भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ

अनुरागसागर वाणी

1

श्री सद्गुरु वे नमः

अनुरागसागर वाणी

चलो चलो सब कोठ कहै, मोहि अंदेशा और। साहिब से परिचय नहीं, जायेंगे किस ठौर ॥

-स्वामी मधु परमहंस जी

साहिब बन्दगी

सन्त आश्रम रंजड़ी, पोस्ट राया, ज़िला जम्मू

2

साहिब बन्दगी

अनुरागसागर वाणी

—स्वामी मधु परमहंस जी

प्रचार अधिकारी

—राम रतन जम्मू

© SANT ASHRAM RANJARI (JAMMU) ALL RIGHTS RESERVED

प्रथम संस्करण – नवम्बर 2006 प्रतियाँ – 5000

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www.sahib-bandgi.org

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*Santashram@sahib-bandgi.org

*Sadgurusahib@sahib-bandgi.org

प्रकाशक

साहिब बन्दगी सन्त आश्रम रॉजड़ी

पोस्ट राया, तहसील साम्बा

ज़िला—जम्मू

Ph. (01923) 242695, 242602


मुद्रक : सरताज प्रिंटिंग प्रेस, जालन्धर शहर।

अनुरागसागर वाणी

3

अनुरागसागर वाणी

विषय सूचीपृष्ठ संख्या
सतगुरु वंदना7
शब्द के प्रेमी8
अंत समय का मीत11
मृतक होय सो साधु12
गुरु कृपा से साधु कहावै18
सृष्टि उत्पत्ति से पहले का रहस्य21
सोलह सुत की उत्पत्ति25
काल निरंजन कीनहीं तपस्या27
निरंजन का पुनः तप32
त्रिदेव की उत्पत्ति41
निरंजन मन बनकर गुप्त हुआ43
त्रिदेवों ने किया समुद्र मंथन44
ब्रह्मा को दिया वेद ने रहस्य48
ब्रह्मा गये आकाश में52
नहीं पहुँच पाए विष्णु53
ब्रह्मा को लेकर आद्य शक्ति व्याकुल हुई55
ब्रह्मा को लाने चली गायत्री57
शाप से ग्रसित हुए सब65
विष्णु को हुए पिता के दर्शन69
धर्मदास का संशय70
विष्णु बने ठाकुर72
चौरासी लाख योनियाँ बनीं74
चार खानि के तत्व भेद75
ज्ञान विभिन्नता का कारण77
विभिन्न योनियों से मानव तन में आए हुएओं की पहचान78

4

साहिब बन्दगी

चौरासी की धारा क्यों बनी?82
रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को खा जाता है निरंजन84
जीवों को कष्ट दिये निरंजन ने86
अमर लोक से साहिब चले87
निरंजन ने की साहिब से बहस88
क्रोधित निरंजन साहिब पर झपटा और97
असली रूप में आए साहिब
निरंजन अधीन हुआ98
साहिब आए संसार में101
गुप्त वस्तु है नाम103
गुरु भक्ति का महत्व104
सतयुग में आए साहिब106
राम नाम का रहस्य109
सतयुग के हंस110
त्रेतायुग में साहिब का आगमन112
द्वापार में आए साहिब117
साहिब और धर्मदास131

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अनुरागसागर वाणी

5

दो शब्द

भाईयो ! यह संसार काल पुरुष का देश है, मन का देश है । साहिब से पहले जितने भी पीर, पैगम्बर, ऋषि, मुनि आदि आए, सबने भूलवश काल को ही परमात्मा मान उसकी भक्ति की, इसलिए मन की दुनिया में ही रह गये । आज के महात्माओं को भी परम पुरुष की भक्ति का रहस्य मालूम नहीं है, इसलिए वे अपने साथ-2 अपने शिष्यों की नैया भी डुबा रहे हैं । वाणी तो सभी कबीर साहिब की ले रहे हैं, पर कुल मिलाकर भक्ति काल पुरुष की ही कर रहे हैं । कुछ ऐसे ही सत्य लोक की बात कर रहे हैं, पर वास्तव में ना तो उनके पास सच्चा नाम ही है और ना वो वहाँ पहुँचे हुए हैं । वे भी मन के ही दास हैं, इसलिए आ-जाकर सगुण-निर्गुण में ही अटक रहे हैं । यह मन बड़ा ही जालिम है, जिसने बड़े-बड़े महात्माओं को भी अपने जाल में फँसा रखा है । वास्तव में यह उनके माध्यम से जीवों को भ्रमित कर रहा है । इसलिए सब नकली नाम का व्यापार कर रहे हैं ।

संतो यह मन है बड़ा जालिम ॥

मन कारण की इनकी छाया, तेहि छाया में अटके । निरगुण सरगुण मन की बाजी, खरे सयाने भटके ॥ मनहीं चौदह लोक बनाया, पाँच तत्व गुण कीन्है । तीन लोक जीवन वश कीन्है, परे न काहू चीन्है ॥ जो कोठ कहै हम मन को मारा, जाकै रूप न रेखा । छिन छिन में कितने रँग बदले, जे सपनेहुँ न देखा ॥ रासातल यकईश ब्रह्मण्डा, सब पर अदल चलावै । षट रस में भोगी मन राजा, सो कैसे के पावै ॥ सबके ऊपर नाम निरक्षर तहाँ लै मन को राखै । तब मन की गति जानि परै, यह सत्य कबीर मुख भाखै ॥

संसार से अलग ?

