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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

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१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

श्रीमहादेव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत् । सनत्कुमारविघ्नेशसंवादं पापनाशनम् ॥१०॥ उपविष्टं गणाध्यक्षमेकान्ते प्रणिपत्य च । सनत्कुमारः पप्रच्छ सर्वधर्मविदां वरम् ॥११॥

सनत्कुमार उवाच भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वविघ्नविनाशन । द्विजहत्याहरं धर्मं वक्तुमर्हसि मे प्रभो ॥१२॥ विना भवन्तं धर्मस्य वक्ता नास्ति जगत्त्रये ।

श्रीगणेश उवाच साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन्सर्वलोकोपकारकम् ॥१३॥ मया चिरं कृतं कर्म स्मारितं भवताऽनघ पुराऽहं गजरूपेण जातः पर्वतसन्निभः ॥१४॥ रुतो वृक्षान्समुत्पाट्य मुनिहिंसां समारभम् । तदा मया मुनिगणा निहता बहवो बलात् ॥१५॥ हाहाकारो महानासीद्ब्राह्मणानां समन्ततः । तदा ह्यत्याहृतेन चेष्टितः पतितोऽस्म्यहम् ॥१६॥ निःसंज्ञं मृततुल्यं मां पतितं वीक्ष्य मे पिता । अराधयज्जगतामीशं रामं सर्वहृदि स्थितम् ॥१७॥ प्रत्यक्षमकरोद्देवं मद्हेतो रघुनन्दनम् । तदा प्रोवाच भगवान् श्रीरामः पितरं मम ॥१८॥

श्रीराम उवाच प्रसन्नोऽस्मि महादेव किं मां प्रार्थयसे प्रभो दास्यामि यदभीष्टं ते त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥१९॥

श्रीमहादेव उवाच द्विजहत्यासमाविष्टं मम पुत्रमिमं प्रभो । निष्पापं कुरु देवेश यद्यस्ति मयि ते दया ॥२०॥

श्रीगणेश उवाच तथेत्युक्त्वा तदा तेन कृपादृष्ट्याऽहं निरीक्षितः । तत्क्षणाल्लब्धचैतन्यो निर्मलज्ञानबुद्धिदः ॥२१॥ बहुभिर्गद्यपद्यैश्च स्तुत्वा तं प्रणतोऽभवम् ।

अत आप मुझपर कृपा करके ब्रह्महत्यादि महापापोंके निष्कृतिका कोई उपाय बतलाइए। श्रीशिवजी बोले— हे देवि ! मैं तुम्हें अतिशय गुह्य तथा पापनाशक सनत्कुमार और गणपति का सम्वाद सुनाता हूँ ॥ ७-१० ॥ एक समय जब कि गणेशजी एकान्तमे बैठे हुए थे तब सनत्कुमारने जाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा-हे भगवन् ! समस्त धर्मोंको जाननेवाले तथा विघ्नके विनाशक हे प्रभो मुझ ब्रह्महत्याका विनाश करनेवाला कोई कर्म बतलाइए ॥ ११ । १२ ॥ आपके सिवाय तथा लाख्या कोई सा धमका वक्ता मुझे नहीं दीखता । गणपतिने कहा-हे ब्रह्मन् ! तुमने मुझसे बहुत ठीक प्रश्न किया है। इससे सारे संसारका उपकार होगा ॥ १३ ॥ तुमने एक ही बातसे पूर्वमे किये हुए मेरे सब कर्मोका स्मरण दिला दिया है। पूर्वकालमे मैं गजरूपसे संसारमें जन्मा था और पर्वतकी भाँति लम्बा चौड़ा मेरा डील डौल था । १४ । उस समय मैने पहले तो बहुतसे वृक्ष उखाड़े । फिर मुनियोंकी हिंसा आरम्भ कर दी। मैने अपने अपरिमय बलसे कितन ही मुनियोंका बघ कर पापी बन बैठा ॥ १५ । १६ ॥ मेरे होश-हवास ठिकाने न रह तथा एक मृतककी नाईं मेरी आकृति हो गयी । मेरी दशा देखकर मेरे पिताने संसारके महाप्रभु रामकी आराधना की, इससे प्रसन्न होकर रामचन्द्रजी मेरे पिता- के सम्मुख आये और कहने लगे। रामचन्द्रजी बाले हे महादेव ! मै तुम्हारे ऊपर अति प्रसन्न हूँ । बतलाओ, तुम किसलिए इस प्रकार मेरी प्रार्थना कर रहे हो ? तुम्हारा कामना यदि तीन लोकमे दुर्लभ होगा तो भी मै उसे पूर्ण करूँगा ॥ १७-१९ ॥ श्रीशिवजीने कहा-हे प्रभो ! मेरे पुत्र गणेशको ब्रह्महत्या लग गयी है। हे देवेश ! यदि आपकी मुझपर दया हो तो उसे निष्पाप कर दीजिए ॥२०॥ श्रीगणेशजी सनत्कुमारसे कहने लगे-इसप्रकार मेरे पिताकी बात सुनकर रामचन्द्रने अपनी कृपाभरी दृष्टिसे एक बार मेरी ओर देखा। उनके देखते ही मैं चैतन्य हो गया। घेरेमें एक निर्मल ज्ञानका प्रकाश संचार हो गया ॥ २१ ॥ तब बहुतसे गद्य-पद्यों द्वारा मैने भगवान्की