भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 811 में से

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पृष्ठ 373

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५७

लवार्पणैषणां बालां सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं बालिके बालं लवं श्रीराघवात्मजम् ॥३२॥ स्त्रीकामं स्वल्पवयसं सीतालालितमुत्तमम् । वाल्मीकिकृपया लब्धविद्यं रम्यं कुशानुजम् ॥३३॥ वृणोन्मेनं सुखेनैनं कण्ठेऽस्य मालिकां कुरु । कुशाङ्के चन्द्रिकेयं ते स्वसा यद्वत्स्थिताऽथ हि ॥३४॥ तथा त्वमपि भो मुग्धे लवाङ्के संस्थिता भव । इति तस्या वचः श्रुत्वा सुनन्दायाः स्मयानना ॥३५॥ लवस्य कण्ठे हर्षेण लज्जयाऽवनतानना । सुमतिर्निजहस्ताभ्यामर्पयामास मालिकाम् ॥३६॥ तदा निनेदुर्वाद्यानि जगुस्ते गायकास्तदा । ननृतुश्चाङ्गनाश्चैव तुष्टुवुर्बन्दिसङ्घाः ॥३७॥ भूरिकीर्तिर्नृपस्तुष्टो लवाङ्के सुमतिं तदा । शीघ्रं निवेशयामास परिपूर्णमनोरथः ॥३८॥ तोषमाप स्नुषादृष्ट्वा सीता प्रासादसंस्थिता । जानक्यैः सपत्नीकं लवं दृष्ट्वा तुतोष सा ॥३९॥ ततः सर्वान्नृपान् पूज्य भूरिकीर्तिर्नृपोत्तमः । प्रार्थयामास विनयवचनैस्तत्पुरस्तः स्थितः ॥४०॥ विवाहकौतुकं दृष्ट्वा भवद्भिर्गम्यतामिति । तथेति ते नृपा प्रोचुर्ययुश्चावसथानि हि ॥४१॥ रामेण सङ्गरं कर्तुमसमर्था गतश्रियः । म्लानानना मनोन्मोहाः कामबाणप्रपीडिताः ॥४२॥ रामोऽपि बन्धुमित्रैर्ययौ वासस्थलं मुदा । अथापरे दिने रामं भूरिकीर्तिः समाययौ ॥४३॥ पुरोधसोपविष्टः सन्नत्वा रामं वचोऽब्रवीत् । द्रष्टव्यो लग्नदानाय सुमुहूर्तः सुखावहः ॥४४॥ प्रार्थनां कुरु रामाद्य भक्तदास्यैककामुकम् । उभयोश्च मण्डपयोः कार्याण्याज्ञापय प्रभो ॥४५॥ तथेति राघवश्चोक्त्वा वसिष्ठं चोदयत्तदा । सोऽपि गणयित्वा ज्योतिषशास्त्रज्ञैः परिवेष्टितः ॥४६॥ मुहूर्तं कथयामास पञ्चमेऽहनि राघवम् । ततस्तुष्टो भूरिकीर्तिर्गणेशं लग्नपत्रिकाम् ॥४७॥

सुनन्दाको आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ ३० ॥ इसी प्रकार सुबाहु, पुष्कर, तदा, चित्रकेतु तथा अंगदको छांड़ती हुई वह लवके पास पहुंची ॥ ३१ ॥ जब सुमति लवकी ओर देखने लगी तब सुनन्दा बोली- हे बाले ! इस बालकको देख यह रामका पुत्र है, यह अपना विवाह करना चाहता है इसकी थोड़ी उमर है । सीताके द्वारा इसका पालन-पोषण हुआ है, वाल्मीकि कृपासे इसे उत्तम विद्या प्राप्त हुई है और यह कुशका छोटा भाई है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ तू सानन्द इसे अपना पति बनाकर इसके गलेमें वरमाला डाल दे, जिस तरह तुम्हारी बहिन चन्द्रिका कुशकी गोदमें बैठी है उस तरह या मुग्धे ! तू भी लवकी गोदमे बैठ जा । इस प्रकार सुनन्दाकी बात सुनकर वह मुस्कायी और लज्जावश मस्तक झुकाकर उसने अपने हाथोंसे लवके गलेमे वरमाला डाल दी । ३४-३६ ॥ उस समय अनेक प्रकारके बाजे बजे, गायकोंने गाने गाये, वेश्यायें नाचने लगीं और बंदीजन स्तुति करने लगे ॥ ३७ ॥ महाराज भूरिकीर्तिने प्रसन्न होकर सुमतिको लवकी गोदमें बिठा दिया ॥ ३८ ॥ यह देखकर रामचन्द्रजी तथा अटारीपर बैठी सीता दोनों प्रसन्न हुए । जब झरोखोंसे सीताने लवकी गोदमें सुमतिका बैठा देखा, तब उनकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं रहा ॥ ३९ ॥ इसके अनन्तर राजा भूरिकीर्तिने वहाँ आये हुए सब राजाओंका पूजा करके विनयपूर्वक प्रार्थना की-॥ ४० ॥ अब आप लोग विवाहका भी उत्सव देखकर जाइगा। राजाओंने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और अपने-अपने डेरेपर चले गये ॥ ४१ । वे सब राज रामसे युद्ध करनेमे असमर्थ थे । अतएव उनकी श्री नष्ट हो गयी थी, दुख दुस्सह होगया था उत्साह भंग हो गया था और कन्दर्प कामके बाणोंसे पीड़ित हो रहे थे ॥ ४२ ॥ राम भी अपने भाइयों और बान्धवोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक डेरेपर गये । इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्ति रामके पास पहुंचे ॥ ४३ ॥ पुरोहित उनके साथ था। वे रामके समक्ष बैठे और कहा कि कोई अच्छा लग्न- दिवस तथा सुखदायक मुहूर्त विचारिए । फिर कहा- हे राम ! अपने चरणके भक्त मुझ दासकी प्रार्थनाको अङ्गीकार करके दोनों मण्डपोंके लिए जो कार्य करने हैं, उनके लिए आज्ञा दीजिए ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ 'अच्छा' कहकर रामने वसिष्ठकी ओर संकेत किया । वसिष्ठ रामका आज्ञासे ज्योतिषशास्त्रको जाननेवाले कितने ही पण्डितोंके साथ विचार करके उनके पांचवें दिन विवाहका शुभ मुहूर्त बतलाया । इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे भूरिकीर्तिने गणेशजी, लग्नपत्रिका, गणकों, पण्डितों, वैदिक आदिको तथा रामके साथवाले बंधुजनों और

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