हमारा पंथ भक्ति जगत में वैज्ञानिक तरीके से क्रांति लाया है। सबसे पहले पाँच बातें पूरे संसार को अलग बता रहें हैं। * ये काल का देश है। यहाँ निरंजन का राज्य है * योगेश्वर इस स्थान तक बहुत मुश्किल से जाते हैं। ये चौदहवा लोक है। * इसी को वेदों ने निराकार, निरंकार, निरंजन, पार ब्रह्मा आदि नामों से पुकारा है। गण, गंधर्व, सिद्ध, साधक, ऋषि मुनि, पीर पैगम्बर आदि यहाँ तक गये।

  • इसके आगे महा शून्य है, यहाँ कोई वस्तु नहीं है। इसके नाम अचिन्त लोक, सोहंग लोक, मूल सुरति लोक, अंकुर लोक, इच्छा लोक, वाणी लोक और सहज लोक हैं यह समस्त लोक महा शून्य में हैं। सहज अंश तक जो भी सृष्टि है इसका परम नाश है।

सहज पुरुष तक जेतक भाखा, यह रचना परलै ते राखा ॥ आगे अछय लोक है भाई, आदि पुरुष यहाँ आप रहाई ॥

  • इसके ऊपर अमरधाम परम पुरुष का लोक है। यहाँ कभी भी परलय नहीं है।

जहवां से हंसा आया, अमर है वो लोकवा ॥ तहाँ नहीं परले की छाया, नहीं तहाँ कछु मोह और माया ॥ ज्ञान ध्यान को तहाँ न लेखा, पाप पुण्य तहंवा नहीं देखा ॥ पवन न पानी पुरुष न नारी, हद अनहद तहं नाहिं विचारी ॥

यहीं से साहिब आत्माओं के कल्याण के लिए आते हैं।

सतगुरु वंदना

सतगुरु-वंदना

प्रथम बंदों सतगुरु चरण, जिन अगम गम्य लखाइया । ज्ञान दीप प्रकाश करि, पट खोल दरश दिखाइया ॥ जिहि कारणे सिध्या पचे, सो गुरु कृपा ते पाइया । अकह मूरति अमिय सूरति, ताहि जाय समाइया ॥

पहले उन गुरु के चरण-कमलों की वंदना करो, जिन्होंने उस साहिब के दुर्गम घर में सहजता से पहुँचाकर उसका दर्शन करवा दिया। उन्होंने ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश करके अज्ञान के पर्दे हटा दिये और उस साहिब का दर्शन करवा दिया। जिस साहिब को खोजते-2 बड़े-2 सिद्ध मर गये, उन साहिब को गुरु की कृपा से पा उस अमृत में समा गया।

सद्गुरु दीन दयाल जी, तुम लग मेरी दौड़। जैसे काग जहाज़ पर, सूझत कतहुँ न ठौर॥

7

शब्द के प्रेमी

शब्द के प्रेमी

कोई बूझाई जन जौहरी, जो शब्द की पारख करै । चितलाय सुनहिं सिखावनो, हितलाय के हिरदय धरै ॥ तम मोह मो सम ज्ञान रवि, जब प्रगट हो तब सूझई । कहत हौं मैं शब्द साँचा, संत कोई बूझई ॥

कोई जौहरी ही सत्य शब्द रूपी सोने की पारख कर सकता है । साहिब कह रहे हैं कि जो समझा रहा हूँ, ध्यान से समझो और हितकारी जानकर हृदय में बिठा लो । मेरे समान ज्ञान का सूर्य जब प्रगट होता है, तभी अज्ञान का अंधेरा समझ पड़ता है । सत्य शब्द कहता हूँ, जिसे कोई संत ही समझ सकता है ।

कोई इक संत सुजान, जो मम सब्द बिचारई ।

पावै पद निर्वाण, बसत अनुराग जासु उर ॥

जिसके हृदय में प्रेम होगा, वो ही निर्वाण पद को प्राप्त करेगा, जो मेरे इन शब्दों पर विचार करे, ऐसा कोई समझदार संत ही होगा ।

धर्मदास पूछते हैं

हे सतगुरु बिनवौं कर जोरी । संशय प्रभु इक मेटो मोरी ॥

जाके चित अनुराग समाना । ताको कहो कवन सहिदाना ॥

अनुरागी कैसे लखि परई । बिन अनुराग जीव नहिं तरई ॥

सो अनुराग प्रभु मोहि बताओ । देइ दृष्ट्यांत भले समझाओ ॥

धर्मदास जी हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कह रहे हैं कि कृपा करके मेरा एक संशय मिटा दो; यदि प्रेम के बिना जीव नहीं तर सकता तो मुझे यह बता दो कि जो सच्चा प्रेमी होता है, उसकी पहचान क्या है !

