अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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साहिब बन्दगी
गुरु दयाल तो पुरुष दयाला। जेहि गुरु व्रत छूए नहिं काला॥ कोटिक योग अराधे प्राणी। सतगुरु बिन जीव की हानी॥ सतगुरु अगम गम्य बतलावे। जाकी गम्य वेद न पावे॥ कोटि माहिं कोइ संत विवेकी। जो मम बानी गहे परे खी॥
साहिब ने धर्मदास को गुरु पूजा का महात्म बताया, कहा—जब तक शरीर में आत्मा रहे, गुरु के वचन को देखते चलो। गुरु के प्रसन्न होने से ही सतपुरुष प्रसन्न होते हैं। चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न कर ले, बिना गुरु के हानि ही होगी। करोड़ों में कोई एक विवेकी संत ही मेरी बानी को समझता है। पर गुरु वो, जिसके पास गुप्त नाम(शब्द) हो। फिर साहिब ने उसे नाम का महात्म बताते हुए कहा—
कल यहि नाम प्रताप धर्मन, हँस छूटे काल सो। सत्त नाम मन बिच दूढ़ गहे, सो निस्तेरे यम जाल सो॥ यम तासु निकट न आवई, जेहि वंश की परतीत हो। कलिका के सिर पाँव दै, चले भवजल जीति हो॥
साहिब ने उसे यह भी समझाया कि गुरु गद्दी शब्द पुत्र को ही देनी है, बीज पुत्र को नहीं देनी है। यानी शरीर से उत्पन्न बेटे को नहीं देनी है, शब्द द्वारा बनाए गये बेटे को देनी है।
कहँ निर्गुण कहँ सगुण भाई। नाद बिना नहिं पंथ चलाई॥ धर्मनि नाद पुत्र तुम मोरी। ताते दीन्ह मुक्ति का डोरा॥
कहा—सगुण-निर्गुण सब भक्तियों में भी शब्द पुत्र से ही पंथ चलता है। तुम मेरे शब्द पुत्र हो, इसलिए तुम्हें जीवों की मुक्ति के लिए नाम की डोरी सौंपी है।
धर्मदास ने पूछा
अब प्रभु दया करो तुम ज्ञानी। वचन वंश प्रगटे जग आनी॥ आगे जेहिते पन्थ चलाई। तेहिते करैं विनती प्रभुराई॥
धर्मदास ने पूछा कि अब मेरा वंश कैसे चलेगा!