भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अनुरागसागर वाणी

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धर्मदास तुम सुकृत अंशा। लेइ पान अब मेटहु संशा॥

धर्मदास आपन करि लेऊँ। चौका करि परवाना देऊँ॥

तिनका तुड़ाय लेहु परवाना। काल दशा छूटे अभिमाना॥

शालिग्राम को छाड़हु आसा। गहि सत शब्द होहु तुम दासा॥

दश औतार ईश्वरी माया। यह सब देख काल की छाया॥

तुम जग जीव चितावन आये। काल फन्द तुम आई फँसाये॥

अबहूँ चेत करो धर्मदासा। पुरुषहिँ शब्द करो परकासा॥

ले परवाना जीव चिताओ। काल जाल ते हँस मुक्ताओ॥

कहा-दस अवतार भी माया का खेल था, इसलिए शालिग्राम की आशा छोड़ दो और नाम को पकड़ो, दूसरे जीवों को भी चिताओ।

साहिब ने नाम का परवाना देकर धर्मदास को समझाया-

कहँ कबीर सुनो धर्मदासा। सत्य भेद मैं कियो परकासा॥

अब सुनु रहन की बाता। बिन जाने नर भटका खाता॥

पहिले कुल मरजादा खोवे। भय ते रहित भक्ति तब होवे॥

सेवा करो छाड़ि मत दूजा। गुरु की सेवा गुरु की पूजा॥

गुरु से करे कपट चतुराई। सो हँसा भव भरमें आई॥

ताते गुरु से परदा नाहीं। परदा करे रहे भवमाहीं॥

गुरु के वचन सदा चित दीजे। माया मोह सु कोर न भीजे॥

यहि रहनी भव बहुरि न आवे। गुरु के चरण कमल चित लावे॥

कहा-गुरु की भक्ति करो, उनसे छल-कपट मत करो, स्पष्ट बात करो, कुछ छिपाओ नहीं, उनके वचनों को हृदय में धारण करो, उनके चरणों में चित्त लगाए रहो। जब तक जीवन है, तब तक गुरु की आज्ञा को देखते चलो।

जब लग तन में हँस रहाई। निरखे शब्द चले पथ भाई॥

गुरु मुख जीव कतहु न बाचै। अगिण कुण्ड महँ जबरि नाचै॥