साहिब कहते हैं

धर्मदास परखहु चित लाई । अनुरागी लछन सुखदाई ॥

जैसे मृगा नाद सुनि धावै । मगन होय व्याध ठिग आवै ॥

8

अनुरागसागर वाणी

9

चित कछु संक न आवै ताही । देत शीश सो नाहिं डराही ॥

सुनि-सुनि नाद शीश तिन दीन्हा । ऐसे अनुरागी को चीहना ॥

साहिब कह रहे हैं कि प्रेमी के लक्षण बड़े ही सुख देने वाले हैं, ध्यान लगाकर समझो। कह रहे हैं कि सच्चे प्रेमी मृगा जैसे होते हैं। बाँसुरी की धुन से प्रेम करने वाला मृगा बाँसुरी की आवाज सुनकर दौड़ता हुआ शिकारी के पास आ जाता है और मग्न होकर बाँसुरी सुनने लगता है। तब उसके हृदय में कोई भय नहीं होता कि शिकारी उसे मार देगा। बाँसुरी की धुन सुनते-सुनते वो अपना शीश भी दे देता है, अपने प्राण गँवा बैठता है। सच्चे प्रेमी ऐसे ही होते हैं।

जरत नारि ज्यों मृत पति संग। तन कौ जरत न मोरत अंगा ॥

तजे सुगृह धन धाम सुहेली । पिय विरहिन उठ चलै अकेली ॥

सुत लै लोगन आगे कीन्हा । बहुत मोह ताहि पुनि दीन्हा ॥

बालक दुर्बल तोहि बिनु मरिहैं । धर भौ सून काहि बिधि करिहैं ॥

बहु संपति तुमरे घर अहाँ । पलट चलहु गृह सब अस कहई ॥

ताके चित कछु व्यापे नाहीं । प्रिय अनुराग बसै हिय माहीं ॥

सच्चे प्रेमियों के लक्षण बताते हुए साहिब कह रहे हैं कि वे तो सती की तरह होते हैं, जो पति के साथ ही जल मरती है। उसके शरीर में आग लगती है, पर वो वहाँ से हिलती नहीं है। वो घर, धन-धाम, सहेलियों आदि सबका मोह छोड़कर प्रियतम के संग अकेली चल पड़ती है। लोग उसमें उसके बेटे का मोह भी डालते हैं, कहते हैं कि वो अकेला मर जायेगा। फिर कहते हैं कि अपना घर सूना करके क्यों जा रही हो। फिर धन का मोह भी डालते हैं कि तेरे पास बहुत सारा धन भी है, उसका सुख भोगना..... चल वापिस घर में; पर वो स्त्री पति के प्रेम को हृदय में ऐसे बसाए हुए होती है कि उसे किसी की बात अच्छी नहीं लगती।

तेहि बहुत समुझावते, नहिं नारि समझत सो धनी ।

नहिं काम है धन धाम से, कछु मोहि तो ऐसी बनी ॥

जग जीवना दिन चारि है, कोई नहिं साथी अंत को ।

यह समुझि देखो सखी, ताते गहो पद कंत को ॥

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साहिब बन्दगी

लोग उसे बहुत समझाते हैं, पर वो प्रेम की धनी किसी तरह से समझती नहीं है। वो कहती है कि पति के विरह में मेरी ऐसी हालत बन गयी है कि धन-धाम से अब कुछ भी मतलब नहीं रहा; मेरा जीवन तो कुछ दिन का ही है और फिर अंत समय का यहाँ कोई साथी भी नहीं है। ऐसा समझकर सती पति के चरण ही पकड़े रहती है, उसी के विरह में प्राण त्याग देती है।

सुन धर्मन अनुराग की बानी। तुम तत देखि कहे हित जानी ॥ ऐसे जो नामहिं लौं लावै। कुल परिवार सबहिं बिसरावै ॥ नारी सुत का मोह न आने। जीवन जनम सपन करि जाने ॥ जग में जीवन थोर है भाई। अंत समय कोई नाहिं सहाई ॥ बहुत पियारि नारि जग माहीं। मात पिता जाहि सम नाहीं ॥ निज स्वार्थ वह रोदन करहीं। तुरंतहि नैहर को चित्त धरही ॥ सुत परिजन धन सपन सनेही। सत्यनाम गहु निज मति एही ॥ निज तनु सम प्रिय और न आना। सो तनु संग न चलहि निदाना ॥

