श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 786 of 811
Read in contextसर्गः ३] पूर्वकाण्डम् ७२९
नलं ययौ कुशः शीघ्रं नमुचं स ययौ लवः। जाम्बीरमङ्गदश्च तथा च वसुदं नृपम् ॥४१॥ चित्रकेतुर्ययौ शीघ्रं तथा लघुभूतं नृपम्। ययौ स पुष्करः शीघ्रं तक्षकः सुरथं ययौ ॥४२॥ अजमीढं सुबाहुश्च नृपकेतुर्ययौ बलम्। नृपकेतुर्हि तत्सैन्यं चकारामोधरं सुरैः ॥४३॥ वायव्यास्त्रेण चिक्षेप तद्वलं लवणाम्भसि। तदा ते सप्त वीराश्च नलप्रमुखाः पर्वता इव ॥४४॥ युयुधुः रघुपोत्तस्य बालकैः सह संगरे। न विरेजुर्बलैर्हीनाः स्कन्धहीननगोपमाः ॥४५॥ कुशो विव्याध बाणैस्तं नलं संग्राममूर्धनि। तदा नलः प्रमिक्ष्वाणो स्वबाणैस्तं व्यतर्जयत् ॥४६॥ ततः कुशः स्वबाणौघैर्नलमस्याश्वान्ध्वजं धनुः। छत्रं सारथिनं छित्वा तन्वं बाणैस्ताडयत् ॥४७॥ नमुचं चापि विव्याध स्वबाणौघैर्लवस्ततः। नमुचश्च लवं बाणैस्तदा व्याकुलमानयेत् ॥४८॥ नमुचं निजबाणौघैश्चक्रे विरथं लवः। एव जाम्बीर पार्थैरङ्गदः संप्रताडयत् ॥४९॥ प्रताड्य जाम्बीरः परिघेणानदं रुषा। ततो जाम्बीरं बाणैरंगदोऽशातयद्भुवि ॥५०॥ चित्रकेतुः स्वबाणौधैः क्रोशेन वसुदं नृपम्। चिक्षेप स्यन्दनाद्देमाच्चन्द्रनमित्राब्रवत् ॥५१॥ तथा लघुभूतौ बाणैर्हृदि विव्याध पुष्करम्। तदा स पुष्करः कोपाद्वाणैर्लघुभूतं रथे ॥५२॥ निषिक्षिपत्रोपमं कृत्वा वादयामास दुन्दुभिम्। सुरथश्चापि तर्ह्य स तक्षकं शरवृष्टिभिः ॥५३॥ ततस्तक्षः स्वबाणौघैः सुरथं गगनांगणे। यथा भ्रामयामास शुष्कपर्णं यथा महत् ॥५४॥ अजमीढस्तदा सर्वान्पूर्वजान्व्यकुलीकृतान्। वीक्ष्य संग्राममञ्चाद्येनांतर्धानं शरवृष्टिभिः ॥५५॥ सुबाहुस्तं स्वराणीघैश्चकार विरथं तदा। अजमीढस्ततोऽन्ये स रथे स्थित्वा ययौ पुनः ॥५६॥ मुमोच पवनास्त्रं च कुशादीनां वधे रुषा। तं दृष्ट्वा नृपकेतुस्तं वज्रास्त्रं मुमोच सः ॥५७॥ तदा ते कोटिशः सर्पाः पपुस्तं पवनं क्षणात्। स्वपद्मः स नलः सर्पान्दृष्ट्वा शरुद्गलत्तद ॥५८॥
पर सवार होकर रणभूमिमें जा डटे॥४०॥ उस समय नलके सम्मुख कुश, नमुचके सम्मुख लव, जाम्बीरके सामने अङ्गद, वसुदके सम्मुख चित्रकेतु, लघुभूतके सामने पुष्कर, सुरथके सामने तक्षक, अजमीढके सामने सुबाहु और बल नामक राजाके सामने नृपकेतु जा पहुँचे। नृपकेतुने थोड़े ही समयमें समस्त सेनाका नाश कर डाला॥४१-४३॥ उसने अपने वायव्य अस्त्रसे इस मरे हुए सैनिकोको खारे समुद्रमें फेंक दिया। ऐसी अवस्थामें वर्षाकी नाईं बडे बड़े वे नल आदि सातो वीर रामजीके बालकोंके साथ युद्ध करने लगे। यह सब करते हुए भी वे राजे उसी तरह आँधी लग रहे थे, जिस तरह डालो और पत्तोसे विहीन वृक्ष हों॥४४॥४५॥ थोडी देर बाद कुशने अपने बाणोसे नलको घायल कर दिया। तब नल भी दूने वेगसे बाण चलाने लगा; किन्तु मौका पाकर कुशने बाणों द्वारा नलके रथ, घोडे, ध्वजा, धनुष, छत्र और सारथीको नष्ट करके उसके शरीरपर भी प्रहार किया॥४६॥४७॥ उधर लवने अपने बाणसमूहसे नमुचको और नमुचने अपने बाणोंसे लवको व्याकुल कर दिया॥४८॥ अनन्तर लवने अपना बाणवर्षासे नमुचके रथको काट डाला। इसी तरह अङ्गदने जाम्बीरपर प्रहार किया और जाम्बीरने परिघ चलाकर अङ्गदपर प्रहार किया। अन्तमे अङ्गदने अपने बाणोंसे जाम्बीरको धराशायी कर दिया॥४९॥५०॥ इसी प्रकार चित्रकेतुने अपने बाणोंसे वसुदको उनके रथसे उठाकर दूर फेंक दिया। यह एक बड़ी कौतुकमयी घटना थी॥५१॥ उधर लघुभूतने अपने बाणोसे पुष्करपर प्रहार किया और पुष्करने कुपित होकर अपने बाणोंसे लघुभूतको एक तरुवारकी तरह उसके रथमे ही जड़ दिया और अपनी विजयदुन्दुभी बजाई॥५२॥५३॥ इसके अनन्तर तक्षकने अपनी बाणवर्षासे सुरथको रथ समेत तथा दिया, जैस सूखे पत्तोको वायु भगा देता है॥५४॥ उसी समय अजमीढने जब देखा कि उसके वीर गुरु उसके पूर्वजोंका बहुत सता रहे हैं तो वह इन लागोंपर घार बाणवृष्टि करने लगा॥५५॥ इसी बीच सुबाहुने अजमीढ़के रथको काट डाला और वह दूसरे रथपर आरूढ होकर फिर संग्राम-भूमिमें आ डटा॥५६॥ आते ही उसने कुश आदिको मारनेके लिए पवनास्त्रका प्रयोग किया। उसके भयङ्कर पवनास्त्रको देखकर नृपकेतुने वज्रास्त्र चलाया॥५७॥ जिससे क्षणभरमे उन सपोंने उस वायु पी ली। उधर