अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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जीवन दुख अतिशय भयो भाई। तबहीं पुरुष सुकृत हंकराई॥ आज्ञा कान्ह जाहु संसारा। काल अपर बल जीव दुखारा॥ लोक संदेशा ताहि सुनाओ। देइ नाम जीवन मुकताओ॥ आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये। तुरतहिं लोक पयाना लाये॥ सुकृत देख काल हरषाई। इन कहँ तो हम लेब फँसाई॥ करि उपाय बहुत तब काला। सुकृत फँसाय जाल महँ डाला॥ बहुत दिवस गयो जब बीता। एकहु जीव न कालहिं जीता॥ जीव पुकार सतलोक सुनाये। तबहीं पुरुष मोकहँ हंकराये॥
तब परम पुरुष ने मुझसे कहा कि उसे चेताओ, इसलिए परम पुरुष की आज्ञा से मैं आया हूँ।
पुरुष अवाज् उठी तिहि बारा। ज्ञानी बेग जाहु संसारा॥ जीवन काज अंश पठवायी। सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥ दीन्ह आज्ञा तेहि को भाई। शब्द भेद वाही समझायी॥ लावहु जीवन नाम अधारा। जीवन खेइ उतारो पारा॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना। बहुरि न आये देश अमाना॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ। काल जाल ते सुधि बिसरयऊ॥ तिन कहँ जाय चितावहु ज्ञानी। जेहिते पंथ चले निरवानी॥ बंस ब्यालिस अंस हमारा। सुकृत गूह लैहँ औतारा॥ ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा। अब सुकृत अंश कर मेटहु फंसा॥
तो कहा कि तब हम परम पुरुष की आज्ञा से तुम्हारे पास आए। तुम नीरू के अवतार हो।
चलेउ हम तब सीस नवाई। धर्मदास हम तुम लग आई॥ धर्मदास तुम नीरू औतारा। आमिन नीमा प्रगट विचारा॥ तुम तो आहु प्रिय मम अंशा। जा कारण हम कीन्ह बहु संसा॥ पुरुषहिं आज्ञा तुम्हरे ढिग आये। पिछली हेत पुनि याद कराये॥