श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context| २४६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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नानाफलानां पात्राणि पूजापात्राण्यनेकशः, सुगन्धद्रव्यपात्राणि दधुस्ते मन्त्रिपुङ्गवाः । ७२ ।
एवं सुगन्धवस्तूनि प्रक्षिपन् वरयोषित्स्वम् । वृष्टेषु सीतया रामो विरेजे स्यन्दने स्थितः । ७३ ॥
सुगन्धरागपूर्णैश्च जलयन्त्रैः करे धृतैः ।
वाराङ्गनानां वस्त्राणि वपुषादीनां च राघवः । ७४ ।
चित्रितान्यकरोद्वाणैः किंशुकानिव माधवे । शनैः सुहृधं रायाङ्गराद्रवेखेषु राघवः ।। ७५ ।।
क्षिप्त्वा परिमलादीनि चित्रितान्यकरोत्पुनः नर्तन्त्सु वारयोषित्सु वाद्येषु निनदत्सु च । ७६ ।।
स्तुवत्सु वन्दिबृन्देषु पुष्पवृष्टिर्विराजितः ।
ययौ राजगृहद्वारं रामो राजपथा शनैः । ७७ ।
मार्गे कुंकुमप्रदीपैश्च दध्योदनविनिर्मितैः । बलिदीपैः पूर्णकुम्भे राजमार्गे पुरस्त्रियः । ७८ ।।
चक्रुर्नीराजनं रामं स्वस्त्यर्थं सीतया वृतम् । अवरुह्य रथाद्रामो सीतयाऽग्निं निजे गृहे । ७९ ।
स्थाप्य स्त्रीरत्नभां गत्वाऽऽरुरोह स्वौयमासनम् ।
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे प्रणेमु रघुनंदनम् । ८०॥
राज्ञा मुकुटरत्नौघप्रभाभिः पदपंकजे । विरेजतू राघवस्य तदा सिंहासनोपरि । ८१ ।।
मुकुटस्थावतंसानां परागैः पूजिते नृपैः । प्र.पर्तुर्नितरां शोभां रक्तोत्पलनिभे परे ॥८२॥
सीमन्तस्थचन्द्रसूर्य रत्नमाणिक्यदीप्तिभिः ।
सुरपार्थिवपत्नीनां सीतायाः पादपङ्कजे ॥८३॥
विरेजतुः परागैश्च केशपद्मप्रसूनजैः । सुप्रपतिसुपर्णानां पूजिते कनकोज्ज्वले ।।८४।।
ततः सभायां श्रीरामं स्तुन्वा देवैर्महेश्वरः । आर. मन्तरराजेन क्षारामेष्वपि पूजितः ॥८५॥
आकाशमार्गसे अयोध्याकी ओर चल इधर रामचन्द्र भी पृथक् उत्सवोंके साथ रथपर सवार होकर राज-महलकी ओर बढ़े । जब रामचन्द्र आकाशमार्गमें प्रविष्ट हुए इस समय भगवान्की एक अनोखी शोभा थी । रामजी सीताजीके साथ रथपर बैठे थे । लक्ष्मण अपन हाथोमे छत्र भरत पंखा, शत्रुघ्न चमर, सुग्रीव पानदान, हनुमानजी जलकी झारी, नल ऊगलदान अङ्गद अना विभीषण कपडोकी पेटी और जाम्बवान् धूपदानी लिए हुए थे । इसी प्रकार अनेक पूर्वोक्त पात्र पूजाकी सामग्री और अनेक सुगन्धमय द्रव्यके पात्र इहाँके अच्छे-अच्छे मन्त्री ले-लेकर चले । इनमें वे मन्त्री वेश्याओके ऊपर गुलाबकेवड़ा आदिके इत्रकी वर्षा करते जा रहे थे । उस समय विविध प्रकारके सुगन्धित तथा रङ्गीन फौवारे छूट रहे थे, जिससे सबके कपडे एक विचित्र रूपके दिखाई दे रहे थे । उन्हीं भीग हुए और रङ्गीन कपडोंपर रह-रहकर रामचन्द्रजी स्वयं गुलालकी वर्षा करके उन्हें और भी विचित्र बना देते थे । इस तरह वेश्याओंके नृत्य, बाजे-वालोंके बाजों, वन्दीजनोंकी स्तुतियों और देवताओंकी पुष्पवृष्टिके साथ राज राजमार्गसे चलते हुए रामचन्द्रजीके महलकी ओर जा रहे थे । ६४-७७ ॥ रास्तेमें स्थान स्थानपर जलसे भरे कलश और दही भात आदिकी बलि दिखलायी जाती थी। सीतासमेत कल्याणकी कामना में अर्थ यावमिनी स्त्रियां भगवान्की आरती उतार रही थीं । महलके फाटकपर पहुँचकर रामचन्द्रजी रथसे उतर पड़े और सीताजीके साथ अपने यज्ञ-भवनमें गये । यज्ञीय अग्निको देवगृहमे स्थापित करके वे राजसभाम जा पहुँचे । सभाके सुन्दर सिंहासन-पर भगवान् आसीन हुए । तब देश देशान्त से आये हुए राजाओने उन्हें प्रणाम किया । जिस समय ये राजे अपना मस्तक झुकाकर अपने मुकुटका रामचन्द्रज के चरणोंमे स्पर्श करा रहे थे, उस समय भगवान्की एक विचित्र झाँकी दिखायी देती थी । जब उन राजाओ, रानियो और देवियोने सीतारामको प्रणाम तथा