॥ प्रार्थनां कुरु रामाद्य भक्तदास्यैककामुकम् । उभयोश्च मण्डपयोः कार्याण्याज्ञापय प्रभो ॥४५॥ तथेति राघवश्चोक्त्वा वसिष्ठं चोदयत्तदा । सोऽपि गणयित्वा ज्योतिषशास्त्रज्ञैः परिवेष्टितः ॥४६॥ मुहूर्तं कथयामास पञ्चमेऽहनि राघवम् । ततस्तुष्टो भूरिकीर्तिर्गणेशं लग्नपत्रिकाम् ॥४७॥

सुनन्दाको आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ ३० ॥ इसी प्रकार सुबाहु, पुष्कर, तदा, चित्रकेतु तथा अंगदको छांड़ती हुई वह लवके पास पहुंची ॥ ३१ ॥ जब सुमति लवकी ओर देखने लगी तब सुनन्दा बोली- हे बाले ! इस बालकको देख यह रामका पुत्र है, यह अपना विवाह करना चाहता है इसकी थोड़ी उमर है । सीताके द्वारा इसका पालन-पोषण हुआ है, वाल्मीकि कृपासे इसे उत्तम विद्या प्राप्त हुई है और यह कुशका छोटा भाई है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ तू सानन्द इसे अपना पति बनाकर इसके गलेमें वरमाला डाल दे, जिस तरह तुम्हारी बहिन चन्द्रिका कुशकी गोदमें बैठी है उस तरह या मुग्धे ! तू भी लवकी गोदमे बैठ जा । इस प्रकार सुनन्दाकी बात सुनकर वह मुस्कायी और लज्जावश मस्तक झुकाकर उसने अपने हाथोंसे लवके गलेमे वरमाला डाल दी । ३४-३६ ॥ उस समय अनेक प्रकारके बाजे बजे, गायकोंने गाने गाये, वेश्यायें नाचने लगीं और बंदीजन स्तुति करने लगे ॥ ३७ ॥ महाराज भूरिकीर्तिने प्रसन्न होकर सुमतिको लवकी गोदमें बिठा दिया ॥ ३८ ॥ यह देखकर रामचन्द्रजी तथा अटारीपर बैठी सीता दोनों प्रसन्न हुए । जब झरोखोंसे सीताने लवकी गोदमें सुमतिका बैठा देखा, तब उनकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं रहा ॥ ३९ ॥ इसके अनन्तर राजा भूरिकीर्तिने वहाँ आये हुए सब राजाओंका पूजा करके विनयपूर्वक प्रार्थना की-॥ ४० ॥ अब आप लोग विवाहका भी उत्सव देखकर जाइगा। राजाओंने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और अपने-अपने डेरेपर चले गये ॥ ४१ । वे सब राज रामसे युद्ध करनेमे असमर्थ थे । अतएव उनकी श्री नष्ट हो गयी थी, दुख दुस्सह होगया था उत्साह भंग हो गया था और कन्दर्प कामके बाणोंसे पीड़ित हो रहे थे ॥ ४२ ॥ राम भी अपने भाइयों और बान्धवोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक डेरेपर गये । इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्ति रामके पास पहुंचे ॥ ४३ ॥ पुरोहित उनके साथ था। वे रामके समक्ष बैठे और कहा कि कोई अच्छा लग्न- दिवस तथा सुखदायक मुहूर्त विचारिए । फिर कहा- हे राम ! अपने चरणके भक्त मुझ दासकी प्रार्थनाको अङ्गीकार करके दोनों मण्डपोंके लिए जो कार्य करने हैं, उनके लिए आज्ञा दीजिए ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ 'अच्छा' कहकर रामने वसिष्ठकी ओर संकेत किया । वसिष्ठ रामका आज्ञासे ज्योतिषशास्त्रको जाननेवाले कितने ही पण्डितोंके साथ विचार करके उनके पांचवें दिन विवाहका शुभ मुहूर्त बतलाया । इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे भूरिकीर्तिने गणेशजी, लग्नपत्रिका, गणकों, पण्डितों, वैदिक आदिको तथा रामके साथवाले बंधुजनों और

