श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३६८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
सम्पूज्य गणकान्सर्वान्पूजयन्तान्समस्तशः । सुवस्त्रादिभिः सर्वैः सीतायै शुभमन्वदात् ॥४८॥ नत्वा रामं गृहं शश्वन्नकार मण्डपादिकम् । गत्वाऽऽज्ञां लक्ष्मणादेस्तु चकार मण्डपादिकम् ॥४९॥ तदा बडूपुरी रम्या पताकाध्वजसंवृता । पुरूषोत्तमराजधानी रेजे सागररोधसि ॥५०॥ ततो मुहूर्तसमये वधूश्छिद्रां निशां कुशम् । लबं च लिप्त्य नेत्राक्तं भीताद्या मातरस्तदा ॥५१॥ कुङ्कुमांग्रतदिक्षु जलपूर्णांन्महींऽकार संस्पृश्य स्नाप्य मासुमहानद्यमृतःपरम् ॥५२॥ तैलाभ्यंगं निशायुक्तं पीत या.स्तीपदालकैः । सदैवं चक्रुस्तन्दूढैर्त्वा रुक्ममर्पिताः ॥५३॥ अभ्यंगपूर्वकं मज्जुस्ते रामाद्याश्चादा मुदा । ममाहृय ततः सीता मुक्तानां स्वस्तिकोपरि ॥५४॥ वसिष्ठो मुनिभिर्युक्तः शिशुभ्यां राघवेण हि । गणपार्चां कारयित्वा पुण्याहादित्रयं क्रमात् ॥५५॥ देशाचारानुकुलाचारानिष्टदेवीं प्रपूज्य च । कुलयागस्य विधिवत्कृत्वा देवकस्य च ॥५६॥ तदा जनकनन्दिन्या रजनीकुंकुमान्विते । रेजतुः सुरक्तपादैर्नखराः पदपङ्कजे । ५७। सीताद्यास्ताः स्त्रियः सर्वा हरिद्रावर्णवस्त्रैः । हेमवस्त्रैश्च संवीताः पुण्ड्रपात्रणे ॥५८॥ ततः समाययुः सर्वे मुदा तत्र मुनीश्वराः । स्वयमग्रे मवे पूर्व नागता ये सहस्रशः ॥५९॥ श्रुवोत्साहं विवाहस्य कुशस्य च लवस्य ते, तान्सर्वान् रामचन्द्रोऽपि वस्त्रामरणधेनुभिः । ६०॥ पूजयामास विधिवत् स तया लक्ष्मणादिभिः । भूरिकान्तिर्नृपैर्युक्तो महाराजपुरन्दम् ॥६१॥ स्वयं कुशलबौ गेहं नेतुकामः समाययौ । मण्डपे पूजयामास वीरो रात्रः सुतस्तदा ॥६२॥ कुशं तथा लवं चापि कनीयान् भूरिदीधितः । हसनसुद्धवस्तिक्षेपैर्दाभरणार्दिभिः ॥६३॥ तदा विरेजतुर्र्वालौ तथा नेपथ्यमाददतः । ततस्तौ वण्ठन्त्यौ दिव्यचामरवीजितौ । ६४॥ पश्यन्तौ नर्तनान्द्यग्रे वाराङ्गणां स्थितास्ततो शृण्वन्तौ वाद्यघोषांश्च धणिनां मागधादिभिः । ६५॥
गुप्तोंके साथ सब प्रकार पूजा की ॥४८॥ इसके उपरान्त राम को प्रणाम कर अपने घर गये और वहां मण्डपादिककी तैयारी करने लगा । राजा जनकजी कुश तथा लव को लाये, जनकसम्पूर्ण ॥४९॥ उस समय समुद्रके तटपर स्थित पुरुषोत्तमराजधानी बडूपुरी ध्वजा पताकाओंसे संवृत होकर अतिशय सुन्दर और शोभित हुई ॥५०॥ इसके उपरान्त मुहूर्तके समय भयभीता माता जनकनन्दनी सीताजी ने कुश और लक्ष्मणकी भांतिसे बालकोंको उबटन लगाकर काजर आँजकर पूर्वदिशामें कलश रखकर ओर करकुम्भ (करवा) रखकर मोतियोंके ऊपर रखकर नहलाया। फिर बहुत प्रकारके पदार्थोंसे स्नान कराया ॥५१॥ ५२॥ उन बालकोंपर माताओंने पीत आदि प्रकारके वस्त्रोंसे आच्छादित करके उबटन लगाया ॥५३॥ फिर उबटन लगाकर उन सबके साथ रामने भी स्नान किया। इसके अनन्तर राम माताका बुलाकर मोतियोंसे बने हुए स्वस्तिक चौकके ऊपर बैठे और बहुतसे ऋषियोंके साथ आकर वसिष्ठने दोनों बालकके साथ रामके द्वारा गणेशजीकी पूजा करवायी और क्रमशः तीन प्रकारके पुण्याहवाचन करवाये ॥५४। ५५॥ तदनन्तर देशाचार तथा कुलाचारके अनुसार इष्टदेवकी पूजा करके विधिवत् देवताकी स्थापना की ॥५६॥ उस रात्रिके समय कुमकुम रंजित वस्त्र पहने हुए वरनोंके बालक बहुत ही सुन्दर लग रहेथे ५७॥ इनके सिवाय हरे, पीले, लाल और सुनहले कपडे पहन स्त्रियां भी बहुत भली लग रहीथी ॥५८॥ इसी समय में हजारों ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक वहां आ पहुँचे जो स्वयंवरके उत्सवमें नहीं आये थे ॥५९॥ वे भी कुश लवका विवाहोत्सव सुनकर आ गये। रामचन्द्रजीने भी सजा तथा वधुओके साथ अनेक तरहके वस्त्र-आभूषण तथा गौवें देकर उनकी पूजा की ॥६०॥६१॥ इसके बाद बहुतसे राजाओंके साथ कुश-लवको लेनेके लिए महाराज भूरिकान्ति आये वहाँ पहुँचकर भूरिकान्तिने दुष्ट और पुत्रोंके सवर्णके लागेक कामदार बहुतसे वस्त्र और आभरण देकर कुश-लवको पूजा की ॥६२।६३॥ उस समय वे दोनों बालक तथा बडूद आदि वीर बच्चे बहुत सुन्दर दीख रहे थे। इसके अनन्तर कुश और लव हाथपर बैठकर चले। उनपर दिव्य चमर ढलने लगे ॥६४॥ वे दोनों बालक वारांगनाओंका नृत्य देखते और विविध प्रकारके बाजोंकी मीठी ध्वनि