भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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३६२ आनन्दरामायणे [सर्गः ४

एवं रामो गृहं गत्वा बालाभ्यां स्वीयमब्रवीत्। कारयित्वा समाश्चर्यं मददीद्दानान्यनेकशः ॥३२॥
तदाऽलङ्कारवस्त्राद्यैः संपूज्य रघुनन्दनः । मुदः सकलांश्चापिनिशान् जानपदान्नृपान् ॥३३॥
आचांडालदिकान्त्सर्वान् संतुष्टानकरोन्मुदा । ततः स भूरिकीर्तिस्तान् मन्त्रिणः सैन्यसंयुतान् ॥३४॥
सम्पूज्य प्रेषयामास स्वदेशं रघुनन्दनः । तत स्मातुन् जानपदान् महदृश्च प्लवङ्गमान् ॥३५॥
विभीषणादिकांश्चाज्ञां संमु मान्यस्थल ददौ, ततः सर्वे राघवस्य ने संभाषणाद्युहिनैः ॥३६॥
स्वस्वकोशेषु संपूर्य ययुः स्वं स्वं गृहं मुदा । मृगंडेशैर्नभेश्चरैः सर्वैः संपूज्याश्च तिवारिवाः ॥३७॥
अथ रामः स्नुषाभ्यां च पुत्राभ्यां बन्धुभिःसिया । राज्यं चकार राज्यं स भक्तेणप्रतिभं चिरम् ॥३८॥
ततः श्रावणमासस्य दर्शमारभ्य षोडश । प्राप्तमन्वन्तरे यानि सनिमुख्यार्हदिनानि हि ॥ ३९॥
नेषु मासं सं राम मागरूपं सवानरम् । संपूज्य भूरिकीर्तिः स विनाय परमं पदम् ॥४०॥
ऋणभायै विविधैर्वस्त्रालङ्कारवाहनैः । कियद्दिनानि सम्भाव्य ददावाज्ञां पुनः पुनः ॥४१॥
मन्वन्तरप्रमुखार्हदिनानि षोडशाधुना । विष्णुद स मया तेऽग्रे कथ्यन्ते तानि वै शृणु ॥४२॥
श्रावणस्याथ मासस्य कुहः श्रेष्ठा प्रकीर्तिता । भाद्रशुक्लचतुर्थी तु विजया दशमी नरापुनः ॥४३॥
दीपावल्याश्च चत्वारि दिनान्यानि हि । मार्तंडार्य पदंमा च तथा षष्ठाऽथ पुनः ॥४४॥
मक्रान्तिर्महानवम्या तु तथा चैव नवम्यपि । ... षष्ठ्युत्सवाश्चाथ पुनस्तदा ॥४५॥
अक्षय्याख्या तृतीया च तथा वै ज्येष्ठपूर्णिमा । कार्त्तिके हुतशांडश्चैव पञ्चैतानि हि ॥४६॥
मन्वन्तरप्रमुख्यानि त्वाख्यातानि... । तस्मिन् सर्वान् जनान् रामः सादरं पर्यपूजयत् ॥४७॥
एवं कुशस्य च तथा लवस्यापि सविस्तरम् । विरहोऽती रतिर्भर्ते शिष्य यथा पूर्वं श्रुतौ मया ॥४८॥
यदा श्रीरामचन्द्रश्च वैकुण्ठारोहणं शुभम् भवितव्येति तदाऽयोध्यापुर्यां वै मग्न्युजले ॥४९॥

सुशोभित हो रहे थे और अनेक नगाड़े बजने लगे थे, उसपर फूल बरस रहा था ॥३२॥ इस तरह बड़े उत्साहके साथ वे अपने राजभवनमें पहुंच वहां उन्होंने आश्चर्य्य रूपसे संस्कार दूरस्त कराया और अनेक तरहके दान दिये ॥३३॥ उस समय रामने अपने सम्बन्धीगण, समस्त पुरवासियों, मित्रों जनपदवासियों और चाण्डालों से लेकर साधारण श्रेणीवाले पालोंको सबका नाना प्रकारके वस्त्रों और अङ्गलङ्कार समर्पण करके सबको प्रसन्न किया। इसके पश्चात् महाराज भूरिकीर्तिके मंत्रियों तथा सेनाकी पूजा करके उन्हें विदा किया। इसके बाद जनक आदि सम्बन्धियों, वानरों तथा विभीषण आदि मित्रोंको उच्च प्रमाण के आदर के साथ सम्मामित करके अपने नगरको जानेकी आज्ञा दी ॥३३-३६॥ इस प्रकार रामके आदर सत्कारको स्वीकार करके उन लोगोंने भी वैसे रामका पूजा की और अपन-अपने देशको लौटे ॥३७॥ इसके बाद राम सीता पुत्रों एवं वधुओंके साथ रहते हुए बहुत दिनों तक धर्मातुकुल राज्य करते रहे। ३८। तदनन्तर श्रावणकी अमावास्यासे लेकर वर्षमें षोडश बड़े त्योहारों और उत्साहके दिनोंमें हजार व परिवार के साथ पुर समेत सुग्रीवको अपने यहां सादर बुलाते थे । ३९ । ४०॥ वहां पहुंचनेपर वे वस्त्र अलंकारादि समर्पित करके उनकी पूजा करते थे। कुछ दिन राम वहां रहकर फिर उनको राज भवन और सुग्रीवको आज्ञापर फिर पहुंचा जाया करते थे ॥४१॥ हे विष्णुदास अब मैं तुम्हें वर्षके उन सोह दिनों के नाम सुनाता हूँ सो तुम उन्हें श्रवण करो ॥४२॥ हे श्रावण मासकी अमावसया, भाद्रपद शुक्लपक्षकी चतुर्थी व उसकी विजया दशमी ॥४३॥ और दीपावलीके आगे पाछवाले चार दिन बड़े महत्पूर्ण होते हैं ।४४। मार्गशीर्ष कृष्णपक्षकी पंचमी तथा षष्ठी, मकरकी संक्रान्ति रघुनवमी और चैत्र शुक्लकी हुताशनी प्रतिपदा का बड़ा पवित्र शिव योग है ॥४५॥ अक्षयतृतीया ज्येष्ठकी पूर्णिमा और श्रावणके शुक्लपक्षकी नागपंचमी व छटवें मान्यवर शिव योग हैं ॥४६॥ ये ही मन्वन्तरके बड़े बड़े उत्सव और इस मासमें पड़े हैं। इन्हीं दिनों भारण कि सपरिवार रामके अपने यहां बुलाकर पूजन करते थे ॥४७॥ हे शिष्य ! जैसा कि मैंने आजके बहुत दिनों पहिले कुश तथा लवका विवाह वृत्तान्त सुना था, उसी तरह वर्णन किया ॥४८। इसके