श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 544 of 811
Read in context५२८ आनन्दरामायणे [सर्गः २१
तादृशं राममालोक्यं पात्रं दूरं विलोक्य च । कृत्वा पात्रं स्वहस्ताभ्यामंजलावथ तद्ग्रसम् ॥३३॥ रामेण मुक्तमास्याच्च जग्राह वेगतोभृशं । ततः सा प्राशनं रामोच्छिष्टं दासी चकार तत् ॥३४॥ महाप्रसादं तं मत्वा देवालब्धं विचिन्त्य च । तदाऽतितुष्टः श्रीरामस्तस्यै तत्कर्मणाऽब्रवीत् ॥३५॥ वरयस्व वरं दासि यत्ते मनसि वर्तते तद्रामवचनं श्रुत्वा दासी प्राह रघूत्तमम् ॥३६॥ एकपत्नीव्रतं तेऽस्ति सांप्रतं विह जन्मनि जन्मांतरे त्वया संगं वाञ्छामि रघुनायक ॥३७॥ तत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् । यदाऽग्रे कृष्णरूपेण गोकुलेऽवतराण्यहम् ॥३८॥ तदा राधेति नाम्नी त्वं गोपिकासु भविष्यसि । तदा मया चिरं क्रीडां त्वं भोक्ष्यसि न संशयः ॥३९॥ सदा ममातिप्रीता त्वं गोपिकासु भविष्यसि । इति दासी रामचन्द्राद्वरं लब्ध्वा तुतोष सा ॥४०॥ अन्यच्छृणु विष्णुदास रामचन्द्रकथानकम् । सम्प्रोच्यते मया तेऽग्रे महत्कौतुककारकम् ॥४१॥ एकदा राघवः श्रीमान्त्सभायामासनोपरि । मन्त्रिभिर्बन्धुभिः पुत्रैर्मन्त्रिभिः पूज्यसंनिधौ ॥४२॥ एतस्मिन्नन्तरे कश्चिद्ब्रह्मचारी समाययौ युवा दण्डधरः श्रेष्ठः कमंडलुकरः शुचिः ॥४३॥ ऐणकृष्णाजिनधरः काषायवसनो व्रती तं दृष्ट्वा राघवः श्रीमानुत्थाय वरासनात् ॥४४॥ प्रत्युद्गम्याथ तं नत्वाऽऽसने समुपवेश्य च । पूजयामास विधिना धेनुमग्रे निवेद्य च ॥४५॥ ततः सम्पूजितं विप्रं राघवो वाक्यमब्रवीत् । अद्य धन्योऽस्म्यहं विप्र यत्ते दर्शनं मम ॥४६॥ कार्यमाज्ञाप्यतां किंचिद्यदर्थं भवनाऽऽगतम् । तद्राघववचः श्रुत्वा ब्रह्मचारी वचोऽब्रवीत् ॥४७॥ वाल्मीकिना प्रेषितोऽहं यस्त्वात्तच्छृणु राघव । चिकीर्षामी महायज्ञं स वाल्मीकिर्महामुनिः ॥४८॥ त्वामाकारयितुं मां स्वानिकटे वरात्मजम् । प्रेषितवानतस्त्वं हि सीतया बन्धुभिः सह ॥४९॥ प्रस्थानं कुरु राजेन्द्र मुहूर्तस्त्वद्य वर्तते । एवं वदति श्रीरामं भूसुरे सदसि स्थिते ॥५०॥
समक्ष गयी, किन्तु पात्र दूर था। इसलिए ग्रासको रोकनेके लिए उसने अपनी अञ्जली फैला दी ॥ ३१-३३॥ रामने भा वह ग्रास उसके हाथम फेंक दिया। दासी उसको लेकर तुरन्त खा गयी। उसने मनम सोचा कि यह महाप्रसाद है और भगवन्न आज मुझे मिल गया है। उसके इस व्यवहारसे राम बडे प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा - ॥ ३४। ३५ ॥ अरी दासी तेरा जो इच्छा हो, वह वर मांग ले। रामकी बात सुनकर उसने कहा - इस समय आप एकपत्नीव्रती हैं। इसलिए हे रघुनायक मैं दूसरे जन्मस आपके साथ एकान्त सहवास करना चाहती हूँ। ३६ । ३७॥ उसकी यह बात सुनकर रामने कहा कि अगले जन्मम मैं कृष्णरूपस गोकुलम अवतार लूँगा, तब तुम राधा नामस विख्यात एक गोपपत्नी होओगी। उस समय बहुत दिना तक तुम मेरे साथ क्रीडाका सुख भोगोगी, इसम कोई संशय नहीं है ॥ ३८। ३९ । सूतका सारा गोपियम तुम मुझे भत्रमे प्रिय होओगी। दासी इस तरह रामचन्द्रजीसे वरदान पाकर प्रसन्न हो गया । ४० । हे विष्णुदास रामचन्द्रजीकी एक दूसरी कथा भी मैं तुम्हारे आगे कह रहा हूँ, वह बड़ा कौतुकजनक है। ४१ ॥ एक समय राम भगवान सिंहासनपर भाइयों, पुत्रों तथा मन्त्रियोंके साथ बैठे थे ॥ ४२ ॥ उसो समय एक युवा ब्रह्मचारी दण्ड धारण किये और हाथमें कमण्डलु तथा पवित्र मृगछाला लिये और काषाय वस्त्र धारण किये वहाँ आ पहुंचा। उसे देखते ही श्रीमान् रामचन्द्रजी आसनसे उठ खड़े हुए। थोड़ा आगे बढ़कर उसे प्रणाम किया और एक अच्छे आसनपर बिठलाया। फिर गोदान देकर उन्होंने उसका पूजा का । ४३-४५ ॥ पूजन कर लेनेके पश्चात् रामने कहा-हे विप्र ! आज आपके दर्शन- से मैं अपनेको धन्य समझता हूँ ॥ ४६ । अच्छा, अब आप मुझे वह आज्ञा दीजिए कि जिसके लिए आप यहाँ आये हों। रामकी यह बात सुनकर ब्रह्मचारी कहने लगा । ४७ । श्रीवाल्मीकिजीने मुझे आपके पास भेजा है। वे एक महायज्ञ करना चाहते हैं। इसीलिए आपको बुलानेके लिए मुझे भेजा है। हे राजेन्द्र ! आज बड़ा अच्छा मुहूर्त है। अतएव सीता तथा अपने भ्राताओंके साथ आप शीघ्र प्रस्थान कर दीजिए। इस प्रकार वह