साहिब कह रहे हैं- हे धर्मदास! तुम्हारे हित के लिए मैंने सच्चे प्रेम के लक्षण तुमसे कहे, अब तुम इसमें से प्रेम का सार तत्व देख लो और जाति परिवार को भूलकर ऐसे नाम में लौं लगाए रखो। याद रहे, तुम्हारे दिल में पुत्र और स्त्री का मोह न आने पाए, तुम सांसारिक जीवन और जन्म को स्वप्न समान समझो, तुम भली भाँति यह जान लो कि जीवन बहुत थोड़ा है और अंत में कोई सहायक नहीं होगा। जिस नारी को तुमने बहुत प्यार किया, जिसके समान माता- पिता को भी नहीं गिना, जिसके कारण प्राण भी दे दिये, वो नारी अंत समय में सहायक नहीं होती, यदि रोती भी है तो केवल अपने ही स्वार्थ के कारण और तुरन्त ही उसे मायके की याद आ जाती है। साहिब धर्मदास से कह रहे हैं कि पुत्र, परिवार के लोगों का प्यार और धन आदि को स्वप्न के समान समझो और सत्य नाम को पकड़े रहो....यही मेरी सीख है। क्योंकि जिस नारी के समान और किसी को प्रिय नहीं समझा, वो भी अंत समय साथ नहीं चलती।

अंत समय का मीत

अंत समय का मीत

ऐसा कोई न दीखे भाई । अंतहु यम सो लेहि छुड़ाई ॥ अहै एक सो कहैं बखानी । जेहि अनुराग होय सो मानी ॥ सतगुरु आहि छुड़ावनहारा । निश्चय मानहु कहा हमारा ॥ कालहिं जीत हंस लै जाहीं । अविचल देस पुरुष जहँ आहीं ॥ जहाँ जाय सुख होय अपारा । बहुरि न आवै यहि संसारा ॥

इस संसार में ऐसा कोई नहीं दिखता, जो अंत समय में जीव को काल से बचा ले। एक है, और उसका मैं बखान करता हूँ, यदि उससे प्रीत लगा लो तो वो बचा सकता है। साहिब कह रहे हैं कि मेरा विश्वास करना, सदगुरु ही अंत समय में जीव का सच्चा मीत बनकर उसे काल से छुड़ा लेता है। वो काल को जीतकर हंस(आत्मा) को अपने साथ उस अचल देश में ले जाता है, जहाँ कभी न मिटने वाला परम-पुरुष रहता है; जहाँ जाकर हंस सच्चे असीम आनन्द को प्राप्त करता है और जहाँ से फिर इस संसार में वापिस नहीं आना होता।

Three stylized lotus flower symbols arranged horizontally, serving as a decorative separator.

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मृतक होय सो साधु

मृतक होय सो साधु

विश्वास कर मम बचन को, चढ़ सत की राह हो। ज्यों सूरमा रन में धसे, फिर पाछे चितवत नाहिं हो ॥ सती शूरा भाव निरखि के, सत्य को मग धारिये। मृतक दसा विचार गुरुगम, काल कष्ट निवारिये ॥

साहिब कह रहे हैं कि मेरी बात पर विश्वास करो और सत्य की राह पर ऐसे ही पाँव रखो जैसे कोई शूरमा युद्ध क्षेत्र में एक बार घुस जाता है तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखता। सती और शूरमा की भाँति सत्य की राह पर दृढ़ होकर गुरु प्रेम से जीवित मरने की स्थिति प्राप्त करो, जिससे काल के कष्टों से छूट जाओगे।

कोई सूरा जीव, जो ऐसी करनी करै ॥ ताहि मिलैगो पीव कहहिं कबीर बिचार कै ॥

साहिब कह रहे हैं कि ऐसी दृढ़ता से गुरु प्रेम के मार्ग पर चलने वाला, मरने की परवाह न करने वाला कोई शूरमा ही हो सकता है और निश्चय ही उसे साहिब रूपी प्रियतम की प्राप्ति होगी।

धर्मदास पूछते हैं

मृतक भाव प्रभु कहो समुझाई। जाते मन की तपन बुझाई ॥ केहि विधि मिरतक होय सजीवन। कहो विलोय नाथ अमृत धन ॥

धर्मदास जी ने पूछा कि मरने का भाव क्या है, कृपया मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरे मन की जिज्ञासा दूर हो। किस प्रकार यह जीव जीते जी मरकर उस अमृत को पा सकता है!

