भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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३५४ आनंदरामायणे [ सर्गः २

जानकीत्यागकर्त्तारं सीतार्ग्रहणतत्परम् । कुशलवसङ्ग्रावां च वाजपर्थे युद्धकारिणम् ॥८०॥ एकपत्नीव्रतं शांतं सत्यभाषणतत्परम् । एकवाणमसंख्यातनामानं मरुनिध्वजम् ॥८१॥ कोविदारध्वजं वानरध्वजं वज्रध्वजं शुभम् । तार्थ्यध्वजं पुष्पकस्थं तार्थ्यवाय्वजवाहनम् ॥८२॥ नानाराजावतंसस्थमणीदीप्त्यांत्रिशोभितम् । वासिंहासनतासीनं छत्रचामरमण्डितम् ॥८३॥ वरयेनं चंपिकेत्वं सीतया सह राघवम् । सप्तद्वीपशियं सप्तद्वीपविभोर्पीडि च ॥८४॥ बाणः पत्नीचरो यस्य मान्यो यः खेदृदन्तथा । नवरत्नमल्लिकायस्य प्रीत्याथो कुरु मा वृज ॥८५॥ इत्युक्ता नदया बाला स्वरूपपुण्या विशेषतः । न वरञ्च मृगे रामे सीतां संस्मृत्य चंपिका ॥८६॥ एकपत्नीव्रतं शमं सीतया वयनेति च । खेदं मा चर तत्कण्ठे मालां मा कुरु वादिनि ॥८७ तत्सखसंज्ञया नंदा तां निनाय कुशं प्रति । प्रोवाच मधुरं वाक्यं कुशवर्णनहर्षिता ॥८८॥ एनं पश्याल्पवयसं श्रीरामतनयं कुशम् अनर्काण्वगृहं शंतनु भार्य्याथिनं शुभम् ॥८९॥ लवाग्रजं धनुर्वेदिनिपुणं विनयान्वितम् । पित्रा सङ्ग्रामकर्त्तारं वाल्मीकिमुनिशिक्षितम् । ९०॥ एनं वृणीष्व बाले त्वं सुरमानवसन्तनुतम् । नवरत्नमयीं मालायस्य कण्ठे स्वयं कुरु ॥९१॥ इति नन्दावचः श्रुत्वा सस्मिता सा स्मितानना । मुमोच मालिकां कण्ठे स्वकराभ्यां कुशस्य हि ९२॥ तदा निनेदुर्वाद्यानि तुष्टुवुर्वन्दिमागधाः । लज्जयाधोमुखो रेजे सभायां कुशवालकः ॥९३॥ तदा तुष्टो भूरिकीर्तिः कुशांके चम्पिकां शुभाम् । स्थापयामास वेगेन पश्यत्सु नृपतीषु च ॥९४॥


शक महाप्रभू है । ७८ ।। रावणको मारनेवाले सीताके साथ राज्य करनेवाले, तीर्थयात्राकर्त्ता एव सीताके साथ विहारकारी है । ७९ । इन्होंने सीताका त्याग किया और फिर वापस बुला लिया । इन्होंने अपना यज्ञ पूर्ण करनेके लिए अपने बेटो लव कुशके साथ भी युद्ध किया था ॥ ८० ॥ ये एकपत्नीव्रती, शान्त, सत्यवादी, एक बाण तथा असंख्यनामधारी है। ये कोविदारध्वज, वानरध्वज, वज्रध्वज तथा गरुडध्वज हैं। पुष्पक, गरुड़ तथा हनुमान्जी इनके वाहन है। ८१ ।। ८२ ।। ये बहुतस राजाओके मुकुटमणि है ओर मोतियोंके प्रकाशसे इनका चरण सुशोभित रहता है। ये एक अच्छे सिंहासनपर बैठे है और उनपर सुन्दर छत्र चमर शोभित रहता है ।।८३।। हे चम्पिके ! तू इन्हें वर ले ओर सीताके साथ रहती हुई इनकी सेवा कर । ये सबो खण्डा एवं सातूं द्वीपोंके अधिपति हैं ॥ ८४ ॥ ये किसी अन्य स्त्रीविषयक बातोको बाणकी नाईं समझते हैं। अब तू किसी प्रकारका सोच-विचार न करके यह नवरत्नोंकी माला इनके गलेमें डाल दे ।८५ । इस प्रकार नन्दाके समझाने-पर भी भाग्यवश तथा सीताका स्मरण करके राम था उसे पसन्द नहीं आया । ८६ । दूसरे नन्दाने भी अपने वर्णनमें कहा था कि एकपत्नीव्रता है, इसलिए सीतया अर्थात् सीताके साथ रहना पसन्द न कर ।॥८७॥ तत्पश्चात् चम्पिकाके सङ्केतसे नन्दा उसे कुशके सामने ले गयो और इस तरह कुशका भी वर्णन करती हुई कहने लगी-॥ ८८ ॥ इनको देखो, इनका अभी थोड़ी उमर है। ये रामके तनय तथा सीताके पुत्र हैं। इनका नाम कुश है। ये लवके बड़े भाई हैं। अभी इनका विवाह नहीं हुआ है। इसलिए ये भार्यार्थी हैं, ये धनुर्वेदमे निपुण, विनीत स्वभाव पिताके साथ सङ्ग्राम करनेवाले और महामुनि वाल्मीकिके शिष्य हैं ।। ८९ ।। ९० ।। अतएव मनुष्यों और देवताओंस सन्न इन कुशको पसन्द करके तू इनके कंठमे यह नवरत्नमयी माला डाल दे । ९१ । इस प्रकार नन्दाकी बात सुनकर दी हँसकर उसने अपने हाथोंसे कुशके गलेम वरमाला डाल दी ॥ ९२ । उस समय विविध प्रकारके बाज बज उठे और बन्दीजन तथा भाट ने स्तुति की । उस सभामे लज्जासे नीचा मुख किये बैठा हुआ बालककुश ही सुन्दर लग रहा था ॥ ९३ ॥ उस समय प्रसन्न होकर राजा भूरिकीर्तिने सब राजाओके सामने ही चम्पिकाको कुशकी गोदमें बिठा