३६८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २


सम्पूज्य गणकान्सर्वान्पूजयन्तान्समस्तशः । सुवस्त्रादिभिः सर्वैः सीतायै शुभमन्वदात् ॥४८॥ नत्वा रामं गृहं शश्वन्नकार मण्डपादिकम् । गत्वाऽऽज्ञां लक्ष्मणादेस्तु चकार मण्डपादिकम् ॥४९॥ तदा बडूपुरी रम्या पताकाध्वजसंवृता । पुरूषोत्तमराजधानी रेजे सागररोधसि ॥५०॥ ततो मुहूर्तसमये वधूश्छिद्रां निशां कुशम् । लबं च लिप्त्य नेत्राक्तं भीताद्या मातरस्तदा ॥५१॥ कुङ्कुमांग्रतदिक्षु जलपूर्णांन्महींऽकार संस्पृश्य स्नाप्य मासुमहानद्यमृतःपरम् ॥५२॥ तैलाभ्यंगं निशायुक्तं पीत या.स्तीपदालकैः । सदैवं चक्रुस्तन्दूढैर्त्वा रुक्ममर्पिताः ॥५३॥ अभ्यंगपूर्वकं मज्जुस्ते रामाद्याश्चादा मुदा । ममाहृय ततः सीता मुक्तानां स्वस्तिकोपरि ॥५४॥ वसिष्ठो मुनिभिर्युक्तः शिशुभ्यां राघवेण हि । गणपार्चां कारयित्वा पुण्याहादित्रयं क्रमात् ॥५५॥ देशाचारानुकुलाचारानिष्टदेवीं प्रपूज्य च । कुलयागस्य विधिवत्कृत्वा देवकस्य च ॥५६॥ तदा जनकनन्दिन्या रजनीकुंकुमान्विते । रेजतुः सुरक्तपादैर्नखराः पदपङ्कजे । ५७। सीताद्यास्ताः स्त्रियः सर्वा हरिद्रावर्णवस्त्रैः । हेमवस्त्रैश्च संवीताः पुण्ड्रपात्रणे ॥५८॥ ततः समाययुः सर्वे मुदा तत्र मुनीश्वराः । स्वयमग्रे मवे पूर्व नागता ये सहस्रशः ॥५९॥ श्रुवोत्साहं विवाहस्य कुशस्य च लवस्य ते, तान्सर्वान् रामचन्द्रोऽपि वस्त्रामरणधेनुभिः । ६०॥ पूजयामास विधिवत् स तया लक्ष्मणादिभिः । भूरिकान्तिर्नृपैर्युक्तो महाराजपुरन्दम् ॥६१॥ स्वयं कुशलबौ गेहं नेतुकामः समाययौ । मण्डपे पूजयामास वीरो रात्रः सुतस्तदा ॥६२॥ कुशं तथा लवं चापि कनीयान् भूरिदीधितः । हसनसुद्धवस्तिक्षेपैर्दाभरणार्दिभिः ॥६३॥ तदा विरेजतुर्र्वालौ तथा नेपथ्यमाददतः । ततस्तौ वण्ठन्त्यौ दिव्यचामरवीजितौ । ६४॥ पश्यन्तौ नर्तनान्द्यग्रे वाराङ्गणां स्थितास्ततो शृण्वन्तौ वाद्यघोषांश्च धणिनां मागधादिभिः । ६५॥


