श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in contextसर्ग १७] मनोहरकाण्डम् ७३७
कोदण्डभंजनेत्युक्त्वा रावणमर्दनेति च । कौसल्येति तथोक्त्वा विश्रामेति ततः परम् ॥१६२॥
सीतारंजनेति ततो राजारामेति वै ततः । सप्तविंशाक्षराख्यं मनु प्रोक्तः शुभप्रदः ॥१६३॥
कोदण्डभंजन रावणमर्दन कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजारामेति मनुः ।
कोदण्डखंडनेत्युक्त्वा वालीताडन चेति वै । लङ्कादहनेति ततः पाषाणतारणेति च । १६४।
रावणमर्दनेत्युक्त्वा रविकुलेति वै ततः । भूपेति तथोक्त्वा कौसल्येति ततः परम् ॥१६५॥
विश्रामेति तथोक्त्वा सीतारंजन चेति वै । राजारामेति चोक्त्वा पञ्चाशदक्षरो मनुः । १६६॥
अयं सदा कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः । मन्त्रोऽयं हि नृणांऽत्रत्यं महापातकनाशनः ॥१६७॥
कोदण्डखंडन वालीताडन लङ्कादहन पाषाणतारण रावणमर्दन रविकुलभूषण कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजारामेति मनुः ।
एवं नानाविधा मंत्राः सन्ति शिष्य सहस्रशः । सहस्रवर्षपर्यन्तं कस्तान् वक्तुं भवेत् क्षमः । १६८॥
एते सर्वे कीर्तनाया वीणावाद्येन सुस्वराः । इदं चान्यज्जानीया न ज्ञेया मान्त्रगोत्तमाः । १६९॥
मंत्रशास्त्रेषु ये प्रोक्तास्ते जपाय एव मन्त्रिणे । नैयतः कीर्तनायान्यैः कीर्तनीयास्त्विमे स्मृताः १७०॥
एतान् मन्त्रान् पुरस्कृत्य प्रबन्धा विविधाः शुभाः । रचनीया बुधैश्च कुर्वाणैर्नामानि पाथिगद्गतान् ॥१७१।
ये ये नोक्ता मया मन्त्रास्तान् पुरस्कृत्य गद्यपद्यैः । बन्धने नैव दोषोऽस्ति तेनोष्टो जायते हरिः ॥१७२॥
मन्त्रैः प्रबन्धैः काव्यैश्च स्तुतिभिः कीर्तनादिभिः । प्राचीनैर्वा कविनूतैः रामो गेयः सदा नरैः ॥१७३॥
येन केन प्रकारेण कार्यं राघवचिन्तनम् । पापराशिः क्षयं दृष्ट्वा श्रीरामाच्चितनेन हि ॥
अवश्यत्र न संदेहः पावकेन यथा कुटी ॥१७४।
दंभेन वातिभक्त्या वा निष्कामाद्वा सकामतः । यद्यत्र राघवो गीतस्तेन पापं हुतं भवेत् ॥१७५॥
स्वरसे कीर्तन करना चाहिए ॥ १६० । १६० ॥ 'कोदण्डखण्डन दशशिरोमर्दन कौसल्यासुत राम सीतारंजन राजाराम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है 'कोदण्डभंजन कहकर 'रावणमर्दन' इसके बाद 'कौसल्याविश्राम' और 'सीतारंजन राजाराम' कहे । यह सताईसअक्षरात्मक शुभ राममन्त्र है ॥ १६१ । १६२ ॥ "कोदण्डभंजन रावणमर्दन कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजाराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। 'कोदण्डखण्डन' कहकर "वालीताडन" और इसके बाद क्रमशः लङ्कादहन पाषाणतारण "रावणमर्दन" "रविकुलभूषण" "कौसल्याविश्राम" और 'सीतारंजन राजाराम' ऐसा कह । यह पञ्चाशदक्षरात्मक राममन्त्र है, इसे भी वीणा आदि बाजोंके साथ मीठे स्वरसे गाना चाहिए । यह मन्त्र सब राममन्त्रोंमें श्रेष्ठ है और बडे बडे पातक नष्ट कर देता है ॥ १६३-१६६॥ 'कोदण्डखण्डन वालीताडन लङ्कादहन पाषाणतारण रावणमर्दन रविकुलभूषण कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजाराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। हे शिष्य ! इस प्रकार हजारों राममन्त्र हैं। जिन्हें कोई हजारों वर्ष तक कहता जाय, फिर भी पूरी तौरसे नहीं कह सकता । १६७॥ ऊपर बतलाये सब मन्त्रोंको वीणा आदि वाद्यके साथ मीठे स्वरसे गान चाहिए। श्रेष्ठ मनुष्योंको यह भी जान लेना चाहिए कि ये सब मन्त्र जपके लिए नहीं बल्कि गान करनेके लिए हैं। इसके अतिरिक्त मन्त्रशास्त्रोंमें जितने मन्त्र बतलाये गये हैं, वे सब जपनेके लिए हैं, गान करनेके लिए नहीं। बुद्धिमान् कवियोंको चाहिए कि इन्हीं मन्त्रोंके आधारपर विविध भाषाओंमें विविध प्रकारके प्रबन्धोंकी रचना करें ॥ १६८-१७० ॥ मैंने जिन जिन मन्त्रोंको नहीं बतलाया है उन्हें भी बुद्धिमान् लोग गद्य वा पद्यके रूपमें ला सकते हैं। उस ग्रन्थोंकी रचना करनेमें कोई दोष नहीं होता, बल्कि ऐसा करनेसे भगवान् प्रसन्न होते हैं । १७१॥ मन्त्र, प्रबन्ध, काव्य, स्तुति, कीर्तन ये सब प्राचीन हों या अपना ग्रीष्म नये बनाये गए हों, उनका कीर्तन करना चाहिए। किसी भी प्रकारसे रामका स्मरण करना जरूरी है। क्योंकि रामका ध्यान करनेपर सारी पापराशि उसी तरह क्षणभरमें जल जाती है। जैसे फूसकी कुटीमें आग लगते ही क्षणभरमें उसे जलाकर भस्म कर देता है । १७२-१७४ ॥ दम्भसे, भक्तिसे, निष्काम या सकाम जिस किसी तरह भी रामनामका कीर्तन करनेपर पाप जल जाता है ।१७५॥