साहिब कहते हैं

धर्मदास यह कठिन कहानी। गुरु नाम ते कोई बिरले जानी ॥

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अनुरागसागर वाणी

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मृतक होय के खोजहु संता। शब्द बिचार गहैं मग अंता॥ जैसे भुंग कीट के पास। कीटहि गहि सुरु गमि परकासा॥ पंखधात कर महिं तिहि डारे। भुंगी शब्द कीट जो धारे॥ तब लैगो भुंगी निज गेहा। स्वाँस देइ कीन्हे निज देहा॥ भुंगी शब्द कीट जो माना। वरण फेर आपन कर जाना॥ बिरला कीट होय सुखदाई। प्रथम अवाजु गहै चित लाई॥ कोई दूजे कोई तीजे मानै। तनमन रहित शब्द हित मानै॥ भुंगी शब्द कीट ना गहई। तो पुनि कीट असारे रहई॥ धर्मदास यह कीट को भेवा। यहि मति शिष्य गहे गुरुदेवा॥

साहिब कह रहे हैं-हे धर्मदास! यह बड़ी ही कठिन कहानी है, गुरु कृपा से, गुरुप्रेम से किन्हीं विरले जनों ने इस रहस्य को जाना है; बिचारकर उन्होंने शब्द के सहारे भीतरी मार्ग को पकड़ा है और जीते -जी मृतक समान होकर उस सत्य की खोज की है। जैसे भुंगा कीड़े को पकड़कर अपना शब्द सुनाता है और यदि वो कीड़ा उसका शब्द सुन लेता है तो वो भी उसी की तरह हो जाता है, उसमें पंख भी आ जाते हैं। कीड़े में उड़ने की क्षमता नहीं है, पर फिर उसमें बहुत तेज उसी की तरह उड़ने की क्षमता आ जाती है। इस तरह भुंगा उसे अपने समान कर लेता है। जो भी कीड़ा भुंगे के शब्द को मान लेता है, सुन लेता है, वो अपना रंग खोकर उसी के रंग में रंग जाता है, उसी की तरह हो जाता है। वो कोई बिरला ही सुखदायी कीड़ा होता है, जो पहली आवाजु में ही उस शब्द को पकड़ लेता है। कुछ कठोर दूसरी या तीसरी बार में मानते हैं, उसका शब्द सुनते हैं। पर जो कीड़ा उसका शब्द नहीं सुनता, वो वैसे ही रह जाता है, उसके समान नहीं हो पाता। साहिब धर्मदास को समझाते हुए कहते हैं कि ऐसे ही गुरु भी शिष्य को अपना शब्द सुनाकर अपने समान कर लेते हैं, पर शर्त यह है कि शिष्य उनके शब्द में रम जाए।

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साहिब बन्दगी

भूंग मत दूढ़ कै गहे तो, करौ निज सम तोहिं हो । दुतिया भाव न चित व्यापे, सो लहै जिव मोहिं हो ॥ गुरु शब्द निश्चय सत्य माने, भूंग गति तब पावई । तजि सकल आसा शब्द वासा, कागा हंस कहावई ॥

साहिब कह रहे हैं कि यदि भूंगे वाली बात को विचार कर मेरे शब्द को दूढ़ता से पकड़े रहो तो तुम्हें अपने समान कर दूँ। जो जीव मेरे शब्द के अलावा किसी दूसरे भाव को चित में नहीं लाता, वो मुझे पा जाता है। जब जीव गुरु के शब्द पर विश्वास करके उसे सत्य मानता है, तभी भूंगे वाली बात हो पाती है। जो अन्य सबकी आशा छोड़कर केवल शब्द में रमे रहता है, वो कोवे से हंस हो जाता है।

धर्मन सुन तुम मृतक सुभावा । मृतक होय सतगुरु पद पावा ॥ मृतक छोह निभाव उर धारे । छोह निभावहि जीव उबारे ॥

साहिब कह रहे हैं कि जीवित मृतक समान होने वाला कोई बिरला जीव होता है; वो गुरुपद को प्राप्त करता है। जो हृदय में प्रेम बसाए रखता है और उसे अच्छी तरह निभाता है, वो ही संसार सागर से खुद तरकर दूसरों को भी तारता है।

जस पृथ्वी कै गंजन होई । चित अनुराग गहो गुण सोई ॥ कोई चंदन कोई विष्ठा डारे । कोई कोड़ि कृशी अनुसारै ॥ गुण अवगुण तिन्ह सम कर जाना । महा विरोध अधिक सुख माना ॥

