श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 357, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] उत्तरकाण्डम् २४१
दन्तान् जिह्वां विशोध्याथ कृत्वामलविशोधनम् । स्नात्वाऽऽप्यैर्वर्तयेन्मन्त्रैः प्राणानायम्य यत्नतः ॥९८॥
उपस्थानं रवेः कृत्वा संध्ययोरुभयोरपि । अग्निकार्यं ततः कृत्वा ब्राह्मणानभिवादयेत् ॥९९॥
अमुकशर्मन्गोत्रोऽहमभिवादय इत्यपि । धारयेन्मेखलां दण्डापवीताजिनमेव च ॥१००॥
अनिन्द्यं चरेद्भैक्ष्यं ब्राह्मणेभ्याऽमत्सये । वाग्यतो गुर्वनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सयन् ॥१०१॥
एकान्नं च समश्नीयाच्छ्राद्धेऽश्नीयान्नचाऽऽपदि । द्विवारं नैव भुञ्जीत दिवा कापि द्विजोत्तमः ॥१०२॥
सायंप्रातर्द्विजोऽश्नीयादग्निहोत्रविधानवित् । मधु मांसं प्राणिहिंसां नास्तङ्गलोकनं जले ॥१०३॥
स्त्रियं स्पृष्टिनोच्छिष्टं परिवादं विवर्जयेत् । यथेष्टचेष्टो न भवेद्गुरोर्नयनगोचरे ॥१०४॥
न नाम परिगृह्णीयात्परोक्षेऽप्यविशेषणम् । गुरुनिन्दा भवेद्यत्र परिवादस्तु यत्र च ॥१०५॥
श्रुती विधाय स्थातव्यं गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ।
न मात्रा न पितुः स्वस्रा न स्वस्रैकान्तवांस्तथा ॥१०६॥
बलवंतीन्द्रियाण्यत्र मोहयन्त्यपि कोविदान् । एवमादीन्यनेकानि ब्रह्मचारिव्रतानि हि ॥१०७॥
तस्मै गुरुरुपदिश्य ददौ दानान्यनेकशः । भोजयामास तं मात्रा सह मानोत्सवैस्तदा ॥१०८॥
कारयित्वाऽथ पालाशपूजनं विधिवत्पूर्वकम् । तेनापि कुशहोत्रेण देवकस्य विसर्जनम् ॥१०९॥
चकार राघवश्चैव सीतया स गुरुस्तदा । ततो रामो नृपतिभिर्जनकेनापि पूजितः ॥११०॥
चकार धनवस्त्राद्यैस्तुष्टान् विप्रान्नृपादिकांन् । आचांडालांन्सदा रामस्तोषयामास सादरम् ॥१११॥
एवं नानामहोत्सवैर्यन्मासमेकं विनाय सः । रामो विसर्जयामास तत्रत्यान्नृपार्थिकादिकान् ॥११२॥
एवं कालांतराद्रामो व्रतबंधं लवस्य च । चकार पूर्ववत्सर्वान्समाहूय नृपादिकान् ॥११३॥
गये हैं, उनके अनुसार शौचसे निवृत्त होकर दाँत तथा जीभ साफ कर लेनेके बाद वरुण दैवत्य से सम्बन्ध रखनेवाले मन्त्रोंका पाठ करता हुआ स्नान करे । फिर आचमन-प्राणायामादि करके दोनो समयको सूर्यका उपस्थान करना चाहिये । इसके पश्चात् हवन करके ब्राह्मणोंका प्रणाम करे ॥ ९७-९९ ॥ प्रणाम करते समय यह भी कहना जाय कि अमुक नामका अमुक व्यक्ति मैं आपको प्रणाम करता हूँ । उच्च जातिके लोगों अथवा जहाँतक हो सके, सुपात्र ब्राह्मणोंके यहाँसे भिक्षा माँगकर अपनी जीविका चलाय । किसीकी निन्दा न करे तथा मौनव्रतका पालन करे और जब गुरुकी अनुमति मिल जाय, तभी भोजन करे ॥ १०० ॥ १०१ ॥ सदा केवल एक समयका भोजन करे । श्राद्धोंमें तथा किसी आपत्समय कायक आ आनेपर भी दिनमें दो बार भोजन न करे । ब्राह्मणको चाहिये कि केवल सुबहशाम भोजन करे । मधु तथा मांसका आहार, प्राणिहिंसा, जलमें सूर्यके प्रतिबिम्बका दर्शन, स्त्रीप्रसंग, बासी और जूठा भोजन तथा दूसरेकी निन्दा इन कामोंको छोड़ दे । गुरुके सामने अपने इच्छानुसार जो चाहै, सो न कर डाल ॥ १०२-१०४ ॥ परोक्षमें भी बिना विशेषण लगाये गुरुका नाम न ले । जहाँपर गुरुकी निन्दा हो रही हों अथवा उनकी ठठोली की जाती हो, वहाँ कान ढांककर बैठे या वहाँसे उठ जाय । अपनी माता, बुआ अथवा बहिनके साथ भी एकान्तमें न बैठे ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं। वे बड़े बड़े पण्डितोंको भी बातकी बातमें विचलित कर देता है। इस प्रकार गुरुने बहुतसे ब्रह्मचर्य व्रतसम्बन्धी नियम बतलाये ॥ १०७ ॥ इसके अनन्तर अनेक तरहके दान दिये गये । कुशको माताके साथ भोजन कराया गया ॥ १०८ ॥ तब विधिवूर्वक पलाशका पूजन कराया । फिर कुश, होता तथा रामके द्वारा आहूत देवताओंका पूजन कराया ॥ १०९ ॥ इसके बाद बहुतसे राजाओं तथा जनकजीने रामका पूजन किया । रामने बहुतसे धन-वस्त्रों द्वारा आये हुए राजाओं तथा ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके अयोध्यानिवासी चाण्डालसे लेकर ऊँचसे ऊँचे कुल तकके लोगोंको आदर प्रसन्न किया ॥ ११० ॥ १११ ॥ इस तरह नाना प्रकारके उत्सवोंके साथ एक महीनेका समय बिताकर मेहमानीमें आये हुए राजाओं और ऋषियोंको विदा किया ॥ ११२ ॥ कुछ समय बीतनेके बाद उसी तरह कुशकेही