श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २ ] विवाहकाण्डम् १४९
काश्चिदूचुश्च सा धन्या सीता जनकनन्दिनी । यस्या बिम्बाधरामृतमुररीकुरुतेऽत्र सः ॥ ६४ ॥
काश्चिदूचुस्तया तप्तं जानक्या दुष्करं तपः । पूर्वजन्मनि यत्पुण्याद्रामाऽप्रियाऽभवत् ॥ ६५ ॥
काश्चिदूचुर्वयं मन्दभाग्यास्तु जगतीतले । न तादृश्यो न जाताः स्य रामस्यैत्र स्तनन्धयाः ॥ ६६ ॥
इति नानाविधा वाचस्तासां शृण्वन् रघूत्तमः । ययौ स गजमगंग तूत्तन्प्यौपमन्दिरम् ॥ ६७ ॥
तत्रावरुह्य नागेन्द्राद्विवेश वरमन्दिरम् । तस्थौ सुखेन जनक्या बंधुभिश्चालिकैः प्रभुः ॥ ६८ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे स्वयंवरार्थं भूरिकीर्तेः पुरं प्रति श्रीरामगमनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीयः सर्गः
( राजा भूरिकीर्तिकी पुत्री चन्द्रकलाका स्वयंवर )
श्रीरामदास उवाच
अथापरदिने रामं भूरिकीर्तिः समागमत् । नत्वा प्राह रघुश्रेष्ठ सभाममागन्तुमर्हसि ॥ १ ॥
तथेति राघवश्चोक्त्वा चालंकारैः स्वमभूषयत् । कनकन्तन्तूद्भवैश्चित्रैः कञ्चुकैरुष्णीषमण्डितः ॥ २ ॥
कटिं बध्वाय त्रिगुणं कटिसूत्रेण चोद्यतः । भूरिवर्गगणैः सार्धं शिविकास्थः समाययौ ॥ ३ ॥
सभार्थं ये नृपाः पूर्वमासनेषु च संस्थिताः । श्रुत्वा रामं समायान्तं सभायास्तत्पुरो ययुः ॥ ४ ॥
चक्रुः सर्वे राघवाय प्रणामान्विधिरोन्मुखाः । तेषां नामानि रामाय दर्शयन्तः पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥
चित्रार्णाशा रामदूताः प्रोचुर्वै वेत्रपाणयः । वस्त्रालंकारभूषाभिर्भूषिता मुदिताननाः ॥ ६ ॥
गजराज नृपश्चायं कर्णाटाधिप ईरितः । विजयस्ते प्रणामंश्च करोत्यत्र विलोकय ॥ ७ ॥
राघवेन्द्र नृपश्चायं श्रीमान् द्रविड़देशजः । कम्बुकण्ठो प्रणामान्ते करोत्यत्र विलोकय ॥ ८ ॥
दीननाथ नृपश्चायं विदर्भविषये स्थितः । अग्रनाथः प्रणामंश्च करोत्यत्र विलोकय ॥ ९ ॥
१ जिन्होंने २ ३ विराज राम जैसे पुत्रको जन्म दिया ॥ ६३ ॥ कोई कहने लगी कि जनकनन्दिनी सीता धन्य है कि रामचन्द्रजी जिनके अधरामृत पान करते हैं ॥ ६४ ॥ कोई बामा-जन कहती हैं कि सीताने पूर्वजन्ममें दुष्कर तपस्या की थी, जिसके प्रभावसे वे आज राजराज रामचन्द्रकी प्रिया वधू बनी हैं ॥ ६५ ॥ कुछ स्त्रियाँ कहने लगीं कि हम लोग बड़े अभागिनी हैं, जो सीताका दासी होकर भी रामकी सेवा नहीं कर सकीं ॥ ६६ ॥ इस तरह नाना प्रकारका वृत्त सुनते हुए रामचन्द्रजी गजमल्लसे चलकर छावनीसे उतरे और राजा भूरिकीर्ति द्वारा सजाये हुए भवनमें गये और सीता, भ्राताजी तथा बालकोंके साथ टिके ॥ ६७ । ६८ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
श्रीरामदास बोले इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्ति स्वयं रामके पास पहुंचे और प्रणाम करके हाथ जोड़ - हे रघुश्रेष्ठ ! अब सभामें चलिए । 'अच्छा' कहकर रामने भी सुवर्णके अनेक आभूषण पहने, सोने के सूत्रसे बने अच्छे-अच्छे वस्त्र धारण किये, पगड़ीसे सज्जित कमरबन्द कसा और शिविकापर बैठकर नगर बालकोंके साथ सभाभवनकी ओर चले, १-३ । जो राजे पहले ही से सभामें आकर बैठे हुए थे, वे रामका आगमन सुनकर सकुचकर उठे और रामके सामने जा पहुंचे ॥ ४ ॥ उन्होंने भगवान्को प्रणाम किया । रङ्ग-बिरंगी पगड़ी बाँधे और हाथमें बेंत लिए हुए रामके दूत जोर-जोरसे बोलकर इस प्रकार उनका परिचय बतलाने लगे- हे राजाओंके भी राजा राम ! देखिए कर्नाटक देशका रहनेवाला यह विजय नामका राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ ५-७॥ इधर देखिए हे राघवेन्द्र यह द्रविड़ देशका निवासी कम्बुकण्ठ नामका राजा आपको प्रणाम कर रहा है ! हे दीनानाथ ! यह विदर्भ देशका अधिपति अग्रनाथ नामका राजा आपको