अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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साहिब बन्दगी
यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥ पुरुष अवाज कहूँ तुम पासा । चीन्हहु शब्द गहो विश्वासा ॥
साहिब ने कहा—हे धर्मदास ! तुम मेरे अंश हो, परम पुरुष ने तुम्हें जीवों को चिताने संसार में भेजा था, पर तुम काल के फँदे में फँस गये और भूल गये। इस कारण हमने तुम्हें दर्शन दिया है, अब विश्वास करो और शब्द की डोर पकड़ो।
धाय परे चरनन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥ धरहिं न धीर बहुर संतोखा । तुम साहिब मेटहु जिव धोखा ॥ धरै न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछरि जननि जिमि मिल्यो अबोधे ॥ युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीर न उठत उठाये ॥ बिलखत बदन वचन नहिं बोले । सुरति चरण ते नेक न डोले ॥
धर्मदास जी की आँखों में प्रेम के आँसू बह चले, वे तो ऐसे हो गये मानो किसी अबोध बालक को बिछुड़ी हुई माँ मिल गयी हो, कुछ बोल न पाए और साहिब के चरणों में लेट गये, उठाये न उठते थे।
बहुरि चरन गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहि तारन तन धारी ॥ धरि धीरज तब बोल सम्हारी । मोकहँ प्रभु तारन पगधारी ॥ अब प्रभु दया करहु यहि मोहि । एकौ पल न बिसरें तोही ॥ निशिदिन रहौं चरन तुम साथ । यह बर दीजे करहु सनाथा ॥
फिर धैर्य धारण कर कहने लगे कि हे साहिब ! मुझपर कृपा करना, मुझे एक पल भी बिसरना नहीं। फिर कहा—
धन सतगुरु धन तुम्हरी बानी । मुहिं अपनाय दीन्ह गति आनी ॥ मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥ काल जाल जौनी विधि छूटे । यम बन्धन जौनी विधि टूटे ॥ सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥
कहा कि मेरा बड़ा भाग्य है कि आपने दर्शन दिये, अब मुझे सार शब्द बताकर काल से छुड़ा लो। तब साहिब ने उसे नाम देकर समझाया—