भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 811 में से

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पृष्ठ 369

सर्गः २ ] विवाहकाण्डम् ३६३


ततः सा भरतं नीत्वा नन्दा तामाह मञ्जुलम् । शत्रुघ्नस्याग्रगं चैनं कैकेय्या जठरोद्भवम् ॥६४॥
रामसेवारतं शान्तं युवानं दयितप्रियम् । वरयैनं बालिकेऽद्य माण्डव्या सरयूजले ॥६५॥
करिष्यसि जलक्रीडां नौकाभ्या मन्मतेन हि । ततस्तत्संज्ञया मन्दा लक्ष्मणं चपिकां जवात् ॥६६॥
नीत्वा सौमित्रिक्रीति तां वर्णयामास मादगम् । पश्यैनं लक्ष्मणं बाले सुमित्राजठरोद्भवम् ॥६७॥
वयोध्यक्षामिनं रामसेवाशक्तं मनोहरम् । वरयैनं चपिकेऽद्य मेघनादप्रमर्दनम् ॥
शेषांशसंभवं चोर्मिलाया वीरस्वसा भव ॥६८॥
सर्वांन् श्रुत्वा रामसेवामक्तान् पत्नीपुत्रानपि । छत्रचामरादींश्च रोषयामास ताञ्च सा ॥६९॥
ततस्तत्संज्ञया नन्दा श्रीरामाग्रे स्वयंवरम् । नीत्वा तामाह मधुरं स्तोतुं तं रघुनन्दनम् ॥७०॥
महत्ते चपिके दैव येन पश्यसि राघवम् । धन्योऽहमपि या रामं दृष्ट्वा स्तोतुं पुरः स्थिता ॥७१॥
क्काहं मंदमतिर्नारी क्व रामो गुणसागरः । नाहं तत्स्तवनने शक्ता बाल्मीकिर्यत्र कुण्ठितः ॥७२॥
शतकोटिभिर्नः श्लोकैश्चरित्रं राघवस्य च । मुनिना वर्णितं तच्च शतकोट्यक्षरान्वितम् ॥७३॥
तस्याहं वर्णनं किञ्चित्करोमि यच्छृणुष्व तत् । सूर्यवंशभूषणं श्रीदशरथनृपात्मजम् ॥७४॥
कौसल्यानन्दनं रामं साक्षान्नारायणं विभुम् । ताटकान्तकरं वीरं गाधिजायज्ञपालकम् ॥७५॥
अहल्योद्धारिणं श्रेष्ठं शिवचापंकारखण्डनम् । जानकीवल्लभं रम्यं जामदग्न्यादवानलम् ॥
नृपवृंदकंजेतारं भरतप्राणदायिनम् ॥७६॥
ताताज्ञापालकं भ्रात्रा सीतयाऽरण्यवासिनम् । विराधमर्दनं श्यामं खरदूषणमर्दनम् ॥७७॥
त्रिशिराश्चमृगमारीचकबन्धवालिमर्दनम् । समुद्रबंधनं लङ्कागर्भसान्तकरं प्रभुम् ॥७८॥
रावणांतप्रकर्तारं सीतया राज्यकारिणम् । तीर्थपुंजप्रकर्तारं लीलाकीडनतत्परम् ॥७९॥


डारा और आगे चलकर कर कट किया ॥ ६३ ॥ इसके बाद नन्दा चम्पिकाको लिए हुए भरतके सामने पहुंचकर कहने लगी - ये शत्रुघ्नके बड़े भाई भरत कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ६४ ॥ ये भी रामकी सेवा करते हैं। इन शान्त युवा एवं दयितप्रिय भरतको वर लेती तुम इसी तथा भरतके साथ सरयूल जलमें विहार करोगी। हे धीठीके नहीं तब तो चम्पिकाका संकेत पाकर नन्दा लक्ष्मणके सामने पहुंची ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ वह चम्पिकासे कहने लगी-ये सुमित्रा के गर्भसे उत्पन्न लक्ष्मण हैं। ये अपाडतोपे युक्त हुए रामकी सेवा करते हैं। तू इन सुन्दर, मेघनादका नाश करनेवाले और शेष भगवान्के अंशसे उत्पन्न लक्ष्मणके साथ व्याह करके उर्मिलाकी बहिन बन जा ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ उस बहिनको रामक सेवक, छत्रचमरादिहीन तथा व्याहे सुनकर उसने तीनों भाइयोंमेंसे किसी को भी नहीं पसन्द किया ॥ ६९ ॥ इसके बाद चम्पैके संकेत करनेपर वह आगे बढती हुई रामचन्द्रजीके सामने जा पहुंची। तब दासी रामकी स्तुति करती हुई इस तरह बोली- ॥ ७० ॥ हे चम्पिके ! तुम्हारा अहोभाग्य है, जो तुम रामचन्द्रजीको देख रही हो और मैं भी धन्य हूँ जो रामकी स्तुति करनेके लिए इनके सामने उपस्थित हुई हूँ ॥ ७१ ॥ कहाँ मैं एक मन्दमति नारी और कहाँ गुणोंके सागर रामचन्द्र । मैं इनकी स्तुति कानम कैसे समझ हा सकती हूँ जब कि वाल्मीकि जैसे महान् कवि भी पूरी तौरसे वर्णन नहीं कर सके ॥ ७२ ॥ उन्होंने सौ करोड़ श्लोकान्नों से वर्णन किया है जो केवल उनके सौ करोड़ अक्षरोंकी स्तुति हुई है ॥ ७३ ॥ मैं अपनी बुद्धिके अनुसार थोड़ी-सी स्तुति कर रही हूँ, सो सुन । ये सूर्यवंशके भूषण, महाराज दशरथके पुत्र, कौशल्याके तनय और साक्षाद्व्यापक महान् नारायण हैं । इन्होंने दुष्ट ताड़काका वध करके विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा की है ॥ ७४ । ७५ । इन्होंने अहल्याका शापसे मुक्त किया और शिवधनुष तोड़ा है । ये सीताके वल्लभ, परशुरामके कोपरूपी वनके दवानल, राजाओंके समूहको जीतनेवाले तथा भरतके जीवनदाता हैं ॥ ७६ । ये पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले, भाई तथा सीता के साथ वनोंमें रहनेवाले, विराधके नाशक, श्यामरूपधारी और खर-दूषणके नाशक हैं ॥ ७७ ॥ त्रिशिरा तथा मृगरूप धारण करनेवाले मारीचके वधकर्त्ता, कबन्ध तथा बालिको मारनेवाले, समुद्रमें सेतु बाँधनेवाले और लङ्कानिवासी राक्षसोंके विना-

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