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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

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३८२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

अथ ध्यानम्

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलस्पर्धि नेत्रं प्रसन्नम् ।
रामांकास्तूर्णताक्षमुखकमलमलम्प्रेक्ष्यनेत्रं नीलाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥३१॥

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे
मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने संस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं
व्याख्यातं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजेच्छ्याम लम् ॥३२॥

सौवर्णेमण्डपे दिव्ये पुष्पके सुविराजिते । मूले कल्पतरोः स्वर्णपीठे सिंहासनेयुते ॥३३॥
मृदुल्लक्ष्णीतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् । रामं नीलोत्पलश्यामं द्विभुजं पीतवाससम् ॥३४॥
स्मितवक्त्रं सुखासीनं पद्मपत्रनिभेक्षणम् । किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ॥३५॥
आभ्रमानं ज्ञानमुद्राधरं वीरासनन्दितम् । स्पृशन्तं स्तनयोश्च जानक्याः सव्यपाणिना ॥३६॥
वसिष्ठवामदेवाद्यैः सेवितं लक्ष्मणादिभिः । अयोध्यानागरो रम्ये अभिषिक्तं रघूद्वहम् ॥३७॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं रामनामसहस्रकम् । हत्याकोटियुतो वापि मुच्यते नात्र संशयः ॥३८॥
ॐरामः श्रीमान्महाविष्णुर्जिष्णुर्देवहितावहः । तत्त्वं चा तारक ब्रह्म शाश्वतः सर्वसिद्धिदः ॥३९॥
राजीवलोचनः श्रीमांल्लक्ष्मण्यो रघुपूंगवः । रामभद्रः सदाचारो राजेन्द्रो जानकीपतिः ॥४०॥
अग्रगण्यो वरेण्यश्च वरदः परमेश्वरः । जनार्दनो जितमित्रः परार्थैकप्रयोजनः ॥४१॥


से दोनों नेत्र छुए तथा 'हुंफट्स्वाहे' कहकर चुटकी बजाये । अथ ध्यानम् जिनका आजानु बाहु है, जो धनुष-बाण धारण किये हैं, पद्मासन मारकर बैठे हैं, पीत वस्त्र पहने हैं, नवीन कमलदलसे होड़ करनेवाले जिनकी दोनों आँखें हैं, जिनके वामभाग सीताजी बैठी हैं सीता तथा राम दोनों आपसमें एक दूसरेके मुखकी शोभा देखनेमें संलग्न हैं, नवीन मेघके सदृश जिनका रूप है, विविध प्रकारके अलङ्कारोंसे अलंकृत तथा लम्बो लम्बी जटा धारण करनेवाले रामचन्द्रका ध्यान करे ॥३१॥ कल्पवृक्षके नीचे सुवर्णके मध्य एक सुन्दर सुवर्णके मण्डपमें पूर्वनिर्मित महासन, जिसमें अनेक प्रकारकी मणियां जड़ी हैं, उसपर श्रीराम वीरासनसे बैठे हुए हैं। उनके सामने बैठे हनुमान्‌जी मुनियोंको परम सम्बन्ध व्याख्यान कर रहे हैं। भरतादि तीनों भ्राता जिनकी बगल-बगल खड़े हैं। ऐसे श्यामस्वरूप रामका भजन करे ॥३२॥ सुवर्णनिर्मित दिव्य पुष्पक विमान कल्पतरुके नीचे रक्खा है। जिसमे आठ सिंह लगे हैं। जो कोमल और चिकने हैं, ऐसी गद्दीपर सीताके साथ बैठे हुए हैं नीलोत्पल सरीखे जिनके नेत्र हैं दो भुजाएं हैं, पीत वस्त्र है, मुसकुराता हुआ मुख है और वे आनन्दसे बैठे हैं। किरीट, हार, केयूर कुण्डल और कटकादिसे सुशोभित हो रहे हैं। वे एक ओर ज्ञानमुद्रा धारण किये हैं। दूसरी तरफ बायें हाथसे सीताके स्तनोंको छूते हैं। ॥३३-३६॥ वसिष्ठ, वामदेव तथा लक्ष्मणादिक जिनकी सेवामें तत्पर हैं। अयोध्या नगरीमें जिनका राज्यभिषेक हो चुका है। ऐसे रघूद्वह रामचन्द्रजीका ध्यान करके सर्वदा इस रामसहस्रनामका पाठ करना चाहिए। ऐसा करनेसे यदि किसीको करोड़ों हत्यायें भी लगी हैं तो दूर हो जाती हैं इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिए। ॥३७-३८॥ ॥३८॥ अब सहस्रनाम कहते हैं - राम, श्रीमान्, महाविष्णु, जिष्णु (सबको जीतनेवाले), देवहितावह (देवताओंका कल्याण करनेवाले), तत्त्वात्मकस्वरूप तारकब्रह्म, शाश्वत, सर्वसिद्धिद (सब प्रकारकी सिद्धियो-को देनेवाले) ॥३९॥ कमल सरीखे नेत्रवाले, श्रीमान्, रघुपूंगव, धनु, रामभद्र, सदाचार, (पुनीत आचारवाले) राजेन्द्र, जानकीके पति ॥४०॥ सबमें अग्रेसर, वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ), वरद (वरदायक)