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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अनुरागसागर वाणी

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चित कछु संक न आवै ताही । देत शीश सो नाहिं डराही ॥

सुनि-सुनि नाद शीश तिन दीन्हा । ऐसे अनुरागी को चीहना ॥

साहिब कह रहे हैं कि प्रेमी के लक्षण बड़े ही सुख देने वाले हैं, ध्यान लगाकर समझो। कह रहे हैं कि सच्चे प्रेमी मृगा जैसे होते हैं। बाँसुरी की धुन से प्रेम करने वाला मृगा बाँसुरी की आवाज सुनकर दौड़ता हुआ शिकारी के पास आ जाता है और मग्न होकर बाँसुरी सुनने लगता है। तब उसके हृदय में कोई भय नहीं होता कि शिकारी उसे मार देगा। बाँसुरी की धुन सुनते-सुनते वो अपना शीश भी दे देता है, अपने प्राण गँवा बैठता है। सच्चे प्रेमी ऐसे ही होते हैं।

जरत नारि ज्यों मृत पति संग। तन कौ जरत न मोरत अंगा ॥

तजे सुगृह धन धाम सुहेली । पिय विरहिन उठ चलै अकेली ॥

सुत लै लोगन आगे कीन्हा । बहुत मोह ताहि पुनि दीन्हा ॥

बालक दुर्बल तोहि बिनु मरिहैं । धर भौ सून काहि बिधि करिहैं ॥

बहु संपति तुमरे घर अहाँ । पलट चलहु गृह सब अस कहई ॥

ताके चित कछु व्यापे नाहीं । प्रिय अनुराग बसै हिय माहीं ॥

सच्चे प्रेमियों के लक्षण बताते हुए साहिब कह रहे हैं कि वे तो सती की तरह होते हैं, जो पति के साथ ही जल मरती है। उसके शरीर में आग लगती है, पर वो वहाँ से हिलती नहीं है। वो घर, धन-धाम, सहेलियों आदि सबका मोह छोड़कर प्रियतम के संग अकेली चल पड़ती है। लोग उसमें उसके बेटे का मोह भी डालते हैं, कहते हैं कि वो अकेला मर जायेगा। फिर कहते हैं कि अपना घर सूना करके क्यों जा रही हो। फिर धन का मोह भी डालते हैं कि तेरे पास बहुत सारा धन भी है, उसका सुख भोगना..... चल वापिस घर में; पर वो स्त्री पति के प्रेम को हृदय में ऐसे बसाए हुए होती है कि उसे किसी की बात अच्छी नहीं लगती।

तेहि बहुत समुझावते, नहिं नारि समझत सो धनी ।

नहिं काम है धन धाम से, कछु मोहि तो ऐसी बनी ॥

जग जीवना दिन चारि है, कोई नहिं साथी अंत को ।

यह समुझि देखो सखी, ताते गहो पद कंत को ॥