जैसे पृथ्वी की दुर्दशा होती है, उसका तिरस्कार होता है और वो सब कुछ समान भाव से सहती है, ऐसे ही तुम भी सहो। कोई उस पर चन्दन फेंकता है तो कोई विष्ठा और कोई-कोई कौड़ी फेंकता है, पर पृथ्वी तो सबके गुण-अवगुणों को समान भाव से ग्रहण करती है, मान-अपमान को सम-भाव से ग्रहण करती है और किसी का विरोध नहीं करती हुई सुख से रहती है।

अनुरागसागर वाणी

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और मृतक भाव सुनि लेहू । निरखि परखि गुरु मग पग देहू ॥

जैसे उख किसान बनावै । रती रती कै देह कटावै ॥

कोल्हू महँ पुनि आप पिरावे । रस निसरै पुनि ताहि तपावै ॥

निज तन दाहे गुड़ पुनि होई । बहु रि ताव दै खाँड बिलोई ॥

ताहु माहिं ताव पुनि दीन्हा । चीनी तबहि कहावै लीन्हा ॥

चीनी होय बहुरि तन जारा । ताते मिसरी हूँ अनुसारा ॥

मिसरी ते जब कंद कहावा । कहै कबीर सबके मन भावा ॥

याही बिधि ते जो शिष सहई । गुरु कृपा सहजे भव तरई ॥

साहिब कह रहे हैं कि मृतक का और स्वभाव बताता हूँ । जैसे किसान खेत में गन्ना बोता है तो पहले वो गन्ना एक-एक करके काटता है; फिर कोल्हू में पेश जाता है और रस निकाला जाता है; फिर रस को कड़ाही में पकाया जाता है और तब जाकर वो गुड़ बनता है; फिर आँच पर लाल खाँड बनती है और फिर आँच पर जाकर सफेद चीनी बनती है । पुनः उस चीनी से मिसरी तैयार होती है और फिर कुज्जे वाली मिसरी के रूप में तैयार होकर सबके मन को भाती है । ऐसे ही जो शिष्य सब कुछ सहता हुआ गुरु मार्ग में दृढ़ रहता है, वो गुरु-कृपा से सहज ही भवसागर से पार हो जाता है ।

मृतक होय सो साधु, सो सतगुरु को पावई ।

मेटे सकल उपाध, तासु देव आसा करें ॥

सच्चा साधु वही है जो जीवित मृतक हो जाए और वो ही सदगुरु को पा सकता है । उसकी सब चिंता दूर हो जाती है और वो उस चौथे पद मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, जिसकी आशा देवता लोग भी करते हैं ।

साधु मार्ग कठिन धर्मदासा । रहनी रहे सो साधु सुवासा ॥

पाँचों इन्द्री सम करि राखे । नाम अमीरस निशि दिन चाखे ॥

साहिब कह रहे हैं—हे धर्मदास ! साधु मार्ग बड़ा ही कठिन है । जो गुरु आज्ञा में रहे, वो ही पहुँचा हुआ साधु है; जो पाँचों इन्द्रियों को एक

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साहिब बन्दगी

साथ काबू में रखे और प्रतिदिन नाम रूपी अमृत का पान करे, वो साधु है।

प्रथमहिं चक्षु इन्द्री कहँ साधे। गुरु गम पंथ नाम अवराधे ॥

सुंदर रूप चक्षु की पूजा। रूप कुरूप न भावे दूजा ॥

रूप कुरूपहिं सम कर जाने। दरस विदेहि सदा सुख माने ॥

सबसे पहले वो नयन इन्द्री को वश में करे और गुरु-प्रेम के मार्ग पर चलते हुए नाम में लगा रहे। नयन सुन्दर रूप की पूजा करते हैं और कुरूपता को नहीं देखना चाहते, पर साधु को रूप-कुरूप दोनों के प्रति समान भाव रखते हुए आत्मा की ओर देखकर सदा सुख मानना चाहिए।

इन्द्री श्रवण वचन शुभ चाहै। उक्तव वचन सुनत चित दहै ॥

बोल कुबोल दोउ सम लेखे। हृदय शुद्ध गुरुज्ञान विशेषै ॥

कान इन्द्री अच्छे-अच्छे वचन ही सुनना चाहती है, उग्र, बुरे शब्द सुनते ही हृदय जलने लगता है, पर साधु को अच्छे-बुरे वचनों को समान समझना चाहिए।

नासिका इन्द्री सुबास अधीना। यहि सम राखै संत प्रवीना ॥

नासिका इन्द्री अच्छी सुगन्ध के अधीन रहती है, पर चतुर साधु को इस दृष्टि से भी समभाव से रहना चाहिए, उसे सुगन्ध की तरफ आकर्षित नहीं होना चाहिए।

