अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
लोग उसे बहुत समझाते हैं, पर वो प्रेम की धनी किसी तरह से समझती नहीं है। वो कहती है कि पति के विरह में मेरी ऐसी हालत बन गयी है कि धन-धाम से अब कुछ भी मतलब नहीं रहा; मेरा जीवन तो कुछ दिन का ही है और फिर अंत समय का यहाँ कोई साथी भी नहीं है। ऐसा समझकर सती पति के चरण ही पकड़े रहती है, उसी के विरह में प्राण त्याग देती है।
सुन धर्मन अनुराग की बानी। तुम तत देखि कहे हित जानी ॥ ऐसे जो नामहिं लौं लावै। कुल परिवार सबहिं बिसरावै ॥ नारी सुत का मोह न आने। जीवन जनम सपन करि जाने ॥ जग में जीवन थोर है भाई। अंत समय कोई नाहिं सहाई ॥ बहुत पियारि नारि जग माहीं। मात पिता जाहि सम नाहीं ॥ निज स्वार्थ वह रोदन करहीं। तुरंतहि नैहर को चित्त धरही ॥ सुत परिजन धन सपन सनेही। सत्यनाम गहु निज मति एही ॥ निज तनु सम प्रिय और न आना। सो तनु संग न चलहि निदाना ॥
साहिब कह रहे हैं- हे धर्मदास! तुम्हारे हित के लिए मैंने सच्चे प्रेम के लक्षण तुमसे कहे, अब तुम इसमें से प्रेम का सार तत्व देख लो और जाति परिवार को भूलकर ऐसे नाम में लौं लगाए रखो। याद रहे, तुम्हारे दिल में पुत्र और स्त्री का मोह न आने पाए, तुम सांसारिक जीवन और जन्म को स्वप्न समान समझो, तुम भली भाँति यह जान लो कि जीवन बहुत थोड़ा है और अंत में कोई सहायक नहीं होगा। जिस नारी को तुमने बहुत प्यार किया, जिसके समान माता- पिता को भी नहीं गिना, जिसके कारण प्राण भी दे दिये, वो नारी अंत समय में सहायक नहीं होती, यदि रोती भी है तो केवल अपने ही स्वार्थ के कारण और तुरन्त ही उसे मायके की याद आ जाती है। साहिब धर्मदास से कह रहे हैं कि पुत्र, परिवार के लोगों का प्यार और धन आदि को स्वप्न के समान समझो और सत्य नाम को पकड़े रहो....यही मेरी सीख है। क्योंकि जिस नारी के समान और किसी को प्रिय नहीं समझा, वो भी अंत समय साथ नहीं चलती।