भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२५६आनन्दरामायणे[सर्गः ३

मौनं नृपं वरयति शिक्षिता सा सुनन्दया । सोऽग्रमायेति वृद्धां मां वाग्मिन्निन्द्ये नृपांतरम् ॥ १४ ॥ सुनंदा बालिकामह शृणुष्व मृगलोचने । पश्यैनं नृपतिं रम्यं द्राविडे विषये स्थितम् ॥ १५ ॥ कम्बुकंठाख्य मेनं शान्तिपूर्णां निवासिनम् । एनं नृपं गुणाढ्याद्य मा व्रजान्य दर्शनम् ॥ १६ ॥ कान्तिपूर्णोपवनं त्वं सर्वतीर्थमनोमे । क्रीडां मजस्व विस्तीर्णे हेमकङ्कणशिञ्जिते ॥ १७ ॥ विष्णुं वरदराजाख्यं त्रियत्रेकाम्बराख्यकम् । पूजयस्व मदाज्ञेव कम्बुग्रीवन्मृदेश्वरम् ॥ १८ ॥ कुर्गाच्चैनं नृपं माद्य माहात्म्यनृपसत्तमजः । इति वृद्धावचः श्रुत्वाऽग्रे तां गन्तुं प्रबोदयत् ॥ १९ ॥ सुनंदाऽन्यं नृपं नीत्वा सुमतिं वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं नृपतिं मुख्ये मत्तमातङ्गगामिनि । २० ॥ कर्णाटविषयस्थं म्व विजये पार्थिवात्मजम् । कमलस्य सङ्ग्रहस्तं कमलोद्भिगमूज्ज्वलम् ॥ २१ ॥ स्मितास्यं कञ्जनयनं विजयाख्यपुरस्थितम् । शृणुष्व वचनं मेऽद्य पूर्णायैनं सुरीजनम् ॥ २२ ॥ अस्य त्वं महिषी भूत्वा वने कृष्णादीजले । मुग्य नृपेण क्रीडस्व मद्वाक्यं शृणु मा व्रज । २३ ॥ मद्वाक्यं शृणु मेत्युक्ता श्रुत्वा वाक्यमनुत्तमम् । अग्रेति सूचिता बाला चोदयामास तां पुनः ॥ २४ ॥ एवं नानारूपाणां च वर्णनानि पृथक् पृथक् । स्तुतिरूपनिषेधौनि श्रुत्वा द्व्यर्थानि बालिका ॥ २५ ॥ न वरम् मनः कस्मिश्चिन्नृपौ तेषु सा तदा । ततस्तां शिविकामस्थां सुनंदा च शनैः क्रमात् ॥ २६ ॥ अतिक्रम्य राममंत्रिबालकानपि पूर्ववत् । यूपकेतुं शिशुं नीत्वा बालिको वाक्यमब्रवीत् ॥ २७ ॥ शत्रुघ्नतनयं बालं यूपकेतुं मनोहरम् । पितृव्यं राममनुसद्व्याख्यानुवर्तिनम् । २८ ॥ एनं पश्य बालिके त्वं सावधानमना भव । वरयैनं यूपकेतुं माऽग्रे गच्छ नृपात्मजे ॥ २९ ॥ मैनं वरय गच्छाग्रे वृद्धया हेति चोदिता । सुनन्दा वाद्यमानाग्रे गन्तु सुमतिः पुनः ॥ ३० ॥ सुबाहुं पुष्करं तद्वन्मेवं सा सुमतिः शनैः । चित्रकेतुप्रभृतं च त्यक्त्वा सा तु लवे ययौ ॥ ३१ ॥

॥ १३ ॥ यहाँ तो सुनन्दान "एते नृपा मा वरय (इस राजा को मत वर,' यह द्व्यर्थक वाक्य कहा था जिससे सुमतिने आगे चलनेका संकेत दिया। तब वह उसे दूसरे राजाके सम्मुख ले गयी ॥ १४ ॥ और कहने लगी—हे मृगलोचनी ! इस सुन्दर राजा को देख, यह द्रविड देशका निवासी है ॥ १५ ॥ इसका कम्बुकंठ नाम है। वह शान्तिपुरका रहने वाला है। तू इस सब गुणवान् राजाको वरनेकी इच्छा मत कर ॥ १६ ॥ कान्तिपुरीमें तू अतिशय विशाल सुवर्णकमलोंसे युक्त मनोहर सर्वतीर्थम इसके साथ आनन्द विहार करेगी और इसके साथ वरदराज नामक विष्णु भगवान् तथा त्रियंत्रेकाम्बर नामक शिवका पूजन करेगी। साधारण राजाओंकी तरह इसे भी न छोड़, इसको वर ले। इस प्रकार वृद्धा सुनन्दाकी बात सुनकर सुमतिने उसे आगे चलनेका संकेत किया ॥ १७-१९ ॥ तब सुनन्दा उस दूसरे राजाके पास ले जाकर कहने लगी—हे मुख्ये ! हे मत्तमातङ्गगामिनि ! तू इस राजा को देख ॥ २० ॥ यह कर्णाटक देशका रहनेवाला विजय नामक राजा है। कमलके समान इसका मुख है और कमलके ही समान इसके हाथ-पैर भी हैं ॥ २१ ॥ इसका मुख सदा मुस्कुराता रहता है। कमलोकी कलियोसी नन्हीं इसकी आँखें हैं। यह विजयपुरका निवासी है। तू मेरा बात मानकर इसे अपना पति बना ले ॥ २२ ॥ इसकी राजमहिषी बनकर तू बना तथा कृष्णा नदीके जलमे सानन्द विहार करेगी। मेरी बात मानकर तू और आगे मत बढ़ ॥ २३ ॥ "मद्वाक्यं मा शृणु (मेरी बात सुन)' यह बात सुनकर उसने सुनन्दाको आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ २४ ॥ इस प्रकार अनेक राजाओंके वर्णन जो वास्तवमें निषेधमय थे, किन्तु ऊपरसे स्तुतिवाक्य मालूम पडते थे। ऐसे द्व्यर्थक वाक्योंको सुन-सुनकर बालिकान उन राजाओमें किसको भी नहीं पसन्द किया। तब सुनन्दा शिविकामें बैठी हुई सुमतिको लेकर धीरे-धीरे रामके मन्त्रिगणोको छोडकर यूपकेतुके सामने गयी ओर कहने लगी—। २५-२७ ॥ ये शत्रुघ्नके सुन्दर पुत्र यूपकेतु हैं। ये पितृव्य (ताऊ) रामके बताये हुए कुल वृत्तके अनुगामी हैं ॥ २८ ॥ हे बालिके ! तू अब अपना मन सावधान करके इन्हें देख । हे नृपात्मजे ! अब भाग न जाकर तू इन्हींको अपना पति बना ले ॥ २९ ॥ 'मा एनं वरय अग्रे गच्छ (इसे न वर, आगे चल)' यह सङ्केत पाकर सुमतिने