अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Page 134 of 144
Read in context134
साहिब बन्दगी
चलि भइ मोहि पवारन जबहीं । अन्तरधान भयो मैं तबहीं ॥ भयउ गुप्त तेहि करसे भाई । रुदन करें दोनों बिलखाई ॥ बिकल होय बन डोलैं । मुग्ध ज्ञान कछू मुख नहीं बोलैं ॥
तब मैं उसके हाथ से लुप्त हो गया। यह देख दोनों रोने लगे, बन-बन मुझे ढूँढने लगे, पर मैं न मिला। फिर अगले जन्म में वे ही नीरू-नीमा हुए। तब मैं काशी के लहरतारा तालाब में नीमा को मिला। नीरू के डर से वहाँ भी नीमा मुझे छोड़ने जा रही थी तो मैंने कहा-
प्रीत पिछली कारणे, तोहि मिला हूँ आप।
मुक्ति संदेश सुनाऊँगा, ले चल अपने साथ ॥
वे नीरू नीमा सुपच के माता-पिता थे, जो तीसरे जन्म में नीरू-नीमा हुए। पर बालक जान तब भी उन्हें विश्वास न हुआ। फिर चौथे जन्म में मथुरा में जाकर साहिब ने उन्हें समझाया और उन्होंने नाम ले लिया और पार हुए।
ताहि देह पुनि मोहि न चीन्हा । जानि पुत्र मोहि संग न कीन्हा । तजि सो देह बहु रि जो भाई । देह धरी सो देहूँ चिन्हाई ॥
जुलहा की तब अवधि सिरानी । मथुरा देह धरी तिन आनि ॥
हम तहाँ जाय दरश तिन दीन्हा । शब्द हमार मान सों लीन्हा ॥
रतना भक्ति करे चितलाई । नारि पुरुष परवाना पाई ॥
ता कहँ दीन्हे उ लोक निवासा । अंकूरी पठये निज दासा ॥
पुरुष चरण भेटे उर लाई । शोभा देह हँस कर पाई ॥
देखत हँस पुरुष हरषाने । सुकृत अंश कही मन माने ॥
बहुत दिवस लगि लोक रहाये । तब लगि काल जीव संताये ॥
तो मैं उन्हें अमर लोक ले गया। कुछ समय वे वहाँ रहे, फिर परम पुरुष ने नीरू को जीवों को चिताने संसार में भेजा। पर काल ने उसे अपने जाल में फँसा लिया।