भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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वे लोग मठ मे ही पहुंच जाते थे। उन्हे जंगल से पार होनेवाली राह मिलती ही न थी। यह देखते हुए सामने एक वैष्णव वेशधारी खड़े हंस रहे थे। यह देखकर महेद्र ने रुष्ट होकर उनसे कहा-‘‘गोस्वामी! खड़े-खड़े हंसते क्यो हो?’’ गोस्वामी बोले-‘‘तुमलोग इस वन मे आए कैसे?’’ महेद्र बोले-‘‘जैसे भी हो आ ही गए है!‘‘ गोस्वामी-‘‘प्रवेश कर सके तो बाहर क्यो नही निकल पाते हो?‘‘ यह करकर वैष्णव फिर हंसने लगे। महेद्र ने वैसे ही रुष्ट स्वर में कहा-‘‘हंसते तो हो, लेकिन क्या तुम इसके बाहर निकल सकते हो?‘‘ वैष्णव ने कहा-‘‘मेरे साथ आओ, मै राह बता देता हूं। अवश्य ही तुम लोग ब्रह्मचारीजी के संग आए होगे, अन्यथा न तो कोई यहां आ सकता है, न निकल ही सकता है। अपरिचितो के लिए यह भूल-भुलैया है।‘‘ यह सुनकर महेद्र ने कहा-‘‘आप भी सन्तान है?‘‘ वैष्णव ने कहा-‘‘हां, मैं भी सन्तान हूं। मेरे साथ आओ। तुम्हे राह दिखाने के लिए ही मैं यहां खड़ा हूं।‘‘ महेद्र ने पूछा -‘‘आपका नाम क्या है?‘‘ वैष्णव ने उत्तर दिया-‘‘मेरा नाम धीरानंद स्वामी है।‘‘ यह कहकर धीरानंद आगे-आगे चले और कल्याणी के साथ महेद्र पीछे-पीछे। धीरानंद ने एक बड़ी सी दुर्गम राह से उन्हे जंगल के बाहर कर दिया और आगे की राह बता दी। इसके बाद वे फिर जंगल मे पलटकर गायब हो गए। आनंद-वन से बाहर निकल आने पर कुछ दूर तक राह चलने मे तो जंगल उनके एक बाजू रहा। जंगल की बगल से ही शायद वह राह गई है। एक जगह जंगल मे से ही एक छोटी नदी कलकल कर बहती है। जल बहुत ही साफ है, लेकिन देखने पर जंगल की छाया से जल भी काला दिखाई देता है। नदी के दोनो बाजू सघन बड़े-बड़े वृक्ष मनोरम छाया किए हुए है, विभिन्न पक्षी उन पेड़ो पर बैठे कलरव कर रहे है। उनका कलरव- कूजन, नदी की कलकल-ध्वनि से मिलकर अपूर्व श्रुतिमधुर जान पड़ता है। वैसे ही वृक्ष के रंग से नदी-जल का रंग भी वैसा ही झलक रहा है। कल्याणी का मन भी शायद उस रंग मे मिल गया। कल्याणी नदी तट के एक वृक्ष से लगकर बैठ गई। उन्होने अपने पति को भी बैठने को कहा। कल्याणी अपने पति के हाथो को अपने हाथो मे लिए बैठी रही। फिर बोली-‘‘तुम्हे आज बहुत उदास देखती हूं। विपद जो आयी थी, उससे तो उद्धार मिल गया है, अब इतना दुःख क्यो?‘‘ महेद्र ने एक ठंढी सांस लेकर कहा-‘‘मै अब अपने आपे मे नही हूं। मैं क्या करूं- कुछ समझ मे नही आता।‘‘..... कल्याणी-‘‘क्यो?‘‘ महेद्र-‘‘तुम्हारे खो जाने पर मेरा क्या हाल हुआ, सुनो!‘‘...... यह कहकर महेद्र ने अपनी सारी कहानी सविस्तार वर्णन कर दी। कल्याणी ने कहा-‘‘मुझे भी बड़ी विपदो का सामना करना पड़ा, बहुत तकलीफ उठाई। तुम उन्हे सुनकर क्या करोगे! इतने दुःखो पर भी मुझे कैसे नीद आई थी, कह नही सकती- कल आखिर रात भी मैं सोई थी। नीद मे मैंने स्वप्न देखा। देखा- नही कह सकती, किस पुण्यबल से मैं एक अपूर्व स्थान मे पहुंच गई हूं। वहां मिट्टी नही है, केवल प्रकाश- अति शीतल- बादल हट जाने पर जैसा प्रकाश रहता है, वैसा ही प्रकाश! वहां मनुष्य नही थे, केवल प्रकाशमय मूर्तियां थी, वहां शब्द नही होता था, केवल दूर अपूर्व संगीत जैसी ध्वनि सुनाई पड़ती थी। सदाबहार मल्लिका-मालती-गंधराज की अपूर्व सुगंध फैली थी। वहां सबसे ऊंचे दर्शनीय