भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

२४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

ततस्तौ बालकौ रम्यौ वेदाध्ययनमुत्तमम् । चक्रतुर्गुरुसन्निधौ विधिवद् द्विसत्तमौ ॥११४॥ एवं तेषां तु बालानां सर्वेषां रघुनन्दनः । व्रतबन्धविधानानि यथाकाले महोत्सवैः ॥११५॥ चकार गुरुणा विप्रैः समाहूय नृपादिकान् । विशेषं निजपुत्राभ्यां चकार स महोत्सवैः ॥११६॥ अकरोदधिकं किञ्चिन्न न्यूनमकरोद्विभुः । ततस्ते बालकाः सर्वे ब्रह्मचर्यव्रते स्थिताः ॥११७॥ चक्रिरे गुरुसान्निध्ये वेदाध्ययनमुत्तमम् । अथ रामोऽपि तैर्दृष्ट्वा बालकैः परिवारितः ॥११८॥ विरेजे स्कन्दगणपादिभिर्देव्यै यथा शिवः । अथ ते बालकाः सर्वे कृत्वाऽध्ययनमुत्तमम् ॥११९॥ वेदादीनां गुरुस्यानुज्ञया ज्ञानं गुरोस्ततः । जग्मुस्तीर्थानि वै कर्तुं सेनया गुरुवह्निभिः ॥१२०॥ पृथिव्यां भरते खण्डे यानि तीर्थानि यानि ते । कृत्वा समाप्त्यैः पञ्च मासैः स्वां नगरीं शनैः ॥१२१॥ बालान्समागताञ् श्रुत्वा शोभयित्वा निजां पुरीम् । प्रत्युज्जगाम सौमित्रिः पुरस्कृत्याथ वारणम् ॥१२२॥ ते दृष्ट्वा लक्ष्मणं नेमुस्तेनालिङ्गिता अपि । नानोत्सवैर्ययुर्हत्वा अयोध्यायां गृहं प्रति ॥१२३॥ मार्गे मार्गे पुरस्त्रीभिः सौधस्थाभिस्तु वर्षिताः । वृष्टिभिः कुसुमादीनां दीपैर्नीराजिता अपि ॥१२४॥ ततस्ते बालकाः सर्वे सभायां रघुनन्दनम् । नेमुस्तेनालिङ्गिताश्च ययुः सीतागृहं ततः ॥१२५॥ एतस्मिन्नन्तरे सीतोर्मिला माण्डवी तथा । श्रुतकीर्तिश्च वेगेन चक्रुर्नीराजनं पृथक् ॥१२६॥ दध्योदनैर्यवार्दिद्यैः पक्वान्नैस्तैलपाचितैः । सर्षपैर्लवणैर्माषैस्तोयकुम्भैश्च सादरम् ॥१२७॥ ततस्ते बालकाः सर्वे नेमुः सीतां पृथक् पृथक् । ततो नेमुः स्वमातॄंश्च पश्चा नत्वा पितामहीः ॥१२८॥ ततस्ते बालकाः सर्वे ददुर्दानान्यनेकशः ब्राह्मणान् भोजयामासुः कोटिशस्ते पृथक् पृथक् ॥१२९॥


साथ सब लोगोंको बुलाकर लवका यज्ञोपवीतसंस्कार किया ॥११३॥ फिर वे दोनों बालक गुरु वसिष्ठके पास विधिपूर्वक वेदाध्ययन करने लगे । इसी रीतिसे रामचन्द्रने समय-समयपर लक्ष्मण भरत आदिके बच्चों-का भी व्रतबन्ध-संस्कार कराया और अपने लड़कोंसे बढ़कर उत्सव-दानादि किये । उसमें किसी प्रकारकी न्यूनता नहीं होन दी वे बच्चे भी संस्कृत होकर विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यके नियमोंका पालन करते हुए गुरुके पास वेदाध्ययन करने लगे। यह सब ही ज्ञानके साथ-साथ सदा पुत्रोंके साथ बैठे हुए रामचन्द्रजी पार्वती, गणेश तथा स्वामिकार्तिकेयके साथ बैठे शिवजीके सदृश सुन्दर लगते थे । इसके बाद सब उन बालकोंने अच्छी तरह विद्याध्ययन कर लिया तो एक विशाल सेना, गुरु तथा कितने ही मन्त्रियोंको साथ लेकर तीर्थयात्रा करनेको निकले ॥११४-१२०॥ पृथ्वीके भरतखण्डमें जितने तीर्थ हैं, उन करके पांच महीनेमें वे सब बालक अयोध्या वापस आ गये ॥१२१॥ लक्ष्मणने जब सुना कि लड़के तीर्थयात्रासे अयोध्या लौट आये हैं तो बहुतसे बाजे-गाजे तथा हाथीयोंको साथ लेकर अगवानी करने गये ॥१२२॥ जब उन्होंने लक्ष्मणको देखा तो मस्तक झुका-झुकाकर प्रणाम किया और लक्ष्मणने उनको अपनी छातीसे लगा-लगाकर आलिंगन किया । फिर अनेक प्रकारके उत्सवोंके साथ उनका महलोंमें ले चले । रास्तेमें अयोध्याकी नारियां अट्टारियोंपर चढ़-चढ़कर उनपर फूलोंकी वर्षा करतीं और आरती उतारती थीं । इसके बाद बालकोंने राजदरबारमें जाकर रामको प्रणाम किया और वहाँसे सीताके महलोंको गये । वहाँ पहुंचनेपर सीता, उर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्तिने अलग-अलग उन बालकोंकी आरती उतारी पक्वान्न, दही, भात तैलके बने पक्वान्न, सरसों, नमक, उड़द तथा पानी भरे कलश आदि हरकाफर बलि दी गयीं। इसके बाद उन सबोंने कौशल्या आदि तथा पिता और भाइयोंको प्रणाम करके सीता आदि माताओंको प्रणाम किया ॥१२३-१२८॥ इसके बाद उन बालकोंने भाँति-भांतिके दान दिये और अलग-अलग करोड़ों ब्राह्मणोंको भोजन कराया।