गुप्तोंके साथ सब प्रकार पूजा की ॥४८॥ इसके उपरान्त राम को प्रणाम कर अपने घर गये और वहां मण्डपादिककी तैयारी करने लगा । राजा जनकजी कुश तथा लव को लाये, जनकसम्पूर्ण ॥४९॥ उस समय समुद्रके तटपर स्थित पुरुषोत्तमराजधानी बडूपुरी ध्वजा पताकाओंसे संवृत होकर अतिशय सुन्दर और शोभित हुई ॥५०॥ इसके उपरान्त मुहूर्तके समय भयभीता माता जनकनन्दनी सीताजी ने कुश और लक्ष्मणकी भांतिसे बालकोंको उबटन लगाकर काजर आँजकर पूर्वदिशामें कलश रखकर ओर करकुम्भ (करवा) रखकर मोतियोंके ऊपर रखकर नहलाया। फिर बहुत प्रकारके पदार्थोंसे स्नान कराया ॥५१॥ ५२॥ उन बालकोंपर माताओंने पीत आदि प्रकारके वस्त्रोंसे आच्छादित करके उबटन लगाया ॥५३॥ फिर उबटन लगाकर उन सबके साथ रामने भी स्नान किया। इसके अनन्तर राम माताका बुलाकर मोतियोंसे बने हुए स्वस्तिक चौकके ऊपर बैठे और बहुतसे ऋषियोंके साथ आकर वसिष्ठने दोनों बालकके साथ रामके द्वारा गणेशजीकी पूजा करवायी और क्रमशः तीन प्रकारके पुण्याहवाचन करवाये ॥५४। ५५॥ तदनन्तर देशाचार तथा कुलाचारके अनुसार इष्टदेवकी पूजा करके विधिवत् देवताकी स्थापना की ॥५६॥ उस रात्रिके समय कुमकुम रंजित वस्त्र पहने हुए वरनोंके बालक बहुत ही सुन्दर लग रहेथे ५७॥ इनके सिवाय हरे, पीले, लाल और सुनहले कपडे पहन स्त्रियां भी बहुत भली लग रहीथी ॥५८॥ इसी समय में हजारों ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक वहां आ पहुँचे जो स्वयंवरके उत्सवमें नहीं आये थे ॥५९॥ वे भी कुश लवका विवाहोत्सव सुनकर आ गये। रामचन्द्रजीने भी सजा तथा वधुओके साथ अनेक तरहके वस्त्र-आभूषण तथा गौवें देकर उनकी पूजा की ॥६०॥६१॥ इसके बाद बहुतसे राजाओंके साथ कुश-लवको लेनेके लिए महाराज भूरिकान्ति आये वहाँ पहुँचकर भूरिकान्तिने दुष्ट और पुत्रोंके सवर्णके लागेक कामदार बहुतसे वस्त्र और आभरण देकर कुश-लवको पूजा की ॥६२।६३॥ उस समय वे दोनों बालक तथा बडूद आदि वीर बच्चे बहुत सुन्दर दीख रहे थे। इसके अनन्तर कुश और लव हाथपर बैठकर चले। उनपर दिव्य चमर ढलने लगे ॥६४॥ वे दोनों बालक वारांगनाओंका नृत्य देखते और विविध प्रकारके बाजोंकी मीठी ध्वनि

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५९

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५९

सीतादिभिर्वारिणीषु संस्थिताभिन्मवा पथि । प्रासादोपरि मध्याभिर्नारीभिः पुष्पवृष्टिभिः । ६६॥ हरिद्रापीतधान्यैश्च माङ्गल्यैर्मौक्तिकैरपि लाजभिर्हेमपुष्पैश्च वर्षितावीक्षितौ मुहुः ॥ ६७॥ जग्मतुर्वालकावेवं पश्यन्तौ कौतुकानि हि । ददर्शतुरवाटिकाश्च सुवर्णवृष्टिविनिर्मिताः ॥ ६८॥ तथा कृत्रिमवृक्षांश्च पताकाश्च ध्वजांस्तथा तथौषधिमयान्वृक्षांन् वह्निस्पर्शविदीपितान् । ६९॥ घाटस्थानौषधीभिः पूरितान्कृत्रिमान् जनान् । तथा व्याघ्रादिकान््रहिंस्रान्नेपथ्यैश्च प्रपूरितान् ॥७०॥ तडित्समभ नां न रूपने प्रासादानौषधीमयान् । केकिचक्रोपमादींश्च चन्द्रज्योत्स्नास्तु कृत्रिमाः ॥७१॥ एवं ददर्शतुर्नानाकौतुकानि नृपात्मजौ तन्पत्नौ भूरिकीर्तेश्च मन्त्रा मण्डपमुत्तमम् ॥७२। नानामहोत्सवैर्यक्तौ नानच्छत्रमण्डितौ अवतीर्य गजेन्द्राभ्यां नस्थतुर्मण्डपांगणे ॥७३। मधुपर्कविधानादि विधानेनि वै क्रमात् । विर्धुरू चक्रतुस्तौ ब्राह्मणैः पारेवेष्टितौ ॥७४। ततो वद्ध्वोः पूजनं च र्मात्यः रघुनन्दनः चकार गुरुणा युक्तस्तदा स मण्डपांगणे ॥७५॥ ततो लग्नमुहूर्ते नं कुत वशिष्ठस्य गुरुः । नया त्वं मुफ्यापि पृथग्वेदिकयोस्तदा ॥७६। कृत्वा सुसंस्थितौ चौतौ दम्पत्योरन्तरे पटो । धून्तोमयैः पृथक् चित्रौ नूतनौ हेमतन्तुजौ ॥७७॥ नानामगलरोषांश्च मुनेर्विक्रममुद्रैः । अगन्तवे जनास्तृष्णीं शृण्वंतो मंगलस्वनम् ॥७८।

