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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

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सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २९९


तत्र गुल्फौ रक्तवर्णौ वर्तुलौ मांसलौ शुभौ । जंघे गोपुच्छसदृशे वर्तुले मांसले शुभे ॥४४॥
निलोमे मृदुले पीने रुचिरे श्लक्ष्णनेत्रे वरे । रन्तू नौ ने महाजानू मांसलौ बीजपूरवत् ॥४५॥
।मास्तंभोपमं चोरू मांसलौ न्वतिकोमलौ । पीनौ घनौ वर्तुलौ तौ विलासी मे मुखोचितौ ॥४६॥
जघनं मांसलं रम्यं वर्तुलं गजकुंभकत् । पीतं विलोम सुस्निग्धं मम चित्तैकमोहनम् ॥४७॥
नाहं ते वर्णने शक्तो रतिस्थानस्य भामिनि । गंभीरं वर्तुला नाभिस्त्वहृद्या प्रदश्यते ॥४८॥
वलित्रय तु जठरे दृश्यते त्रिमुखेशिवत् । सुराजमध्यं कठिना तन्वयस्ते कटिस्तथा ॥४९॥
रम्यं तथोदरं सूक्ष्मं मृदुलं मांसल शुभम् । विलोमं पीतवर्णं च पुत्रोत्पत्तिसमुद्भवम् ॥५०॥
शङ्खस्य शकलेनेव स्पष्टने तद मांसलः । पृष्ठस्तंभः कोमलश्च निम्नौ लोमविवर्जितः ॥५१॥
पार्श्वेऽतिमुदुले पीने मांसले लोमवर्जिते । कुक्षी पीने लोमहीने मांसले किंचिदुन्नते ॥५२॥
हृदयं कोमलं रम्यं मांसलं पीनमुन्नतम् । विस्तीर्णं लोमहीनं च सुस्नेहञ्च मौरुयदं मम ॥५३॥
हेमकुंभसमानौ द्वौ कुचौ पीनौ घनौ शुभौ । गजशुंडादंडतुल्यौ पीनौ ते कोमलौ भुजौ ॥५४॥
कृशा रम्भाः कोमलाश्च तेऽङ्गुल्यो जनकात्मजे । रक्ते पाणितले शंखध्वजमत्स्यादिचिह्निते ॥५५॥
मांसले कोमले प्रोच्चैः सुरखाणपिण्डने वर । करपृष्ठं लोमहीनं मांसल कोमले शुभे ।५६॥
पीनौ स्कंधौ वर्तुलौ ते जनुस्ते मांसपूरितः । कण्ठस्तंऽतिपीनश्च मवलित्रय उत्तमः ॥५७॥
मध्ये निम्नं सुपीनं ते चिबुकं वतुल मृदु । प्रवालविम्वसदृशारक्तः कोमलो, घनः । ५८।
सीते तेऽधोऽधरो भाति मधुरोऽमृतमखिमः । कुंदपुष्पकलिकाया स्पर्द्धन्ते दशनास्तव ।५९॥
सांद्राः कृत्रिमवर्णेश्च कृष्णाञ्जा मनोहरः । हेमपुष्पैरिवैततवत्तैश्चित्रविचित्रिताः । ६०॥


हैं। जंघायें तौकी पूंछके समान वरतुलम एवं गाढ़ी ताजी हैं । ४३ । ४४ ॥ उनमें न तो कहीं एक भी रोम दिखाई देते हैं न शरीरकी नसें हों। दोनो जघन जानू (बिजौरे नींबू) की तरह मोटे और बर्तुलाकार हैं ॥ ४५ ॥ तुम्हारे दोनो ऊरु कदली खम्भकी नाईं मट और कोमल हैं। उनका सुन्दर वर्ण और उनकी सुन्दर छटा मुझे बहुत अच्छी लगती है ॥ ४६॥ जघनभाग भी मोटा, सुन्दर और हाथीक मस्तकी तरह वर्तुल है। यह पीतवर्ण, लोमहीन, सुचिक्कण तथा मनोमोहक है ॥ ४७ । हे भामिने ! तुम्हारे रतिस्थानका वर्णन करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। तुम्हारी नाभी भी गहरी वर्तुलाकार और सुन्दर है । ४८ ॥ तुम्हारे पेटमें तीन रेखाएँ शांत वेणीके समान दिखाई पड़ती हैं। तुम्हारी कमर मृगराज (सिंह) की तरह पतली है ॥ ४९ ॥ तुम्हारा उदर सूक्ष्म, मृदुल और मांसल है। उसम कहीं भी लोम नहीं दिखाई पड़ता। वह तीन वर्णका है और उसकी देखने से भावी पुत्रोत्पत्तिका सूचना मिलती है ॥ ५० ॥ शङ्खखण्डकी तरह माटी ताजी तुम्हारी पीठकी रीढ़ है। दोनों पार्श्वभाग ही अतिकोमल होनेसे दीप्त ही बनते हैं। कुक्षि भी पीतवर्ण, लोमहीन, कुछ ऊँची एवं मोटी ताजी है । ५१ ।। ५२ ॥ हृदय कोमल, रम्य, मांसल, पीला और ऊँचा है। वह लोमहीन है और बहुत दूर तक फैला हुआ है। वह छूनेमें चिकना मालूम होता है । इसलिए मुझे वह बहुत सुन्दर जंचता है । ५३ ॥ स्वर्णकलशकी नाईं मोटे और कठोर तुम्हारे दोनों कुच हैं। तुम्हारी दोनों भुजाएँ हाथीकी सूंडकी तरह मोटी, कोमल और सुन्दर हैं ॥ ५४ ॥ पतली सुन्दर और कोमल तुम्हारे हाथोंकी उँगलियाँ हैं। शंख, ध्वज, मकर तथा मत्स्यादि चिह्नों युक्त लाल-लाल तुम्हारी दोनों हथेलियाँ हैं ॥ ५५ ॥ उसी तरह उनका पृष्ठभाग भी लोमहीन, मांसल, कोमल और सुन्दर है ॥ ५६ ॥ बर्तुलाकार, मोटे ताजे, मांससे अच्छी तरह भरे हुए और शङ्खकी नाई तुम्हारे दोनों कन्धे हैं। ग्रीवामें तीन सुन्दर रेखाएँ हैं । ५७ ॥ तुम्हारा मध्यभाग भी निम्न, पीन एवं कोमल है। प्रवाल और बिम्बफलका तरह लाल, कमल और रसभरा तुम्हारा चिबुक है ॥ ५८ ॥ हे सीते ! अमृतको तरह मधुर तुम्हारा अधरोष्ठ है। कुन्दकी कलिकाकी लज्जित करनेवाले तुम्हारे दाँत हैं ॥ ५९ ॥ उनमें बत्तीसी पड़ी हुई है। पान खाने खाते वे काले हो गये हैं। उनमें जहाँ-तहाँ सुवर्णके तारकी