भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 811 में से

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पृष्ठ 366
३९०आनन्दरामायणे[ सर्गः २

महाराज नृपश्वाय मगध विषये स्थितः। परंतपः प्रणामांस्ते करोति त्वं विलोकय ॥१०॥
सीताकांत नृपश्वायमवन्तिस्थः प्रतापनान। उग्रबाहुः प्रणामांस्ते करोति त्वं विलोकय ॥११॥
रघुवीर नृपश्वायं स्थितो ह्वैहयपत्तने प्रतापने प्रणामांश्व करोति त्वं विलोकय ॥१२॥
हे राम नृपतिश्वाय शूरसेने स्थितो महान् गुणेश्ने प्रणामाश्व करोति त्वं विलोकय ॥१३॥
कामलद्र नृपश्वाय हस्तद्वागस्थिता महान् नापानव्ये यशस्कीर्त्तः करोति नमनं तत्र ॥१४॥
अयोध्याश नृपश्वायं कलिङ्गविषये स्थितः हेमाङ्गदश्तेऽन्वेद्यश्च करोति नमनं तव ॥१५॥
रामभारे नृपश्वायं नागरत्नसमन्वितः पाण्ड्योऽयं मतिमान् शूरः करोति नमनं तव ॥१६॥
एवं तेषां प्रणामांश्व मानयन् स्वकृतांजलिभिः। विवेश बंधुभिर्बालैः मण्डपं मन्त्रिभिः प्रभुः ॥१७॥
तत्र सिंहासने दिव्ये पश्चिमायां ततो हरिः। उपाविशन्म पूर्वास्यश्छत्रचामरमण्डितः ॥१८॥
रामस्य सव्ये सौमित्रिर्ककेयीतनयस्त्वयाः स्थितः सम्भूस्तथा रामवामे कुशाद्या मंत्रिबालकाः ॥१९॥
शत्रुघ्नसव्ये सतस्थुः सुमन्त्राद्याः सुमन्त्रिण । नभश्चामुत्तरे याम्ये पंक्ती मध्ये नृपादिकाः ॥२०॥
नीभरेखोपमास्तस्थुः स्वसमूहपुरंज्जनान्विः पश्चिमाभिमुख्याः सर्वा ननृतुश्चाग्रतोऽभितः ॥२१॥
अट्टाट्टालसंस्था विप्राद्या ददृशुः कौतुक महन् । नतो नटन्चु वाद्येषु धूपेषु प्रज्वलत्सु च ॥२२॥
नदन्त्सु वारनारीषु गायन्त्सु मागर्घादिषु स्तुवन्त्सु बंदिवृन्वेषु सभायां नृपपोत्रिके ॥२३॥
शिबिकास्ये दिव्यवस्त्रदिव्यालंकारमण्डिते। नवरत्नमहामालाधृत्वाऽन्यकरोपले ॥२४॥
ते सभाङ्गमनू रम्ये समागभ्य विरेजतुः । तयोर्नेत्रकटाक्षेण भिन्नमर्मस्थला नृपाः ॥२५॥
बभूवुर्विकलाः सर्व कामबाणविचेतनः। न तदा लेभिरे शर्म शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ॥२६॥
समार्ता चंद्रिकान्नाम्री वह्निंशीणा दवेश ह। ईशद्योणाच सुमतिः मर्भा तां सविवेश ह ॥२७॥

प्रणाम करता है, इसे देखिए ॥ १० ॥ हे सीतापते ! मगध देशका रहनेवाला यह परन्तप नामक राजा आपको प्रणाम करता है ॥ १० ॥ हे सीताकान्त ! अवन्तिदेशका निवासी और महाप्रताणशाली यह उग्रबाहु नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ ११ ॥ हे रघुवीर ! यह हैहयनगरका रहनेवाला प्रदीप नामक राजा आपको प्रणाम करता है ॥ १२ ॥ हे राम ! शूरसेन नगरका रहनेवाला यह गुणेश नामक राजा आपको प्रणाम करता है हे कामलद्र ! कुद्दलग नगरका रहनेवाला नौपञ्जय यशस्वी नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ १३-१४॥ हे अयोध्यापते ! कुरुदेशका रहनेवाला यह हेमांगद नामका राजा आपको प्रणाम करता है। हे रामप्यारे ! नागरत्ननगरके रहनेवाले बुद्धिमान् तथा अति पराक्रमी पाण्ड्य नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ १५ ॥ १६ ॥ रामचन्द्रजी सबकी ओर निहार तथा संगत साहिसे लोगो के प्रणाम स्वीकार करके अपने भ्राताओं और बालकोंके साथ सभामभवनमे पधारे। वहाँ पश्चिमाभिमुख रखे हुए एक दिव्य सिंहासनपर पूर्वका ओर मुख करके बैठे । उस समय भी उनक ऊपर छत्र लगा था और चमर चल रहे थे ॥ १७ ॥ १८ ॥ रामकी दाहिनी सव्यमे लक्ष्मण भरत आदि भ्राता बैठे। बायें ओर कुश आदि सब लड़के तथा मंत्रिपुत्र बैठे। शत्रुघ्नकी दाहिनी बगलमे सुमन्त्रादि मन्त्री बैठे। सभाकी उत्तर और दक्षिण पंक्ति गोलाकार बनाकर सब राजागणपुत्र तथा मंत्रिपत्रके साथ बैठे थे और पश्चिमाकी ओर मुख करके बैठायें नाच रही थीं ॥ १९-२१ ॥ अट्टालिकापर चढ़े हुए ब्राह्मण आदि नगरनिवासी वहाँका कौतुक देख रहे थे। इसके अनन्तर जब वाद्यू बजने लगे, धूपकी सुगन्धि उड़ने लगी, वेश्याएँ नाचने लगीं मागध-नट आदि विविध प्रकारके गाजन करने लगे और बन्दीजन तरह-तरहकी स्तुति करने लगे। उसी समय शिविकामर चढ़कर दिव्य वस्त्र तथा अलंकार पहिने नवरत्नोंकी बनी एक बड़ी-सी माला हाथोंमें लिये वे दोनों सुन्दरी कन्यायें सभामें आ पहुंची । उनके नेत्रकटाक्षम घायल तथा कामके बाणसे विदीर्णहृदय होकर कितने ही राजे विकल हो गये। उनके होठ और तालु सूख गये । उस समय कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। इस समय अग्निकोणसे चन्द्रिका तथा ईशानकोणसे सुमति नामवाली कन्या प्रविष्ट हुई