इति श्रीशतकोटिकामचरित्रांर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे सुरासुरविवाहवर्णनं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


एवं वन्दोजनोंकी स्तुतियां सुनते हुए राजा भूरिकीत्तिके महलोंकी ओर चले जा रहे थे ॥ ६५ ॥ सीतादिक माताएं हविशियोंपर बैठी थीं। प्रासादोंपर बैठी हुई नगरवासिनी नारियां उनपर फूल बरसा रही थीं। साथ बीचमें हल्दीसे रंगे पीले रंगके अन्न, मागुल्य मोक्तिक, धानके लावे और सुवर्णके बने फूल भी बरसते जा रहे थे। वे नारिया तृण लकी प्रेमभरी दृष्टिसे निहार रही थीं। इस तरहके कौतुक दखत हुए वे दोनों बालक चले जा रहे थे। रास्तेमें सुवर्णको वनी हुई स भी वाटिकाएं, कृत्रिम वृक्ष, पताका, ध्वजा, इस तरह बने जिसे देख जा आपकी चिनगारी पाकर जलने लगत थे ॥ ६६-६९ ॥ उन्हें और राहोंपर बैठे हुए ओषधिपूण बनावटी मनुष्यों, मसालेसे भरे हुए व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओं, औषधि के संयोगसे बिजलीकी नाई चमकते हुए महलोंतथा मयूर आदिके छूटते हुए चत्रोको वे राज कौतूहल भरी आंखोंसे देखते जा रहे थे । ७० । ७१ । इस प्रकार मार्गमें अनेक कौतुकोंको देखते हुए वे राजा भूरिकीर्तिके उत्तम मंडपमें पहुंचे उस समय लाग में महान् उत्साह दिखायी पडता था। उन बच्चोंपर छत्र लगे थे और दिव्य चमर ढुल रहे थे। यहां पहुँचकर वे हाथी से उतरे और मण्डपाङ्गणम पहुंचे ॥ ७२॥ ७३ । उनके गुरुजनोने ब्राह्मणोंके साथ मधुपर्क विष्टर आदि विधि सम्पन्न किये । ७४ ।। इसके अनन्तर रामने सीता तथा गुरुजनोंके साथ उस मण्डपमें उन दोनों वधुओं की पूजा की ॥ ७५ ॥ तदनन्तर लग्नका मुहूर्त आनेपर गुरु वसिष्ठने कुशकी यम्विकाके साथ एवं लवको नृपतिके साथ अलग-अलग वेदीपर बिठाला ॥ ७६ ॥ इस तरह दोनों वर-वधुआंकी अच्छी तरह बिठाकर उनके बीचमें एक-एक पर्दा डाल दिया और सब लोग चुपचाप गुरु वसिष्ठके मुखसे उच्चरित नाना प्रकारके मागलिक श्लोकों सुनने लगे ॥ ७७ । ७८ । इति श्रीशतकोटिराम-चरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

३६० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४ ]

चतुर्थः सर्गः

( लव-कुशके विवाहका वर्णन )

श्रीरामदास उवाच

श्रीमती रघुनाथश्च गिरिजा शंभुगणेशषण्मुखा
नन्दीगणेशलक्ष्मणौ च भरतः कजोद्भवः शत्रुहा।
सर्वे ते मुनयः सुराश्च दितिजान्तीर्थादिनद्यो नदाः
दिक्पालाः शशिभास्करौ च हनुमान् कुर्वन्तु वो मगलम् ॥ १ ।

तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव सीतापतेर्यत्स्मरणं विधेयम् ॥
एवं मङ्गलघोषैश्च नानावाद्यपुरःसरम् । ततःस्वंतःपटीं मुक्त्वा ऽऽपुण्याहमिति स्मरन् । ३ ॥
तयोस्ते पाणिग्रहणविधानं विधिपूर्वकम् । लाजहोमादिकं सर्वं चक्रतुर्मङ्गलपूर्वकम् ॥ ४ ॥
तदा महावाद्यघोषा निनेदुर्मंडपांगणे । ननृतुर्वारमुख्याश्च तदा मागधवन्दिनः ॥ ५ ।
जगुर्मङ्गलगीतानि तुष्टुवुस्ते महास्वनैः । तदा दानान्यनेकानि चक्रतुस्तौ नृपोत्तमौ ॥ ६ ॥
भूरिकीर्तिरामचंद्रौ महानंदप्रपूरितौ । अथ तौ बालको वध्वौ निजकटगोन्निवेश्य वै ॥ ७ ॥
सीतोर्मिलादिभिः स्त्रीभिर्जग्मतुर्भाजनगृहम् । तत्र गौरीहरौ पूज्य चक्रतुश्चाम्रसिंचनम् ॥ ८ ।
सतः कुशश्चांपिकया सुप्रत्या स लबोऽपि च । चक्रतुर्भोजनं चोभौ स्त्रीभिः सर्वत्र वेष्टितौ । ९ ।
मात्रा सहोपनयने विवाहे भार्यया सह । अन्येन नैव भोक्तव्यं भुक्तं चेत्पतितः स्मृतः । १०॥
रामोऽपि बन्धुभिः पौरैः सुहृद्भिः पार्थिवोत्तमै । चकार भोजनं भूरिकीर्तेः सद्मनि वै मुदा । ११॥
एवं सीताऽपि नारीभिश्चकार भोजनं तदा । भूरिकीर्तेः स्नुषाभिः सा प्रार्थिता वन्दिता मुहुः । १२।
ततो नानारथोत्साहान् भूरिकीर्तिश्चकार सः । अथ तौ बालको रम्यौ स्त्रीवाक्यैर्मातृसन्निधौ । १३॥
स्वश्वश्रूसन्निधौ चापि स्त्रीभिः सर्वत्र वेष्टितौ । स्वस्वपत्न्योः पदयोः शिरोभ्यां नमनं मुहुः । १४।


श्रीरामदास कहते हैं— सीता, राम, गिरिजा, शिव, गणेश, नन्दी, स्वामिकार्तिकेय, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, ब्रह्मा, समस्त ऋषि, देवता, दैत्य, सारे तीर्थ, नदी, दिक्पाल, चन्द्रमा, सूर्य एवं हनुमान्जी ये सब आप लोगोंका कल्याण करें ॥ १ ॥ वही लग्न है, वही सुदिन है और ताराबल तथा चन्द्रबल भी वही है, जिससे कि सीतापतिके स्मरण किया जाय ॥ अनेक प्रकारके बाजोंके साथ इस तरह मङ्गल-घोष करनेके अनन्तर 'अपुण्याहम्' ऐसा उच्चारण करते हुए कनिष्ठांत वस्त्रका दूर कर दिया ॥ ३ ॥ विधिसहित हवनादि कृत्यके साथ-साथ उन दोनों वर-वधुओंके पाणिग्रहण संस्कार किये ॥ ४ ॥ उस समय मण्डपमें महावाद्यघोष हुए, वेश्याएं नाचीं, मागध और वन्दी जनोंने स्तुतिपाठ हुए और गाने गाये गये। उस समय उन दोनों राजाओं (राम और भूरिकीर्ति) ने अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ५ । ६ । दोनों सम्बन्धी उस समय बड़े आनन्दित थे। तदनन्तर दोनों बालक अपनी अपनी स्त्रीको कमरपर बिठाकर सीता-उर्मिलादिकाके साथ भोजनशाला गये। वहाँ उन्होंने शिव-पार्वतीकी पूजा की और आम्रसिञ्चन-विधि सम्पन्न की ॥ ७ ॥ ८ ॥ तब सब स्त्रियोंसे वेष्टित चम्पिकके साथ बैठकर कुशने और सुमतिके साथ लवने भोजन किया ॥ ९ ॥ क्योंकि शास्त्रका कहना है कि उपनयन संस्कारमें माताके साथ एवं विवाहमें अपनी स्त्रीके साथ बैठकर नर भोजन करे और किसीके साथ नहीं। यदि किसी औरके साथ भोजन करे तो भ्रष्ट पतित कहा जाता है ॥ १० ॥ उधर राम जी अपने भाइयों, पुरवासियों, सम्बन्धियों और राजाओंके साथ महाराज भूरिकीर्तिके भवनमें गये और वहाँ भोजन किया ॥ ११ ॥ उसी तरह सीताने भी स्त्रियोंके साथ जाकर भूरिकीर्तिकी बहुओंके प्रार्थना करनेपर उन्हींके यहाँ भोजन किया ॥ १२ ॥ इसके पश्चात् राजा भूरिकीर्तिने विविध प्रकारका उत्सव

सर्गः ४ ]

