श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ३] विवाहकाण्डम् ३६७
लवादिनेत्रगां बत्वा सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं बालिके बालं लवं श्रीराघवात्मजम् ॥३२॥ स्वीकर्त्तुं स्वल्पवयसं सीतालालितमुत्तमम् । वाल्मीकिकृपया लब्धविद्यं रूपं कृशानुजम् ३३॥ गुणोपेतेन मुखेनैव कण्ठेऽस्य मालिकां कुरु । कुशार्क चपिकंर ते मग्ना पद्धस्तिथाऽद्य हि ॥३४॥ तथा त्वमपि भो मुग्धे लवांके संस्थिता भव । इति तस्या वचः श्रुत्वा सुनन्दायाः स्मितानना ।३५॥ लवस्य कण्ठे हर्षेण लज्जाऽवनतमानना । समर्पिनिजबाहुभ्यामर्पयामास मालिकाम् ॥३६॥ तदा निनेदुर्वादित्राणि जगुस्ते गायकास्तदा । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः । ३७॥ भूरिकीर्त्तिर्नृपस्तुष्टो लवांके सुमतिं तदा । शीघ्रं निवेशयामास परिपूर्णमनोरथः । ३८॥ तोषमाप रघुश्रेष्ठः सीता प्रासादसंस्थिता । जानक्यैः सञ्चनाश्च लवं दृष्ट्वा तुतोष सा । ३९॥ ततः सर्वांन्नृपान् पूज्य भूरिकीर्त्तिर्नृपोत्तमः । प्रार्थयामास विनयवचनेनभृगुत्तमः स्थितः ॥४०॥ विवाहकौतुकं दृष्ट्वा भवद्भिर्गम्यतामिति । तथेति ते नृपाः प्रोचुर्ययुर्मार्गस्थलांनि हि ॥४१॥ रामार्थे समरं कर्त्तुमसमर्था गतश्रियः । म्लानानना गतोत्साहाः कामबाणप्रपीडिताः ॥४२॥ रामोऽपि बन्धुभिश्चालेयैयीं वामस्थल मुदः । अथपरे दिने गत्वा भूरिकीर्त्तिः समाययौ ॥४३॥ पुरोधसोपविष्टः सन्मन्त्वा रामं रथोऽब्रवीत् । द्रष्टव्या लग्नदिवासाः सुमुहूर्त्तः सुखावहः ॥४४॥ मामङ्गीकृत्य रामाय त्वत्पादाश्रयकामुकम् । उभयोश्च मण्डपयाः कार्याण्याज्ञापय प्रभो । ४५॥ तथेति राघवोक्त्वा वसिष्ठ चादचत्तदा । सोऽपि गमाज्ञया ज्योतिःशास्त्रज्ञः परिवेष्टितः ॥४६। मुहूर्त्तं कथयामास पञ्चमेऽहनि राघवम् । ततस्तुष्टो भूरिकीर्त्तिर्गणेशां लग्नपत्रिकाम् ॥४७॥
सुनन्दाका आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ ३० ॥ इसी प्रकार स्वादु, पुष्कर, तैल, चित्रकेतु तथा अंगदको छाडता हुई वह लवके पास पहुंचा । ३१॥ जब सुमति लवकी ओर देखने लगा तब सुनन्दा बाला -ने बोले। इस बालकको देख, यह रामका पुत्र है । यह अपना विवाह करना चाहता है। इनकी थोड़ी उमर है । सीताके द्वारा इसका पालन-पोषण हुआ है। वाल्मीकिजी कृपासे इस लब्ध विद्या प्राप्त हुई है और यह कुशका छोटा भाई है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ तू मानन्द इस अपना दान बनाकर इसके गलेमें वरमाला डाल दे जिस तरह तुम्हारी बहिन चन्द्रिका कुशकी गोदमे बैठी हे उस तरह मा तुम तू भी उसकी गोदमें बैठ जा इस प्रकार सुनन्दाकी बात सुनकर वह मुसकुराता ओर लज्जावश मस्तक झुकाकर उसने अपने हाथोंसे लवके गलेमें वरमाला डाल दी ॥ ३४-३६ ॥ उस समय अनेक प्रकारके बज बज, गायकोंने गाने गाये, वेश्यायें नाचने लगी और बन्दीजन स्तुति करने लगे । ३७॥ महाराज भूरिकीर्त्तिने प्रसन्न होकर सुमतिको लवकी गोदमे बिठा दिया । ३८ । यह देखकर रामचन्द्रजी तथा मंदारोपर बैठी सीता दोनों प्रसन्न हुए। जब जानकीने सीताने सबवा मानन्द सुमतिकी देखा तब ता उनकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं रहा ॥ ३९ ॥ इसके अनन्तर राजा भूरिकीर्त्तिने वहाँ आये हुए सब राजाओंका पूजा करके विनयपूर्वक प्रार्थना की-॥ ४० ॥ अब आप लोग विवाहका भी उत्सव देखकर जाइयेगा। राजाओंने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और अपने-अपन डेरेपर चल गये ॥ ४१ ॥ वे सब राज रामसे युद्ध करनेम असमर्थ थे । अतएव उनकी श्री नष्ट हो गयी थी, मुख कुम्हला गया था, उत्साह भंग हो गया था और बेजार कामके बाणोंसे पाडित हो रहे थे ॥ ४२ ॥ राम भी अपने भाइयों और बच्चोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक डेरेपर गये । इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्त्ति रामके पास पहुंचे ॥ ४३ ॥ पुरोहित उनके साथ था, वे रामके समक्ष बैठे और कहा कि कोई अच्छा लग्न- दिवस तथा सुखदायक मुहूर्त्त विचारिए । फिर कहा हे राम ! मदने वरणके भक्त मुझ दासकी प्रार्थनाको अंगीकार करके दोनों मण्डपं के लिए जो कार्य करने हों, उनके लिए आज्ञा दीजिए ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ "अच्छा" कहकर रामने वसिष्ठकी ओर सङ्केत किया । वसिष्ठने रामकी आज्ञा से ज्योतिषशास्त्रको जाननेवाले कितने ही पंडितोंके साथ विचार करके उनके पांचवें दिन विवाहका शुभ मुहूर्त्त बतलाया । इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे भूरिकीर्त्तिने गणेशजी, लग्नपत्रिका, गणकों, पण्डितों, वैदिक बादियों तथा रामके साथवाले बंधुजनों को