श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ आनन्दरामायणे [सर्गः २
अस्याद्य महिषी भूत्वा शृङ्गारैरुपसम्पदा । नौकास्था पश्यसि त्वं ह वर्ण्यनं नृपोत्तमम् ॥४६॥ अस्य पत्नी वसिष्ठा त्वं मय माऽग्रे प्रतापने । इत्युक्ताऽपि तया तस्मिन्न बबन्ध निजं मनः ४७। त्वं वसिष्ठा मा भवेति नन्दायाऽग्रे प्रचोदिता चाढ्य नाम मा नन्दाऽग्रे गन्तुं नृपोत्तमम् ॥४८॥ नन्दाऽन्यं नृपं नीत्वा चम्पिकां प्राह वेगतः। पश्यैनं नृपतिं मुग्धे सुषेणाख्ये वरे ॥४९॥ देशे करोति वै राज्यं सुषेणोऽयमनुत्तमः। तुरगा वायुवेगाश्च यस्य पन्नगो मृगीदृशः। ५०। यस्यांगणे वारनारीनृत्यद्यत्पत्यह्हानिशम् वर्णैन चांपिकेऽद्य य आनन्दवराननम् ॥५१॥ अस्य त्वं महिषी भूत्वा जन्मसाफल्यां कुरु। याश्च विष्ट शृण्वन्त्या वाक्यमनुत्तमम् । ५२। न बबन्ध मनस्तस्मिन्नृपती सा मनोदयम् मथ सा वादिनो कन्या नयाऽन्यं नृपतिं क्षणात् ॥५३॥ निनाय शिविकाध्यो तां चम्पिकामपि भामिनीम् । पश्यैनं नृपतिं बाले स्थितं हैहयपत्तने ॥५४॥ महस्रार्जुनवंशस्य भूषणं कल्पनेपमम् प्रताप इव मन्वानः ख्यातः शूर महारथी ॥५५॥ वर्ण्यनं नृप माऽन्य गच्छ हैमवत्यर्णिवि । अस्य त्वं महिषी भूत्वा रेवायाः पतिना सह ॥५६॥ करिष्यसि जलक्रीडां चम्पिके शृणु मद्रचः । इत्युक्तेऽपि तया तस्यां न बबन्ध मनो नृपे ॥५७। वर्ण्यनं नृपं मेने नन्दास्यादमहारथी । नृपाणां संख्येष्वर्थे वा ह्यथ बद्धुत्तमा । ५८। एवं नाना नृपाणां सा वर्णनं विविधं पृथक् । स्तुतीश्च नृपतीनां शुश्रावा नृपमध्यगा ॥५९॥ जगाम शिविकामंस्था सुनन्दा भरतानुजम् । सुमन्त्रादीन् विहाय श्रुत्वा श्रीरामेमान्तथा ॥६०। ततः प्रोवाच सा नन्दा पश्यैनं भरतानुजम् । कौसलेन्द्रस्य रामस्य लक्ष्मणसोदरोपमम् ॥६१॥ अयोध्यावासिनं रामराज्याज्ञामनुवर्तिनम् वर्ण्यनं चम्पिकेऽद्य श्रुतकीर्त्याः स्वसा भव ॥६२॥ इत्युक्तापि तया तन्वी शत्रुघ्ने निजमानसम् । न बबन्ध भृशं संतामग्रं गतु चकार ताम् ॥६३।
स्त्रियोसे बड़ा प्रेम करता ने। अत यदि तुम इसके साथ ब्याह कर लोगी तो नौकापर बैठकर गङ्गाजीकी अनूप लहरियोंको देखोगी। मेरी बात मान लो और इस राजाकी पति स्वीकार करो। अब आगे मत बढ़ा ऐसा कहनेपर भी उसका मन उस राजापर नहीं रमा और उसने नेका मस्त किया । ४५-४८ ॥ सुनन्दा भी दूसरे राजाके सम्मुख पहुँचकर कहने लगी कुमारी ! इस नरपत्ती ओर देखा। यह अङ्ग नामक दशामे रहता हुआ राज करता है। इसका सुषेण नाम है। कनकगण देवतुल्य बहुमूल्य घोड़े इसके पास हैं कितनी ही मृगीकी तरह नेत्रावाली स्त्रियां भी इसके विलासमे अंगणमें रात वक्वाये नाचती रहती हैं। हे चम्पिके तू इसे पसन्द कर ले। इस तेरे प्रिय मुखके समान इसका भी मुंह है। राजमहिषी बनकर तू अपना जीवन सुफल कर ले। उस राजाकी बड़ाई सुनकर नन्दाने प्रतिज्ञापालन कर राजापर भालती रमा और कन्धाको आगे बढ़नेके लिये संकेत किया। उसके संकेतपर वाहिकाने क्षण भरमें एक दूसरे राजाके पास पहुंचकर बोली हे बाले ! इस राजाको देखा यह हैहयपत्तनका रहनेवाला, कल्पवृक्ष सदृश कामद तथा सहस्रार्जुनका वंशज है। यह बड़ा योद्धा एवं महारथी है और प्रताप इस नामसे विख्यात है। ॥ ४९-५५, इसको वरकर तू अपने भाग्य सम्बन्ध पदपर पहुँचेगी। इसकी महिषी बनकर तू पतिके साथ नर्मदा नदीमे सानन्द विहार करेगी ॥ ५६ ॥ इतना कहनेपर भी उस चम्पिकाको अच्छा नहीं लगा। क्योंकि नन्दान भी कहा था- 'हे नृपोत्तम !' मानो इसे यह पसन्द करे दूसरे 'अमहारथी' शब्दसे भी तिरस्कार ही किया था। इसलिए वह भी अच्छा नहीं लगा। नन्दायें दुष्टकके समान कहा था खुद समझती थी ॥ ५७ ॥ ५८ । इस प्रकार जनक राजाक्त पृथक् पृथक् वचन तथा स्तुतिके अन्तर्गत लयवद्यायाका सुनती हुई पाल्कीपर बैठी हुई चंडिका रामके मन्त्रा सुमन्त्रादिकोंको लांघकर शत्रुघ्नके पास पहुंची ॥ ५९ ॥ ६० ॥ नन्द ने कहा- ये भरतके छोटे भाई हैं किन्तु रामके सगे भाई जैसे मालूम पड़ते हैं ॥ ६१ ॥ ये अयोध्यामे रहते हैं और राजा रामकी आज्ञाका पालन करते हैं । चम्पिके ! तू इन्हीक साथ विवाह करके श्रुतकीर्तिकी बहिन बन जा ॥ ६२ ॥ इतना कहनपर भी शत्रुघ्नमे उसका मन नहीं