सर्गः ४ ] विवाहकाण्डम् २६१

चक्रतुस्तोषसम्पूर्णौ ते तत्रापि स्मिताननौ । वधूरथैश्च सर्वे निष्कपीता विरेजिरे ॥१५॥ कुङ्कुमाङ्कितपादी ते ददतुर्लक्ष्मरूपयोः । एवं नानामहोत्साहैर्गतास्तेषां दिनत्रयम् ॥१६॥ चतुर्थे दिवसे रात्रौ वध्वाप्तविराजिते । दर्पणेनार्त्तिजैर्नौ चांसौ बालको तौ विरेजतुः ॥१७॥ ततस्तौ बालकौ पत्न्योः स्वस्वस्याङ्के निवेश्य च । चक्रतुस्ताण्डवं नृत्यं कुशलौ मण्डपांगणे ॥१८॥ मातृश्वश्वादिकासु पश्यत्सु च समासदम् । यौतुकं भूरिकीर्त्तिः कुशाय च लवाय च ॥१९॥ ददौ तुष्टमनाः श्रीशं रामसम्बन्धहर्षितः । नियुतानां गजेन्द्रांश्च शिविकाश्चापि तन्मिताः ॥२०॥ तुरङ्गान्रथसंयुक्तान् नियुतान्सन्ददौ द्वयोः । ताभ्यां पृथक् पृथक् पौत्रीभवन्त्या द्रव्यपूरितान् ॥२१॥ नानालङ्कारवासांसि गा दासीः सेवकैस्तथा । ददौ ताभ्यां भूरिकीर्त्तिर्यत्संख्या सम्भवा न विद्यते ॥२२॥ एवं सम्मानितस्तेन धीमतो भूरिकीर्त्तिना । सपत्नीकाभ्यां पुत्राभ्यां गजारूढाभ्यो समन्वितः ॥२३॥ सीतया वधुभिः पौरैः सुहृद्भिर्भातृभिर्नृपैः । पूर्ववद्दुन्दुभ्याद्यैश्च स ययौ स्वकीयमण्डपम् ॥२४॥ अरण्ये ततो रामो मासमेकं विधाय सः । चकार सीतया क्रीडां नौकासंस्थो महोदधौ ॥२५॥ ततः स्नुषाभ्यां श्रीर मो ययौ निजपुरीं सुखम् । अयोध्याया विजितोऽपि श्रुत्वा रामं समागतम् ॥२६॥ स पुर्या रक्षणार्थं हि रामेणाज्ञापितः पुरा । स पुरीं शोभयामास पताकाध्वजतोरणैः ॥२७॥ वरेंद्रं पुरस्कृत्य नृत्यवादित्रनिःस्वनैः । विजयो गमनायेतो रामं प्रत्युद्गतो जवात् ॥२८॥ अथो नदत्सु वाद्येषु रामो दारैः सुहृज्जनैः । स्नुषाभ्यां सीतया वधूवन्तीभिर्भ्रातृभिः पुरीम् ॥२९॥ विवेश सेनया पौरैः पश्यद्भ्यश्चादिकं पथि । तदा वेश्या ननृतुस्तुष्टुवुर्वन्दिमागधाः ॥३०॥ स्वस्वपत्न्येयुतौ बालौ वरवारणयोः स्थितौ । तदा विरेजतुर्मेगि श्रीभिः पुष्पैः प्रवर्षिणौ ॥३१॥

