भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् १४३

एवं नानोत्सवास्तत्र बभूवु रामवेश्मनि । अथ ते बालकाः सर्वे स्यन्दनादिषु संस्थिताः ॥१३०॥ दिव्यवस्त्राणि चित्राणि परिधाय समंततः । अयोध्याराजमार्गेषु हट्टेषु च चतुष्पथे ॥१३१॥ आरामोपवनारण्यवाटिकासु नदीतटे गमनागमने चक्रुः सेनया मंत्रिबालकैः ॥१३२। एवं साकेतनगरे बालकैः सीतया सुखम् । रेमे स बंधुभिर्युक्तश्चिरं राजा रघूद्वहः ॥१३३। एवं शिष्य मया प्रोक्तं जन्मकांडमिदं तव । कुशादीनां च जन्मानि वर्णितान्यत्र विस्तरात् ॥१३४॥ रम्यं पवित्रमानंददायकं च मनोहरम् । पुत्रपौत्रप्रदं जन्मकांडमेतत्सुखावहम् ॥१३५॥ जन्मकांडमिदं पुण्यं ये शृण्वंति नरोत्तमाः । तेषां पुत्रैश्च पौत्रैश्च वियोगो न भविष्यति ॥१३६॥ जन्मकांडमिदं ये भक्त्या शृण्वंति मानवाः । तेषां स्त्रीणां वियोगो हि न कदाप्यत्र जायते ॥१३७॥ जन्मकांडमिदं पुण्यं याः शृण्वंत्यत्र वै स्त्रियः । स्वभर्तृभिर्वियोगं ता न गच्छंति यथा रमा ॥१३८। ग्रामं देशान्तरं तीर्थं ये गताश्चिरं नराः । तेषामागमनार्थे हि जन्मकांडं पठेदिदम् ॥१३९। येषां भावीनि कार्याणि लब्धुं त्वरयते मनः । तैनरैः पठनीयं वै जन्मकांडं दिने दिने ।१४०॥ पूर्वे दिने चैकवारं द्विवारं चापरे दिने । एवं नवदिनं वृद्धिन्नयैकं क्षयोऽपि हि ।१४१। कार्यो नरैः स्वस्थचित्तैस्तेषां कार्यं भविष्यति । वर्षमेकं पठेद्भक्त्या ह्यपुत्रोऽपि लभे सुतम् ॥१४२॥ पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । इष्टान् कामांश्च कल्याणं जन्मकाण्डश्रवणालभेत् ॥१४३॥


इस तरह रामचन्द्रजीके भवनमे अनेक प्रकारके उत्सव हुए । वे सब रथ, हाथी, घोड़े आदि सवारियोंपर सवार हो-होकर बगीचे, उपवन, वन तथा नदीतट आदिपर अयोध्याके चौराहों तथा बाजारमें अनेक प्रकारके वस्त्र-आभूषण पहनकर मन्त्रियोंके लड़कोंके साथ आने जाने लगे ॥ १२६-१३२ ॥ इस तरह उस साकेतपुरमें उन बालकों तथा सीताके साथ आनन्दपूर्वक रामचन्द्रजी रहने लगे । हे शिष्य ! यह जन्मकाण्ड मैंने तुम्हें सुनाया । जिसमें कुश आदि बालकोंकी विस्तृत जीवनी वर्णित है । १३३ ॥ १३४ ॥ यह जन्मकाण्ड परम रम्य आनन्ददायक, मनोहर, सुखसौभाग्यका देनेवाला और पुत्र पौत्रादिका दाता है । जो लोग जन्मकाण्डको सुनते हैं, उनका कभी अपने पुत्रपौत्रादिके वियोगका दुःख नहीं उठाना पड़ता । जो लोग भक्तिपूर्वक इस जन्मकाण्डका श्रवण करते हैं, उनका अपनी स्त्री का भी वियोग कभी नहीं होता । यदि स्त्रियां इसे सुनती हैं तो उन्हें अपने स्वामीसे कभी वियुक्त नहीं होना पड़ता बल्कि लक्ष्मीके समान वे जन्मभर आनन्दसे अपना जीवन बिताती हैं ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ यदि किसीके परिवारका कोई मनुष्य किसी तीर्थ या परदेशको चला गया हो तो उस लोगनके लिए इस जन्मकाण्डका पाठ करना चाहिए । जिसको अपना कोई भावी कार्य सिद्ध करना हो उसको चाहिए कि पहले दिन एक बार, दूसरे दिन दो बार, तीसरे दिन तीन बार, इस क्रमसे बढ़ाते-बढ़ाते नवें दिन नौ बार जन्मकाण्डका पाठ करे । नवें दिनसे एक-एक पाठ घटाता हुआ फिर नवें दिन केवल एक पाठ करे । इस तरह यदि स्वस्थचित्तसे इसका पाठ किया जाय तो प्रत्येक कार्यकी सिद्धि हो सकती है। यदि इस विधिसे एक वर्ष पर्यन्त जन्मकाण्डका पाठ किया जाय तो पुत्रहीन व्यक्ति भी पुत्र प्राप्त कर सकता है । १३७-१४२ ॥ कहनेका