आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
by बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय
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Read in contextअनेक बाते करने लगे। बातें करते हुए दोनो ही अन्यमनस्क हो उठे। इसी समय खेलते-खेलते सुकुमारी कन्या ने विष की डिबिया उठा ली। उसे किसी ने न देखा। सुकुमारी ने मन में सोचा कि बढ़िया खेलने की चीज है। उसने इस डिबिया को एक बार बाएं हाथ मे लेकर दाहिने हाथ से खीचा। इसके बाद दाहिने हाथ से पकड़कर बाएं हाथ से खीचा। इसके बाद दोनो हाथो से उसे खींचना शुरू किया। फल यह हुआ कि डिबिया खुल गई, उसमे से जहर की टिकिया बाहर गिर पड़ी। बाप के कपड़े के ऊपर वह टिकिया गिरी- सुकुमारी ने उसे देखा, मन मे सोचा, कि यह एक दूसरी खेलने की चीज है डिबिया के दोनो ढक्कन उसने छोड़ दिए और उस टिकिया को उठा लिया। डिबिया को सुकुमारी ने मुंह मे क्यो नही डाला, नही कहा जा सकता। लेकिन टिकिया मे उसने जरा भी विलम्ब न किया? ‘'प्रसिमात्रेण भोक्तव्य'’-- सुकुमारी ने उस जहर की टिकिया को मुंह मे डाल लिया। ‘‘क्या खाया? अरे क्या खाया? गजब हो गया!‘‘..... झद्द्रयह कहती हुई कल्याणी ने कन्या के मुंह मे उंगली डाल दी। उसी समय दोनो ने देखा कि विष की डिबिया खाली पड़ी हुई है। सुकुमारी ने सोचा कि यह भी खेल की चीज है, अतः उसने उसे दांतो से दबा लिया और माता का मुंह देखकर मुस्कराने लगी। लेकिन जान पड़ता है, इसी समय जहर का कड़वा स्वाद उसे मालूम पड़ा और उसने मुंह बिगाड़कर खोल दिया- वह टिकिया दांतो मे चिपकी हुई थी। माता ने तुरंत निकाल कर उसे जमीन पर फेक दिया। लड़की रोने लगी। टिकिया उसी तरह पड़ी रही। कल्याणी तुरंत नदी-तट पर जाकर अपना आंचल भिगो लाई और लड़की के मुंह मे जल देकर उसने धुलवा दिया। बड़ी ही कातर वाणी से कल्याणी ने महेन्द्र से पूछा-‘‘क्या कुछ पेट मे गया होगा?‘‘ बुरी बात ही मां-बाप के मुंह से पहले निकलती है- जहां अधिक प्रेम होता है, वहां भय भी बहुत अधिक होता है। महेन्द्र ने यह कभी देखा न था कि टिकिया पहले कितनी बड़ी थी। अब उन्होने टिकिया अपने हाथ मे उठाकर मजे मे उसे देखकर कहा-‘‘मालूम तो होता है कि कुछ खा गई है।‘‘ कल्याणी को कुछ ऐसा ही विश्वास हुआ। टिकिया हाथ मे लेकर बहुत देर तक वह भी उसकी जांच करती रही। इधर कन्या ने दो-एक घूंट रस जो चूस लिया था, उससे उसकी दशा बिगड़ने लगी- वह छटपटाने लगी, रोने लगी, अंत मे कुछ बेहोश सी हो पड़ी। तब कल्याणी ने पति से कहा-‘‘अब क्या देखते हो? जिस राह पर भगवान ने बुलाया है, उसी राह पर सुकुमारी चली, मुझे भी वही राह लेनी पड़ेगी।‘‘ यह कहकर कल्याणी ने उस टिकिया को उठाकर मुंह मे डाल लिया और एक क्षण मे निगल गई। महेन्द्र रोने लगे-‘'क्या किया, कल्याणी! अरे तुमने यह क्या किया है?‘‘......... कल्याणी ने कोई उत्तर न देकर पति के पैरो की धूलि माथे लगाई, फिर बोली-‘‘प्रभु! बात बढ़ाने से बात बढ़ेगी......मै चली।‘‘ ‘‘कल्याणी! यह क्या किया?‘‘- कहकर महेन्द्र चिल्लाकर रोने लगे। बड़े ही धीमे स्वर मे कल्याणी बोली-‘‘मैने अच्छा ही किया है, इस नाचीज औरत के पीछे तुम अपनी मातृभूमि की सेवा से वंचित रहते। देखो मैं देववाक्य का उल्लंघन कर रही थी, इसलिए मेरी कन्या गई। थोड़ी और अवहेलना करने से तुम पर विपत्ति आती।‘‘ महेन्द्र ने रोते हुए कहा-‘‘अरे, तुम्हे कही बैठाकर मैं चला जाता, कल्याणी!- कार्य सिद्ध हो जाने पर फिर हम लोग मिलकर सुखी होते। कल्याणी! मेरी सर्वस्व! तुमने यह क्या!! जिस भुजा के बल पर मैं तलवार पकड़ता, हाय! तुमने वही भुजा काट दी। तुम्हे खोकर मैं क्या रह पाऊंगा।‘‘.......