भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ३] विवाहकाण्डम् [३५५]


वरार्थं जालश्रेन् प्रसार्यैषा विदेहजा मुमोद नितरां स्त्रीभिर्मुमोद राघवोऽपि सः । ९५। इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे चम्पिकास्वयंवरो नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

(द्वितीय राजकन्या सुमतिके स्वयंवरका वर्णन)

श्रीरामदास उवाच

अथार्या सा समादाय सुमतिं भोजगामिनीम् । नृपर्नीत्या नदिग्भागात्सुनन्दा धृतयष्टिका ॥ १ ॥
क्रमेण वर्णयामास द्विपकक्षास्थां सुलोचनाम् । बाले शृणुष्व मे वाक्यं दर्शयन्ती नृपोत्तमम् ॥ २ ॥
अवन्तिस्थं चोद्बाहुनामानं च मनोरमम् । नानेन सदृशः कश्चित्पृथिव्यां वर्तते नृपः ॥ ३ ॥
वरयैनं नृपं माऽग्रे गच्छ त्वं गजगामिनि । अस्य त्वं महिषी भूत्वा क्षिप्रातीरेऽथ संकटे ॥ ४ ॥
दत्तमेधमभिधानेन मृगं क्रीडय भामिनि । अनुत्तमं चेति वाक्यं दृष्ट्वा सा सुमतिः पुरा ॥ ५ ॥
श्रुत्वा मैनं वरयेति सुनदाया वचः पुनः । श्रुत्वा नां संदधौमाम् मा वा नोत्वा नृपान्तरम् ॥ ६ ॥
सुनन्दा सुमतिं प्राह पश्यैनं त्वं नृपं परम् । अंगनावल्लभं श्रेष्ठं विदर्भनिलयान्वितम् ॥ ७ ॥
दूरूढवयसं मा बाले दुर्बलं त्वं नृपोत्तमम् । ह्यद्यापि स्वल्पवयसं भुजकेशरिमण्डितम् ॥ ८ ॥
अस्य त्वं महिषी भूत्वा पयोष्णीजलराशिषु । सुखं कुरु जनक्रीडां नृपेणानेन भामिनि ॥ ९ ॥
एन दुर्गुन्ध मा चेति शृण्वन्त्या सुलोचना । अग्रे गन्तुं सुनन्दां सा नोदयामास सञ्ज्ञया ॥१०॥
ततोऽग्रे नृपतिं नीत्वा सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं नृपतिं बाले देशे मागधसंज्ञके ॥११॥
राज्यं करोत्ययं श्रीमानात्मना ख्यात परः । वरयैनं नृपं माऽग्रे गच्छ त्वं पार्थिवोत्तमम् ॥१२॥
अस्य त्वं महिषी भूत्वा गङ्गासङ्गमवारिदे । कनकौघं सदा क्रीडां हेमन्ते भज भामिनि ॥१३॥


दिया ॥ ९४ ॥ अगरारु राजाने मन में यह सङ्कल्प कर लिया था, बहुत प्रसन्न हुए और रामचन्द्रजी भी अत्यन्त प्रसन्न हुए । ९५ ॥ इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित 'सरल' भाषानुवादसहितो द्वितीयः सर्गः समाप्तः ॥ २ ॥

श्रीरामदास बोले—तदनन्तर सुनन्दा हाथमें छड़ी लिये हुए सुमतिका हाथ पकड़े राजाओंके सामने ले जाकर ईशान कोणसे क्रमशः एक-एक राजाको दिखाकर इस प्रकार वर्णन करती हुई बोली—हे बाले ! मेरी बात सुनो, राजाओमें श्रेष्ठ इस राजाको देखो ॥ १ ॥ २ ॥ यह अवन्ति देशका रहनेवाला है। उद्बाहु इसका नाम है । पृथ्वीमण्डलपर इसके समान कोई राजा नहीं है । हे गजगामिनि ! तू आगे मत बढ़ इनको वर ले। इसकी रानी बनकर तू क्षिप्रा नदीके तटपर बने हुए बागमें आनन्दपूर्वक विहार करोगी । सुनन्दाने "अनुत्तमम्" तथा "एनं मा वरय" इन दो वाक्योंका दो अर्थमें प्रयोग किया था । उसका एकसे प्रशंसा और दूसरेसे निन्दा होती थी। इस कारण सुमतिको वह राजा पसन्द नहीं आया और उसने आगे बढ़नेका संकेत किया ॥ ४-६ ॥ सुनन्दा उसे दूसरे राजाके सम्मुख लाकर कहने लगी—यह विदर्भ देशका निवासी अनुत्थ नामक राजा है ॥ ७ ॥ तू इसे मत छोड़ । इसीको अपना पति बना ले, यह इसक इनका रचता है। इसकी थोड़ी उमर है और बाहुओंमें विपुल बल हुआ है ॥ ८ ॥ पयोष्णी नदीके तटपर इसके साथ सानन्द जलविहार कर ॥ ९ ॥ यहाँ भी बात्रीके 'एनं मा दुर्गुन्ध (इस मत कर )' यह वाक्य सुनकर उसने आगे बढनेका संकेत दिया ॥ १० ॥ तदनन्तर सुनन्दा उसे दूसरे राजाके सामने ले जाकर बोली हे बाले इस राजाको देख, यह कुरुपति मगध देशमें राज्य करता है। यह बड़ा श्रीमान् है। इसे लोग परन्तप कहते हैं। बस, तू इसी श्रेष्ठ राजाको अपना पति बना ले—और किसीके पास मत जा ॥ ११ ॥ १२ ॥ इसको अपना पति बनाकर गङ्गाके दिनोंमें तू सदा अट्टालिकाओंके सामने उसके क्रीड़ा किया करेगी।