भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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गुरु कृपा ते साधु कहावै

गुरु किरपा ते साधु कहावै। अनल पच्छ है लोक सिधावै॥ धर्मदास यह परखो बानी। अनलपच्छ गति कहों बखानी॥ अनलपच्छ जो रहे अकाशा। निशि रहै पवन की आशा॥ दृष्टिभाव तिन रति विधि ठानी। यहि विधि गर्भ रहै तेहि जानी॥ अंड प्रकाश कीन्ह पुनि तहँवा। निराधार अण्ड रहु जहँवों॥ मारग माहिं पुष्ट भो अण्डा। मारग माहिं बिहरभा खण्डा॥ मारग माहिं चक्षु तिन पावा। मारग माहिं पंख परभावा॥ महि ढिंग आवा सुधि भइ ताही। इहाँ मोर आश्रम नहिं आही॥ सुरति सम्हार चले पुनि तहँवा। मात पिता को आश्रम जहँवा॥ अनल पच्छ तेहि लेन न आवै। उलट चीन्ह निज धरहि सिधावै॥ बहु पंछी जग माहिं रहावै। अनल पच्छ सम नाहिं कहावै॥ अनल पच्छ जस पच्छन माहीं। अस बिरले जिव नाम समाहीं॥ यह विधि जो जिव चेते भाई। मेटि काल सतलोक सिधाई॥

गुरु-कृपा से ही जीव साधु समान होता है और अनल पक्षी के समान होकर अमर लोक को जाता है। साहिब धर्मदास से कह रहे हैं कि अब मैं अनल पक्षी की दशा का बखान करता हूँ, तुम मेरी इस वाणी को परख लो।

अनल पक्षी पृथ्वी से बहुत ऊपर शून्य में रहता है, जमीन पर आते ही मर जायेगा। वो सोता भी हवा में ही है, उसका कोई घोंसला नहीं होता। फिर हवा में ही रहता है और खाता भी हवा ही है.... दाना नहीं चुगता है अनल पक्षी। वो विषय भी नहीं करता है, मात्र दृष्टि से अपनी मादा को गर्भवती कर देता है। फिर हवा में ही वो अण्डा देती है और

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