अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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दो शब्द
भाईयो ! यह संसार काल पुरुष का देश है, मन का देश है । साहिब से पहले जितने भी पीर, पैगम्बर, ऋषि, मुनि आदि आए, सबने भूलवश काल को ही परमात्मा मान उसकी भक्ति की, इसलिए मन की दुनिया में ही रह गये । आज के महात्माओं को भी परम पुरुष की भक्ति का रहस्य मालूम नहीं है, इसलिए वे अपने साथ-2 अपने शिष्यों की नैया भी डुबा रहे हैं । वाणी तो सभी कबीर साहिब की ले रहे हैं, पर कुल मिलाकर भक्ति काल पुरुष की ही कर रहे हैं । कुछ ऐसे ही सत्य लोक की बात कर रहे हैं, पर वास्तव में ना तो उनके पास सच्चा नाम ही है और ना वो वहाँ पहुँचे हुए हैं । वे भी मन के ही दास हैं, इसलिए आ-जाकर सगुण-निर्गुण में ही अटक रहे हैं । यह मन बड़ा ही जालिम है, जिसने बड़े-बड़े महात्माओं को भी अपने जाल में फँसा रखा है । वास्तव में यह उनके माध्यम से जीवों को भ्रमित कर रहा है । इसलिए सब नकली नाम का व्यापार कर रहे हैं ।
संतो यह मन है बड़ा जालिम ॥
मन कारण की इनकी छाया, तेहि छाया में अटके । निरगुण सरगुण मन की बाजी, खरे सयाने भटके ॥ मनहीं चौदह लोक बनाया, पाँच तत्व गुण कीन्है । तीन लोक जीवन वश कीन्है, परे न काहू चीन्है ॥ जो कोठ कहै हम मन को मारा, जाकै रूप न रेखा । छिन छिन में कितने रँग बदले, जे सपनेहुँ न देखा ॥ रासातल यकईश ब्रह्मण्डा, सब पर अदल चलावै । षट रस में भोगी मन राजा, सो कैसे के पावै ॥ सबके ऊपर नाम निरक्षर तहाँ लै मन को राखै । तब मन की गति जानि परै, यह सत्य कबीर मुख भाखै ॥