... उन दोनों बालकों ... का ... वास बैठ गया अपना साम भूरिकीर्ति से वेष्टित होकर अपनी-अपनी स्त्रियोंकी वन्दना की ॥ १५-१६ ॥ उस समय वे वर वधु अतिशय प्रसन्न होकर मन्द-मन्द मुसका ... । रामके पीछे प्रकाशमय वे बड़े सुन्दर दीखते थे ॥ १५ ॥ इसके बाद उन दोनों बहुओंने कुमकुम- ... हुए अपने चरण पतिके गोदपर रख दिये । इस तरह नाना प्रकारके उत्सवके साथ तीन दिन बीते ॥ १६ ॥ चौथे दिन के समय ... कुशकी आरती की गयी । उस समय ... उनकी सुन्दरता देखने ही योग्य थी ॥ १७ ॥ इसके अनन्तर वे दोनों बालक अपनी अपनी स्त्रियोंको बैठ- ... कर ... ताण्डव नृत्य करने लगे ॥ १८ ॥ माताएं म... आदि स्त्रियाँ मण्डपमें बैठी यह कौतुक देख रही थीं । महाराज भूरिकीर्तिने अपने दोनों जामाताओको खूब दहेज आदि भी दिये ॥ १९ ॥ रामके सम्बन्धसे ... होकर उन्होंने उन्हें एक लाख हाथी, उतनी ही पालकियों, पाँच लाख घोड़े, एक लाख रथ, अश्रफि- ... तथा भारी सम्पत्ती ... द्रव्यसे भरकर दोनों बहुओंको दीं ॥ २०-२१ ॥ इनके सिवाय विविध ... के वस्त्र, गायें, दास, दासी और नौकर इतने दिये कि जिनकी गिनती सम्भव नहीं थी ॥ २२ ॥ ... सम्मानित होकर भाग्यवान् ... के साथ दोनों पुत्रोंके साथ हाथीपर सवार होकर ... नारियों, सुवासिनों, ... मण्डप- ... ॥ २३-२४ ॥ इसके अनन्तर रामने उस वटवृक्षमें एक मास बिताया । वहीं वे कभी कभी नौकापर ... क्रीड़ा किया । उधर अयोध्यामें उस विजयने, जिसको राम नगरकी रक्षाके लिए छोड़ आये थे, ... आगमनका हाल सुनी तो उसने ध्वजा-पताका-तोरण आदिसे नगरीको खूब सजाया । २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ ... हाथीको आगे करके रामका मंत्री विजय रामकी अगवानी करने जा पहुँचा ॥ २८ ॥ इसके अनन्तर ... विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे तब राम अपने स्त्री, सुहृज्जन, बहुओं, सीता, पुरवासियों तथा ... साथ पुरीमें प्रविष्ट हुए । २९ ॥ उस समय वेश्या नाच रही थीं और मागध तथा बन्दीजन ... कर रहे थे ॥ ३० ॥ अपनी अपनी पत्नीके साथ दोनों बालक (कुश और लव) हाथीपर बैठे हुए

३६२ आनन्दरामायणे [सर्गः ४

एवं रामो गृहं गत्वा बालाभ्यां स्वीयमब्रवीत्। कारयित्वा समाश्चर्यं मददीद्दानान्यनेकशः ॥३२॥
तदाऽलङ्कारवस्त्राद्यैः संपूज्य रघुनन्दनः । मुदः सकलांश्चापिनिशान् जानपदान्नृपान् ॥३३॥
आचांडालदिकान्त्सर्वान् संतुष्टानकरोन्मुदा । ततः स भूरिकीर्तिस्तान् मन्त्रिणः सैन्यसंयुतान् ॥३४॥
सम्पूज्य प्रेषयामास स्वदेशं रघुनन्दनः । तत स्मातुन् जानपदान् महदृश्च प्लवङ्गमान् ॥३५॥
विभीषणादिकांश्चाज्ञां संमु मान्यस्थल ददौ, ततः सर्वे राघवस्य ने संभाषणाद्युहिनैः ॥३६॥
स्वस्वकोशेषु संपूर्य ययुः स्वं स्वं गृहं मुदा । मृगंडेशैर्नभेश्चरैः सर्वैः संपूज्याश्च तिवारिवाः ॥३७॥
अथ रामः स्नुषाभ्यां च पुत्राभ्यां बन्धुभिःसिया । राज्यं चकार राज्यं स भक्तेणप्रतिभं चिरम् ॥३८॥
ततः श्रावणमासस्य दर्शमारभ्य षोडश । प्राप्तमन्वन्तरे यानि सनिमुख्यार्हदिनानि हि ॥ ३९॥
नेषु मासं सं राम मागरूपं सवानरम् । संपूज्य भूरिकीर्तिः स विनाय परमं पदम् ॥४०॥
ऋणभायै विविधैर्वस्त्रालङ्कारवाहनैः । कियद्दिनानि सम्भाव्य ददावाज्ञां पुनः पुनः ॥४१॥
मन्वन्तरप्रमुखार्हदिनानि षोडशाधुना । विष्णुद स मया तेऽग्रे कथ्यन्ते तानि वै शृणु ॥४२॥
श्रावणस्याथ मासस्य कुहः श्रेष्ठा प्रकीर्तिता । भाद्रशुक्लचतुर्थी तु विजया दशमी नरापुनः ॥४३॥
दीपावल्याश्च चत्वारि दिनान्यानि हि । मार्तंडार्य पदंमा च तथा षष्ठाऽथ पुनः ॥४४॥
मक्रान्तिर्महानवम्या तु तथा चैव नवम्यपि । ... षष्ठ्युत्सवाश्चाथ पुनस्तदा ॥४५॥
अक्षय्याख्या तृतीया च तथा वै ज्येष्ठपूर्णिमा । कार्त्तिके हुतशांडश्चैव पञ्चैतानि हि ॥४६॥
मन्वन्तरप्रमुख्यानि त्वाख्यातानि... । तस्मिन् सर्वान् जनान् रामः सादरं पर्यपूजयत् ॥४७॥
एवं कुशस्य च तथा लवस्यापि सविस्तरम् । विरहोऽती रतिर्भर्ते शिष्य यथा पूर्वं श्रुतौ मया ॥४८॥
यदा श्रीरामचन्द्रश्च वैकुण्ठारोहणं शुभम् भवितव्येति तदाऽयोध्यापुर्यां वै मग्न्युजले ॥४९॥

