भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

सर्गः २ ] विवाहकाण्डम् ३५१

अथोपमाता वृद्धा सा धृतहस्ताग्रयष्टिका मथाया चपकान्ताभ्यै दक्षिणस्थान्पृथक् पृथक् ॥२८॥ क्रमेण वर्णयामास तदा नृपतिसत्तमान् । तथाऽन्या च सभाप्राध धृतहस्ताग्रयष्टिका ॥२९॥ सुनन्दाख्याऽतिजग्धा सुमध्यै नृपतीन्क्रमात् । रणयाम्यौसरस्थनृपमना पृथक् पृथक् ॥३०॥ अथ सा चण्डिकां प्राह नीत्वा तां नृपतेः पुरः । विशवकार्थ्या च.पमाना नन्दा सामग्रीजिता ॥३१॥ राजकन्ये चषिकेत्र शृणुष्व वचनं मम । एन नृप वर्णयाम पश्य स्व मदनोपमम् ॥३२॥ पांड्याख्यं मतिमाणाग्ना नामपत्तनमास्थितः । शूर श्रेष्ठा नृपश्रेष्ठः प्रजापालनतत्परः ॥३३.। यदि ते रोचते चित्ते वरयैनमनुत्तमम् अद्य त्वं महिपी भुक्त्वा नागपत्तनमस्थिता । ३४.। क्रीडस्व मुदिताऽनेन वाप्रामन्द्रातिषु । नन्दीक्त चषिका श्रुत्वा द्वयर्थ वाक्यमनुत्तमम् ॥३५॥ न बबन्ध मनस्तस्मिन्नृपती मतिमत्तरा । चोदयामास नन्दां तामग्रे गन्तुं नृपोत्तमम् ॥३६ । तदाऽन्यं नृपति नन्दा नीन्वा तां शिबिरात्स्थिता । चण्डिकां प्राह चे क्ष पश्येनं बालिके नृपम् ॥३७' कलिङ्गविषयस्योऽयं नाम्ना हेमाङ्गदो महान् । को दृशो वाणदाणा यस्य गण्डस्थलादिषु ॥३८॥ मुक्ताजालानिगुच्छाश्च राजन्ते कमलानने । ** *** ******* ******* * ******* च ॥३९॥ एषापत्नी कौतुक बाले करोषि क्रोडनादिषु । यस्य सांक्रम रे हे मा मुख्योऽय कन्यके ॥४०॥ इत्युक्ताऽपि तथा तन्वी नन्दया चंडिका नृपे । न स्मन नगे न बबन्ध न्य गन्तु नामचोदयत् ।४१॥ सपत्नीभयमालक्ष्य सपत्नीकरण्याजष्यति । अमहानिति शब्देन नन्दया सूचिताऽपि मा ॥४०॥ ततोऽन्यं नृपतिं गन्त्वा नन्दा प्रोवाच चण्डिकाम् । पश्यैनं नपतिं मुग्धे हरिद्वारनिवासिनम् ।४३॥ नीपान्वयममुद्भूत ह्यब्धाविव निशाकरम् । यशानां नृत्नगन्ध कार्य्या जयन्त मण्डले ।४४। यज्ञकीर्तिरिरिति ख्यातः पृथ्वीशः प्रमदाप्रियः । वयैनं नृप भुवि रुक्मभूषणभूषितम् ॥४५.॥


॥ २८-२७ ॥ चण्डिकाके साथ एक उपमाता (धाई) मथायो थी, जो हाथमें एक लाठी लिये खड़ी दिये थी। वह दक्षिणकी तरफ बैठे राजाओंक वर्णन करने लगी । २८-३० ॥ सुनन्दा, चण्डिकाको एक राजाके सामने लायी । उस समय भी चण्डिका कामकीपर बैठी थी और चमर चमर चल रहे थे ॥ ३१ ॥ सुनन्दा चण्डिकाका सम्बोधन करके कहने लगी - हे राजकन्य चण्डिके ! म.. बात सुना इसा, यह कामदेवके समान सुंदर अति बुद्धिमान् पाण्डय नामक गजा नागपत्तनका रहनेवाला बड़ा पराक्रमी, रथी, सब राजाओंमें श्रेष्ठ और प्रजापालने तत्पर है । ३२ ॥ ३३ ॥ यदि इस प्रसन्न लगे तो इस को पसन्द कर लो । तुम इसकी महारानी बनकर नागपत्तनमे आनन्दक साथ अनूप-रूपके मथलोभ क्रीड़ा करोगी । सुनन्दाकी ये बातें उसे दुष्टार्थक तथा व्यर्थ-सी जान पड़ी । उस राजापर उसका तव मन नहीं सटा और दूसरे राजाके पास चलनेका संकेत किया । ३४-३६ ॥ फिर सुनन्दा शिविकापर बैठी चण्डिकाको दूसरे राजाके सामने ले जाकर कहने लगी । ३७ ॥ हे बालिके ! इसे देखो यह महान् कलिंग देशका रहनेवाला, हेमाङ्गद नामका राजा है । इसके गण्डस्थलपर हाथियोंके गजमुक्ताओंसे बने गुच्छू लटकते रहते हैं । इसकी रानी बनकर तुम गङ्गाजीकी खिड़कियोंम समुद्रकी लहरोंक कौतुक देखती हुई विहार करोगी । बस, अब इसे वरण्य करके तुम इसकी समस्त स्त्रियोंकी प्रधान बन जाओ ॥ ३८-४० ॥ इतना कहने-सुननेपर भी उसका मन उस राजापर नहीं जमा और आगे बढ़नेका संकेत किया । ४१ । क्योंकि सम्भावित यह ख्याल हुआ कि इसके यहाँ सपत्नी मौत का डर है। दूसरे 'अमहान्' शब्दका प्रयोग करके नन्दामे भी य०ठा०सा संकेत कर दिया था ॥ ४२ ॥ इसके अनन्तर दूसरे राजाके पास पहुंचकर नन्दा कहने लगी- हे मुग्धे ! इस गजाको देखो, यह हरिद्वारका नवासी है ॥ ४३ ॥ जैसे समुद्रसे चन्द्रमाको उत्पत्ति हुई है उसी प्रकार यह पवित्र नीप राजक वंशम उत्पन्न हुआ है। अनेक यज्ञोंको करनेसे जयन्त् घरमे इसकी कीर्ति फैल चुकी है ॥ ४४ ॥ इसलिए लोग इसे यज्ञकीर्ति कहते हैं । सुवर्णके आभूषणोंसे मण्डित इस राजाको तुम वर लो। यह विस्तृत भूभागका मालिक है और