भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १ ]

मम पौत्र्यावुभे राम चंपिका सुमतिरिति च । तयोः स्वयंवरार्थं ह्यायाताश्च बहवो नृपाः ॥ १०॥ बंधुपुत्रैर्बंधुभिस्त्वं स्वसुताभ्यां च मंत्रिभिः । सुहृज्जनैस्तथा पौरैः सावरोधः स्वसेनया ॥ ११॥ आगच्छस्व मम पुरं मयि कृत्वा महन्कृपाम् । द्विषतां प्रार्थनां मे त्वं मा कुरुष्व विफ्लां प्रभो । १२॥ इति पत्रार्थमाकर्ण्य स्वस्थचित्तो रघूत्तमः । स्वयंवरं ततो गन्तुं गुरुणा निश्चय व्यधात् ॥ १३॥ ततोऽब्रवीन्म सौमित्रिमद्य सेनां प्रषोदय । श्वोऽहं गच्छामि युष्माभ्यां स्वया मंत्रिजनैः सह ॥ १४॥ भरतेनापि युष्माकं पुत्रैः शत्रुघ्नसंयुतः । स्वयंवरं सावरोधः पौरैर्जानपदैः सह ॥ १५॥ विजयो नगरीं गन्तुं पालितुं स्थापितो मया । अद्य वै वस्त्रगेहानि बहिर्नेयानि लक्ष्मण ॥ १६॥ पंथानं शोधयंत्वद्य नानादातृनरान्विताः । गच्छन्तु सकला नार्यः पुष्पकेण विहायसा ॥ १७॥ तथेति लक्ष्मणश्चोक्त्वा सत्कार स गशोधितम् । राघवेण समाभव्ये प्रबद्धकरसंपुटः ॥ १८॥ ततो द्वितीयदिवसे प्रभाते रघुनन्दनः । स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा निनाग्नीन्वै स पुष्पके । १९॥ स्थापयामास कुण्डेषु भुक्त्वा सह सुहृज्जनैः । ततः सीतां समाहूय त्वरयामास राघवः ॥ २०॥ ततः स्त्रियस्तदा सर्वाः सीताद्या रत्नभूषिताः । यानमञ्जुरुहुः शीघ्रं दिव्यवस्त्रादिमण्डिताः ॥ २१॥ ततो रामो गजारूढो वरच्छत्रोपशोभितः । ययौचाग्रे चामरैर्वीजितश्च मुहुर्मुहुः ॥ २२॥ रामाग्रे वारणारूढो ययौ शीघ्रं गुरुस्तदा । राघवस्य पृष्ठभागे करिस्थो लक्ष्मणो ययौ ॥ २३॥ ततः कुशाद्यास्ते हृष्टा बाला जग्मुर्गजस्थिताः । ततो भरतशत्रुघ्नौ नामतुर्गजसंस्थितौ । २४॥ ततः सर्वे मंत्रियश्च पौर जानपदादयः । नानावहनसंस्थास्ते ययुः सर्वे त्वरान्विताः ॥ २५॥ चतुर्दन्ते शुक्लवर्णं वारणंश्वतरोद्भवे । संस्थितो राघवो रेजे मुक्ताजालविराजिते ॥ २६॥ एवं रामः सुनेमार्गे वंदिमंगलशब्दनुतः । मृदंगद वाद्यनिनादैश्च ययौ पूर्वदिशं शनैः ॥ २७॥

होकर कौशल्याभी काममे अस्मे है। मैं मूर्खकीकी आपकी नाई जनक चरणकमलोंके संघनकी कामनासे रात-दिन प्रार्थना करता रहता हूँ ॥ ६ ॥ हे राम ! मेरो चम्पिका तथा सुमति नामकी दो पोतियां हैं। उनके स्वयंवरमें बहुतसे राजे आये हुए हैं। अतएव आपस भी प्रार्थना है कि अपने भ्राताओं पुत्रों, भ्राताओंके पुत्रों, मंत्रियों, मित्रों, घरकी नारियों, पुरवासियो तथा सेनाके साथ मेरे यहाँ पधारे हे प्रभो ! मेरी इस प्रार्थनाको विफल मत कीजिये ॥ १०-१२ ॥ इस प्रकार उस पत्रके अर्थको स्वस्थचित्त होकर रामचन्द्रजीने सुना और स्वयंवरमें जानेके लिए गुरु सहित निश्चय किया । इसके बाद रामने लक्ष्मणसे कहा कि आज सेना भेज दो । कल हम, तुम, सब, दूता, मंत्रियों, भरत तथा तुम लोगोंके पुत्रों, स्त्रियों तथा पुरवासियोंको साथ लेकर स्वयंवरमे चलेंगे। विजयको अयोध्या नगरी तथा दशकी रक्षाके लिए नियुक्त कर दिया जाय । हे लक्ष्मण ! तुम आज अभी तम्बूकनात आदि भेज दो १. १३-१६ ॥ झम्पट कुछ दूतोंको रास्ता साफ करनेके लिए आगे भेज दो। घरकी सारी स्त्रियं को पुष्पक विमान द्वारा पहले ही भेज दो । १७ ॥ लक्ष्मणने रामकी सब बातें मान लीं और जैसा उन्होंने कहा था, सो सब ठीक कर दिया । १८ । दूसरे दिन रामने सवेरे उठकर स्नान और नित्यकर्म करनेके अनन्तर सब बालकोंके साथ बैठकर भोजन किया । अग्निहोत्रकी अग्नि मँगवाकर पुष्पक विमानपर रखी ॥ १९ ॥ इसके बाद सीताको बुलाया और जल्दी तैयार होनेके लिये कहा ॥ २० ॥ सीता आदि नारियोंने सुनहले वस्त्र एवं आभूषण पहने और पुष्पक विमान पर जा बैठीं ॥ २१ ॥ इसके बाद राम एक सुन्दर हाथीपर बैठकर चले । उस समय उनके ऊपर श्वेत छत्र लगा हुआ था और सेवक उनपर चंवर डुला रहे थ ॥ २२ ॥ सबसे आगे गुरु वसिष्ठका हाथी था, उनके पीछे राम और रामके पीछे लक्ष्मणका हाथी था ॥ २३ ॥ उनके पीछे कुश आदि शांडों इष्टों और भरत-शत्रुघ्नका हाथी चल रहा था ॥ २४ ॥ इन सबके पीछे मन्त्री तथा पुरवासी अनेक प्रकारकी सवारियोंपर सवार होकर शीघ्रतासे चले जा रहे थे ॥ २५ । रामचन्द्रजी ऐरावतके कुलमे उत्पन्न चार दांतवाले तथा मोतियोंके झुमकेसे सुशोभित हाथीपर बैठे हुए बड़े सुन्दर लग रहे थे ॥ २६ ॥ इस तरह बन्दीजन-मगाध आदिकोंके हाथ