भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 78 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

स्थान पर कोई बैठा था, मानो आग मे तपा हुआ नील-कमल धधकता हुआ बैठा हो। उसके माथे पर सूर्य के प्रकाश जैसा मुकुट था; उसके चार हाथ थे। उसके दोनो बाजू कौन था, मै पहचान न सकी, लेकिन कोई स्त्री- मूर्ति थी। लेकिन उनमे इतनी ज्योति, इतना रूप, इतना सौरभ था कि मै उधर देखते ही विह्वल हो गई- उधर ताक न सकी, देख न सकी कि वे कौन है? उन्ही चतुर्भुज के सामने एक स्त्री और खड़ी थी- वह भी ज्योतिर्मयी थी, लेकिन चारो तरफ मेघ जैसा छाया था, आभा पूरी तरह दिखाई नही देती थी। अस्पष्ट रूप मे जान पड़ता था कि वह नारीमूर्ति अति दुर्बल, मर्मपीड़ित, अनन्य-सुंदरी, लेकिन रो रही है। वहां के मंद-सुगंध पवन ने मानो मुझे घुमाते-फिराते वहां चतुर्भुज मूर्ति के सामने ला खड़ा किया। उस मेघमंडिता दुर्बल स्त्री ने मुझे देखकर कहा- यही है, इसी के कारण महेंद्र मेरी गोद मे आता नही है।‘........ इसके बाद ही एक अपूर्व वंशी जैसी मधुर ध्वनि सुनाई पड़ी। वह शब्द उन चतुर्भुज का था, उन्होने मुझे कहा-‘‘तुम अपने पति को छोड़कर मेरे पास चली आओ! यह तुम लोगो की मां है महेंद्र इसकी सेवा करेगा। तुम यदि पति के पास रहोगी तो वह इनकी सेवा न कर सकेगा। तुम चली जाओ।‘ मैंने रोकर कहा-‘‘पति को छोड़कर मैं कैसे चली आऊं?‘‘ इसके बाद ही फिर उसी अपूर्व स्वर में उन्होने कहा-‘‘मै ही स्वामी, मै ही पुत्र, मैं ही माता, मैं ही पिता और मैं ही कन्या हूं, मेरे पास आओ!‘‘ ‘‘मैंने क्या उत्तर दिया, मुझे याद नही, लेकिन इसके बाद ही नीद खुल गई।‘‘ यह कहकर कल्याणी चुप हो रही। महेंद्र विस्मित, स्तम्भित होकर चुप हो रहे। ऊपर पेड़ पर कोई पक्षी बोल उठा, पपीहा अपनी बोली से आकाश गुंजाने लगा, कोकिल सप्त-स्वरो मे गाने लगी, भृंगराज की झनकार से जंगल गूंज उठा। पैरो के नीचे तरिणी मृदु कल्लोल कर रही थी। बहुतेरे वन्य पुष्पो के सौरभ से मन हरा हो रहा था। कही-कही नदी-जल को सूर्य- रश्मि चमका रही थी। कही ताड़ के पत्ते हवा के झोके से मरमरा रहे थे। दूर नीली पर्वत-श्रेणी दिखाई पड़ रही थी। दोनो ही जन मुग्ध-नीरव हो यह सब देखते रहे। बहुत देर बाद कल्याणी ने फिर पूछा-‘‘क्या सोच रहे हो?‘‘ महेंद्र-‘‘यही सोचता हूं कि क्या करना चाहिए? यह स्वप्न केवल विभीषिका मात्र है, अपने ही हृदय मे पैदा होकर अपने ही मे लीन हो जाता है। चलो, घर चले!‘‘ कल्याणी-‘‘जहां ईश्वर तुम्हे जाने को कहते हैं, तुम वही जाओ!‘‘ यह कहकर कल्याणी ने कन्या अपने पति की गोद मे दे दी। महेंद्र ने उसे अपने गोद मे लेकर पूछा-‘‘और तुम......तुम कहां जाओगी?‘‘ कल्याणी अपने दोनो हाथो से दोनो आंखो को ढंके हुए, साथ ही मस्तक पकड़े हुए बोली-‘‘मुझे भी भगवान ने जहां जाने को कहा है वही जाऊंगी।‘‘ महेंद्र चौंक उठे। बोले-‘‘वहां कहां? कैसे जाओगी?‘‘ कल्याणी ने अपने पास की वही जहर की डिबिया दिखाई। महेंद्र ने डरते हुए भौंचक्क होकर कहा-‘‘यह क्या? जहर खाओगी?‘‘ कल्याणी-‘‘मन मे तो सोचा था, खाऊंगी, लेकिन......‘‘ कल्याणी चुप होकर विचार मे पड़ गई, महेंद्र उसका मुं ह ताकते रहे- प्रति निमेष वर्ष-सा प्रतीत होने लगा। उन्होने देखा कि कल्याणी ने बात पूरी न कही, अतः बोले-‘‘लेकिन के बाद आगे क्या कह रही थी?‘‘ कल्याणी-‘‘मन मे था कि खाऊंगी, लेकिन तुम्हे छोड़कर, सुकुमारी कन्या को छोड़कर बैकुंठ जाने की भी मेरी इच्छा नही होती। मैं न मरूंगी!‘‘ यह कहकर कल्याणी ने विष की डिबिया जमीन पर रख दी। इसके बाद दोनो ही पी-पुरुष भूत-भविष्य की