भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

भटकता ही रहता है, जब विदेह ध्यान और विदेह नाम दोनों का भेद पता चल जाए, तब ही सब संदेह दूर होते हैं। यदि ध्यान एक पल के लिए भी विदेह नाम में समा जाए तो फिर उसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। काया से संबंधित नाम यानी मुहँ से जपने वाला नाम तो सभी जपते हैं, पर विदेह नाम कोई बिरले ही पाते हैं। चाहे कोई तीर्थोंदि जगहों पर जाकर कितना ही स्नान करे, चाहे अड़सठ तीर्थ भी घूम आए, पूरी पृथ्वी की परिक्रमा भी कर ले, तो भी सार शब्द के बिना भ्रम नहीं मिट सकता। साहिब कह रहे हैं कि नाम के प्रभाव को कहाँ तक कहूँ, जो इसका सुमिरन करता है, उसे मृत्यु का भय भी नहीं रहता।

सार शब्द सु विदेह स्वरूपा। निःअच्छर वहि रूप अनुपा ॥

तत्त्व प्रकृति प्रभाव सब देहा। सार शब्द निःतत्त्व विदेहा ॥

सार नाम सतगुरु सों पावे। तब हँसा अमर लोक सिधावे ॥

धर्मराय ताको सिर नावे। जो हँसा निःतत्त्व समावे ॥

सार शब्द विदेह स्वरूप है, वो अक्षर से परे हैं, सबसे निराला है। पाँच तत्त्वों की देही है, पर सार शब्द तत्त्व रहित है, विदेह है। जब सदगुरु से सार नाम मिल जाता है तो जो जीव उस नाम की डोरी को पकड़ कर संसार-सागर से पार अपने देश अमर-लोक चला जाता है, उस अमर तत्त्व में समा जाता है; उसे धर्मराज भी प्रणाम करता है।