जिभ्या इन्द्री चाहै स्वादू। खट्टा मीठा मधुर स्वादू ॥

सहज भाव में जो कछु आवै। रूखा फीका नहिं बिलगावै ॥

जो कोई पंचामृत ले आवै। ताहि देख नहिं हरष बढ़ावै ॥

तजे न रूखा साग अलूना। अधिक प्रेम सों पावै दूना ॥

जीभ इन्द्री विभिन्न प्रकार के खट्ट-मीठे स्वाद चाहती है, पर साधु को सहज में जैसा भी मिल जाए, चाहे वो रूखा-सूखा ही क्यों न हो, कुछ अन्तर नहीं पड़ना चाहिए यानी उसे जीभ इन्द्री के स्वाद के पीछे नहीं भागना चाहिए। यदि कोई पंचामृत ले आए तो ज्यादा खुश नहीं

अनुरागसागर वाणी

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होना चाहिए और यदि नमक रहित रूखा साग भी मिल जाए तो उसे त्यागना नहीं चाहिए बल्कि ज्यादा खुशी के साथ खाना चाहिए।

इन्द्री दुष्ट महा अपराधी। कुटिल काम कोई विरले साधी।।

कामिनि रूप काल की खानी। तजहु तासु संग हो गुरुज्ञानी।।

काम इन्द्री तो बड़ी ही दुष्ट और अपराधी है, जिसे कोई बिरला ही साध सका है, इसलिए जो स्त्री के सुंदर रूप को काल की खानि समझ उसका संग त्याग दे, वो ज्ञानी है, वो साधु है।

जबहि काम उमंग तन आवै। ताहि समय जो आप जुगावे।।

शब्द विदेह सुरत लै राखे। गहि मन मौन नाम रस चाखे।।

जब हिय तत्त्व में जाय समाई। तबही काम रहै मुरझाई।।

साधु का परिचय देते हुए साहिब कह रहे हैं कि उसे चाहिए, जब काम वेग के साथ शरीर में आए तो युक्तिपूर्वक अपने को बचाकर रखे, उसे रोके रखे। ऐसे में सार शब्द में अपनी सुरति लगाए रखे, मौन रहते हुए मन को पकड़े रहे और नाम रूपी रस का पान करता रहे क्योंकि जब सुरति नाम में जाकर समा जाती है, तब काम उदास होकर शांत हो जाता है।

काम परबल अति भयंकर, महा दारुण काल हो।

सुर नर मुनि यक्ष गन्धर्व किन्नर, सबहिं कीन्ह बेहाल हो।।

सबहि लूटे बिरले छूटे, ज्ञान गुरु जिन्ह दूढ़ गहे।

गुरु ज्ञान दीप समीप सतगुरु, भक्ति मार्ग तिन्ह लहे।।

साहिब कह रहे हैं कि यह काम बड़ा ही प्रबल है, यही काल रूप है, जिसने देवता, मनुष्य, मुनि, यक्ष, किन्नर (नपुंसक) सबको बेहाल किया हुआ है। काम ने सबको लूट लिया है। इससे कोई बिरला ही छूट सकता है, जो गुरु के ज्ञान को दूढ़ता से पकड़े रहे, हर समय चेतन रहे। जहाँ गुरु-ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश है, वहीं सदगुरु का वास है। ऐसा जीव ही भक्ति मार्ग को पा सकता है, उस पर चल सकता है।

गुरु कृपा से साधु कहावै

गुरु कृपा ते साधु कहावै

गुरु किरपा ते साधु कहावै। अनल पच्छ है लोक सिधावै॥ धर्मदास यह परखो बानी। अनलपच्छ गति कहों बखानी॥ अनलपच्छ जो रहे अकाशा। निशि रहै पवन की आशा॥ दृष्टिभाव तिन रति विधि ठानी। यहि विधि गर्भ रहै तेहि जानी॥ अंड प्रकाश कीन्ह पुनि तहँवा। निराधार अण्ड रहु जहँवों॥ मारग माहिं पुष्ट भो अण्डा। मारग माहिं बिहरभा खण्डा॥ मारग माहिं चक्षु तिन पावा। मारग माहिं पंख परभावा॥ महि ढिंग आवा सुधि भइ ताही। इहाँ मोर आश्रम नहिं आही॥ सुरति सम्हार चले पुनि तहँवा। मात पिता को आश्रम जहँवा॥ अनल पच्छ तेहि लेन न आवै। उलट चीन्ह निज धरहि सिधावै॥ बहु पंछी जग माहिं रहावै। अनल पच्छ सम नाहिं कहावै॥ अनल पच्छ जस पच्छन माहीं। अस बिरले जिव नाम समाहीं॥ यह विधि जो जिव चेते भाई। मेटि काल सतलोक सिधाई॥

गुरु-कृपा से ही जीव साधु समान होता है और अनल पक्षी के समान होकर अमर लोक को जाता है। साहिब धर्मदास से कह रहे हैं कि अब मैं अनल पक्षी की दशा का बखान करता हूँ, तुम मेरी इस वाणी को परख लो।

