आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर कहां स्थान मिलेगा।' ब्रह्मचारी-''जिस राह से यहां आये हो, उसी राह से मंदिर से बाहर जाओ! मंदिर के दरवाजे पर तुम्हे स्त्री- कन्या दिखाई देगी। कल्याणी अभी तक निराहार है। जहां वे दोनों बैठी है वही भोजन की सामग्री पाओगे। उसे भोजन कराके तुम्हारी जो इच्छा हो करना। अब हम लोगो में से किसी से कुछ देर मुलाकात न होगी। यदि तुम्हारा मन इधर होगा तो समय पर मै तुमसे मिलूंगा।'' इसके बाद ही किसी तरह से एकाएक ब्रह्मचारी अंतर्हित हो गए। महेंद्र ने पूर्व-परिचित राह से लौटकर देखा- नाट्य मंदिर मे कल्याणी कन्या को लिए हुए बैठी है। इधर सत्यानंद एक दूसरी सुरंग मे जाकर एक अकेली भूगर्भस्थित कोठरी मे उतर पड़े। वहां जीवानन्द और भुवानंद बैठे हुए रुपये गिन-गिनकर रख रहे थे। उस कमरे मे ढेरो सोना, चांदी, तांबा, हीरे, मोती, मूंगे रखे हुए थे। गत रात खजाने की लूट का माल ये लोग गिन-गिनकर रख रहे थे। सत्यानंद ने कमरे मे प्रवेश कर कहा-''जीवानंद! महेंद्र हमारे साथ आएगा। उसके आने से संतानो का विशेष कल्याण होगा। कारण आने से उसके पूर्वजो का संचित धन मां की सेवा मे अर्पित होगा। लेकिन जब तक वह तन-मन-वचन से मातृभक्त न हो, तब तक उसे ग्रहण न करना। तुम लोगो के हाथ का काम समाप्त होने पर तुम लोग भिन्न-भिन्न समय मे उसका अनुसरण करना, उचित समय पर उसे श्रीविष्णुमंडप मे उपस्थित करना, और समय हो या कुसमय हो, उन लोगो की रक्षा अवश्य करना। कारण, जैसे दुष्टो का दमन और दलन संतानो का धर्म है, वैसे ही शिष्टो की रक्षा करना भी संतानो का धर्म है!'' अनेक दुःखों के बाद महेंद्र और कल्याणी मे मुलाकात हुई। कल्याणी रोकर पछाड़ खा गिरी। महेंद्र और भी रोए। रोने-गाने के बाद आंखो के पोछने की धूम मच गई। जितने बार आंखे पोंछी जाती थी, उतनीही बार आंसू आ जाते थे। आंसू बंद करने के लिए कल्याणी ने भोजन की बात उठाई। ब्रह्मचारीजी के अनुचर जो खाना रख गए थे, कल्याणी ने उसे खाने के लिए महेंद्र से कहा। दुर्भिक्ष के दिनो मे इधर अन्न भोजन की कोई संभावना नही थी, फिर भी आसपास जो कुछ है, संतानो के लिए वह सुलभ है। वह जंगल साधारण मनुष्यो के लिए अगम्य है जहां जिस वृक्ष मे जो फल होते है, उन्हे भूखे लोग तोड़कर खाते है, किंतु इस अगम्य वन के वृक्षो का फल कोई नही पाता इसलिए ब्रह्मचारी के अनुचर ढेरो फल और दूध लाकर रख जाने में समर्थ हुए। संन्यासीजी की सम्पत्ति मे अनेक गौएं भी है। कल्याणी के अनुरोध पर महेंद्र ने पहले कुछ भोजन किया, इसके बाद बचा हुआ भोजन अकेले मे बैठकर कल्याणी ने खाया। उन लोगों ने थोड़ा दूध कन्या को पिलाया, बाकी बचा हुआ रख लिया- फिर पिलाने की आशा ही तो माता-पिता का संतान के प्रति धर्म है। इसके बाद थकावट और भोजन के कारण दोनों ने निंद्राभिभूत होकर आराम किया। नीद से उठने के बाद दोनो विचार करने लगे-''अब कहां चलना चाहिए?'' कल्याणी ने कहा-''घर पर विपद की संभावना समझकर हमने गृहत्याग किया था, लेकिन अब देखती हूं कि घर से भी अधिक कष्ट बाहर है। न हो तो चलो, घर ही लौट चले!'' महेंद्र की भी यही इच्छा थी। महेंद्र की इच्छा है कि कल्याणी को घर पर बैठाकर, कोई एक विश्वासी अभिभावक नियुक्त कर, इस परमरमणीय, अपार्थिव पवित्र मातृसेवा-व्रत को ग्रहण करेगे। अतः इस बात पर वे सहज ही सहमत हो गए। अब दोनो ही प्राणियो ने थकावट दूर होने पर कन्या को गोद मे लेकर फिर पदचिन्ह की तरफ यात्रा की। किंतु पदचिन्ह जाने के लिए किस राह से जाना होगा- उस दुर्भेद्य वन मे वे कुछ भी समझ न सके। उन्होने समझा था कि जंगल पार होते ही हमे राह मिल जाएगी और पदचिन्ह पहुंच सकेगे। लेकिन वहां तो बन का ही थाह नही लगता है। बहुत देर तक वे लोग वन के अंदर इधर-उधर चक्कर लगाते रहे और बार-बार घूम-फिरकर