सुशोभित हो रहे थे और अनेक नगाड़े बजने लगे थे, उसपर फूल बरस रहा था ॥३२॥ इस तरह बड़े उत्साहके साथ वे अपने राजभवनमें पहुंच वहां उन्होंने आश्चर्य्य रूपसे संस्कार दूरस्त कराया और अनेक तरहके दान दिये ॥३३॥ उस समय रामने अपने सम्बन्धीगण, समस्त पुरवासियों, मित्रों जनपदवासियों और चाण्डालों से लेकर साधारण श्रेणीवाले पालोंको सबका नाना प्रकारके वस्त्रों और अङ्गलङ्कार समर्पण करके सबको प्रसन्न किया। इसके पश्चात् महाराज भूरिकीर्तिके मंत्रियों तथा सेनाकी पूजा करके उन्हें विदा किया। इसके बाद जनक आदि सम्बन्धियों, वानरों तथा विभीषण आदि मित्रोंको उच्च प्रमाण के आदर के साथ सम्मामित करके अपने नगरको जानेकी आज्ञा दी ॥३३-३६॥ इस प्रकार रामके आदर सत्कारको स्वीकार करके उन लोगोंने भी वैसे रामका पूजा की और अपन-अपने देशको लौटे ॥३७॥ इसके बाद राम सीता पुत्रों एवं वधुओंके साथ रहते हुए बहुत दिनों तक धर्मातुकुल राज्य करते रहे। ३८। तदनन्तर श्रावणकी अमावास्यासे लेकर वर्षमें षोडश बड़े त्योहारों और उत्साहके दिनोंमें हजार व परिवार के साथ पुर समेत सुग्रीवको अपने यहां सादर बुलाते थे । ३९ । ४०॥ वहां पहुंचनेपर वे वस्त्र अलंकारादि समर्पित करके उनकी पूजा करते थे। कुछ दिन राम वहां रहकर फिर उनको राज भवन और सुग्रीवको आज्ञापर फिर पहुंचा जाया करते थे ॥४१॥ हे विष्णुदास अब मैं तुम्हें वर्षके उन सोह दिनों के नाम सुनाता हूँ सो तुम उन्हें श्रवण करो ॥४२॥ हे श्रावण मासकी अमावसया, भाद्रपद शुक्लपक्षकी चतुर्थी व उसकी विजया दशमी ॥४३॥ और दीपावलीके आगे पाछवाले चार दिन बड़े महत्पूर्ण होते हैं ।४४। मार्गशीर्ष कृष्णपक्षकी पंचमी तथा षष्ठी, मकरकी संक्रान्ति रघुनवमी और चैत्र शुक्लकी हुताशनी प्रतिपदा का बड़ा पवित्र शिव योग है ॥४५॥ अक्षयतृतीया ज्येष्ठकी पूर्णिमा और श्रावणके शुक्लपक्षकी नागपंचमी व छटवें मान्यवर शिव योग हैं ॥४६॥ ये ही मन्वन्तरके बड़े बड़े उत्सव और इस मासमें पड़े हैं। इन्हीं दिनों भारण कि सपरिवार रामके अपने यहां बुलाकर पूजन करते थे ॥४७॥ हे शिष्य ! जैसा कि मैंने आजके बहुत दिनों पहिले कुश तथा लवका विवाह वृत्तान्त सुना था, उसी तरह वर्णन किया ॥४८। इसके