श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context१२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
रामं नौकां काङ्क्षमाणं नाविक्यो वाक्यमब्रवीत् । नाविक उवाच आदावहं क्षालयित्वा पादरजूंस्तव प्रभो ॥ २४ ॥ पश्चान्नावां समारोप्य तर पादौ रघूद्वह । नोचेत्पाद रजसा स्पृष्टा नारी भविष्यति । २५ ॥ क्षालयामि तव पादपङ्कजं नाथ दारुदृषदोः कियन्तरम् । मानुषीकरणचूर्णमस्ति ते इति लोके हि कथा प्रगीयते ॥ २६ ॥ अस्ति मे गृहिणी गेहे किं करिष्याम्यहं स्त्रियम् । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य विहस्य रघुनन्दनः ॥२७॥ तेन प्रक्षालितपदो नौकां समारुरोह सः । ततस्तीर्त्वा जाह्नवीं ते मिथिलां मुनिभिर्ययुः ॥२८॥ मिथिलायां समाहूताः कोटिशः पार्थिवा ययुः । चापसज्जीकरणाख्योऽपि श्रुत्वाऽऽगच्छत्त्वरामितैः॥२९॥ अनाहूतः पुष्पकेण सेनया परिवारितः । न ययौ पुत्रविरहाद्राजा दशरथस्तदा ॥३०॥ अन्यादरेर्विदेहेन समाहूतोऽपि भक्तितः । श्रीरामलक्ष्मणाभ्यां च विश्वामित्रो मुनीश्वरः ॥३१॥ शनैर्बुद्धा स मिथिलां बहिश्चोपवनं ययौ विश्वामित्रं समानेतुं जनको मन्त्रिभिः सह ॥३२॥ यावद्गन्तुं मनश्चक्रे तावच्छिष्यः समाययौ । विश्वामित्रस्य तं दृष्ट्वा ननाम जनकस्तदा ॥३३॥ ततः शिष्यः करं धृत्वा जनकस्य रहोग हि नीत्वा रहसि प्रोवाच वचनं स्वगुरोः स्फुटम् ॥३४॥ त्वामाह गाधिनो राजन् राज्ञो दशरथस्य हि मया पुत्रौ समानीतौ वीरों श्रीरामलक्ष्मणौ ॥३५॥ तौ सीतोर्मिलयोः पाणिग्रहणं हि करिष्यतः पणीकृतं त्वया चापं रामोऽयं खण्डयिष्यति ॥३६॥ अतो वरविधानेन द्वौ पुरीं नेतुमर्हसि यावद्वै चापसंरोषपर्यन्तं मा स्फुटं कुरु ॥३७॥
देवताओं और गन्धवोंने जिनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वृष्टि की थी, ऐसे राम तथा लक्ष्मण गौतमको बहुहरा सोपकर जाह्नवी (गङ्गा) का आर चल पड़े ॥२३॥ गङ्गातटपर पहुंचकर रामचन्द्र पार उतरनेके लिये नाव खोज ही रहे थे कि इतनेमें एक नाववाला बोला - हे प्रभो ! हे रघूद्वह रामचन्द्रजी ! यदि आप कहें तो मैं पहिले आपके चरणोंकी धूलि धो लूँ, बादमें आपको नावपर बैठाकर पार उतार दूँ। क्योंकि ऐसा न करनेपर कहीं आपकी पादरज छूनेसे मेरी नाव भी स्त्री न बन जाय । क्योंकि पत्थर और लकड़ीमें कोई बहुत अन्तर नहीं होता । यह बात जगत्में प्रसिद्ध है कि आपके चरणोंकी रजमें जड़को भी मनुष्य बनानेकी सामर्थ्य है। इसलिये आपका चरण धोना आवश्यक है ॥२४-२६ । क्योंकि मेरे घरमें एक स्त्री है। अतएव में दूसरीको लेकर क्या करूँगा । इस अटपटे वाक्यको सुनकर आनन्दकन्द रामचन्द्र हँस पड़े । २७ ॥ बादमें जब उस धीवरने पाँव धो लिया, तब रामचन्द्रजी मुनियोंके साथ नावपर सवार होकर गङ्गा पार हुए और वहाँसे मिथिलापुरीकी ओर चले ॥२८॥ मिथिलामें निमन्त्रित राजाओंका एक प्रकारका छोटा सा समुद्र एकत्र हो गया था । रावण भी बिना बुलाये चापभङ्ग सुनते सुनकर ही सेना तथा मन्त्रियोंसे घिरा हुआ पुष्पक विमानपर चढ़कर वहाँ जा पहुँचा । उस समय राजा दशरथ आदर तथा भक्ति- पूर्वक जनकके द्वारा बुलाये जानेपर भी पुत्रविरहसे दुखी होनेके कारण नहीं आये थे। उसी समय मुनियोंके ईश्वर विश्वामित्र भी राम और लक्ष्मणके साथ धीरे धीरे आनन्दपूर्वक मिथिलाके बाहर एक उपवनमें जा पहुंचे। राजा जनक विश्वामित्रको लिवा लानेके लिए जाना ही चाहते थे कि विश्वामित्रका एक शिष्य वहाँ आ पहुँचा। उसको विश्वामित्रका शिष्य जानकर राजाने नमस्कार किया ॥ २९-३३ ॥ शिष्यने राजाका हाथ पकड़ तथा एकान्तमें ले जाकर अपने गुरुकी भेजा हुआ सन्देश भलीभाँति कह सुनाया ॥ ३४ ॥ उसने कहा- गाधिपुत्र विश्वामित्रने कहा है कि मैं अपने साथ राजा दशरथके दो शूरवीर पुत्रों राम-लक्ष्मणको यहाँ ले आया हूँ ॥ ३५ । ये दोनों सीता तथा ऊर्मिलाका पाणिग्रहण करेंगे और आपका पणीकृत धनुष रामचन्द्रजी तोड़ेंगे । ३६ । इसलिये वरको ले आनेके विधानसे इन दोनोंको नगरमें लाना चाहिये । जबतक धनुष भङ्ग न हो, तबतक यह वृत्तान्त किसीको न बताइयेगा ॥ ३७॥ राजा