अनल पक्षी पृथ्वी से बहुत ऊपर शून्य में रहता है, जमीन पर आते ही मर जायेगा। वो सोता भी हवा में ही है, उसका कोई घोंसला नहीं होता। फिर हवा में ही रहता है और खाता भी हवा ही है.... दाना नहीं चुगता है अनल पक्षी। वो विषय भी नहीं करता है, मात्र दृष्टि से अपनी मादा को गर्भवती कर देता है। फिर हवा में ही वो अण्डा देती है और

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अनुरागसागर वाणी

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अण्डा नीचे गिरना शुरू होता है। इतनी ऊँचाई से जब वो नीचे की ओर आता है तो आते-आते रास्ते में ही वो अण्डा पकता है। मुर्गी तो बैठकर पकाती है, पर वो अण्डा खुद ही पक जाता है और फिर रास्ते में ही फूट भी जाता है। रास्ते में ही उसे आँखें भी आ जाती हैं। पृथ्वी पर गिरे तो मर जाता, पर पृथ्वी पर गिरने से पहले ही उसे सुधि आ जाती है कि यहाँ उसका घर नहीं है। अब सुरति संभाल कर वो खुद ही अपने घर की ओर चल पड़ता है; उसके माता-पिता उसे लेने नहीं आते हैं। इस संसार में बहुत से पक्षी हैं, पर अनल पक्षी समान निर्मल कोई नहीं। जैसे अनल पक्षी खुद अपने माता-पिता के देश में चलता है, ऐसे ही बिरले जीव नाम में समाए रहते हैं और जो ऐसा करते हैं, वे काल को मारकर सतलोक चले जाते हैं।

मन बच कर्म गुरु ध्यान, गुरु आज्ञा निरखत चलै ॥

देहि मुक्ति गुरु दान, नाम विदेह लखाय कै ॥

जो मन, बचन और कर्म से गुरु का ही ध्यान करता रहे और जीवन-भर उनकी आज्ञा में चले। विदेह नाम का ज्ञान देकर सदगुरु उसे मुक्ति का दान देते हैं।

जब लग ध्यान विदेह न आवै। तब लग जिव भव भटका खावै ॥

ध्यान विदेह औ नाम विदेहा। दोइ लख पावे मिटै संदेहा ॥

छन इक ध्यान विदेह समाई। ताकी महिमा बरनि न जाई ॥

काया नाम सबै गोहरावे। नाम विदेह बिरले कोई पावे ॥

जो युग चार रहे कोई कासी। सार शब्द बिन यमपुर बासी ॥

नीमखार बढ़ी परधाना। गया द्वारिका प्राग अस्नाना ॥

अड़सठ तीरथ भू परिकरमा। सार शब्द बिन मिटे न भरमा ॥

कहँ लग कहों नाम परभाऊ। जो सुमिरे जम त्रास नसाऊ ॥

जब तक ध्यान विदेह स्थिति को प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक जीव

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साहिब बन्दगी

भटकता ही रहता है, जब विदेह ध्यान और विदेह नाम दोनों का भेद पता चल जाए, तब ही सब संदेह दूर होते हैं। यदि ध्यान एक पल के लिए भी विदेह नाम में समा जाए तो फिर उसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। काया से संबंधित नाम यानी मुहँ से जपने वाला नाम तो सभी जपते हैं, पर विदेह नाम कोई बिरले ही पाते हैं। चाहे कोई तीर्थोंदि जगहों पर जाकर कितना ही स्नान करे, चाहे अड़सठ तीर्थ भी घूम आए, पूरी पृथ्वी की परिक्रमा भी कर ले, तो भी सार शब्द के बिना भ्रम नहीं मिट सकता। साहिब कह रहे हैं कि नाम के प्रभाव को कहाँ तक कहूँ, जो इसका सुमिरन करता है, उसे मृत्यु का भय भी नहीं रहता।

सार शब्द सु विदेह स्वरूपा। निःअच्छर वहि रूप अनुपा ॥

तत्त्व प्रकृति प्रभाव सब देहा। सार शब्द निःतत्त्व विदेहा ॥

सार नाम सतगुरु सों पावे। तब हँसा अमर लोक सिधावे ॥

धर्मराय ताको सिर नावे। जो हँसा निःतत्त्व समावे ॥

सार शब्द विदेह स्वरूप है, वो अक्षर से परे हैं, सबसे निराला है। पाँच तत्त्वों की देही है, पर सार शब्द तत्त्व रहित है, विदेह है। जब सदगुरु से सार नाम मिल जाता है तो जो जीव उस नाम की डोरी को पकड़ कर संसार-सागर से पार अपने देश अमर-लोक चला जाता है, उस अमर तत्त्व में समा जाता है; उसे धर्मराज भी प्रणाम करता है।