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अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

by लौगाक्षि भास्कर

DevanagariHindipublished84 pages

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दीपिकाटीकासहितः । ६५ अब निषेध वाक्योंका प्रयोजन बतलानेके लिए पहले निषेध वाक्यका लक्षण करते हैं-पुरुषोंके निवर्त्तक वाक्यको निषेध वाक्य कहते हैं अनर्थ ( नरकादि ) का कारण जो कलञ्ज-भक्षणादि क्रिया है उस कलञ्ज-भक्षणादि क्रियाकी निवृत्ति करने- वाला ‘न कलञ्जं भक्षयेत्’ यह वाक्य है यही ( अर्थात् कलञ्ज-भक्षणादिसे पुरुषोंको निवृत्त करना ) प्रयोजन ‘न कलञ्जं भक्षयेत्’ इस निषेध वाक्यका है । दृष्टान्त द्वारा उसीकी सिद्धि करते हैं जैसे ‘स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादि विधि वाक्य प्रवर्त्तना ( विधि ) को बतलाता हुआ अपनेमें प्रवर्त्तकत्व ( प्रवृत्तिजनकत्व ) का निर्वाहके लिए विधेयार्थ यागमें इष्ट ( स्वर्गादि ) साधनत्वका निश्चय करता हुआ पुरुषोंको यागमें प्रवृत्ति कराता है । उसी तरह ‘न कलञ्जं भक्षयेत्’ इत्यादि निषेध वाक्य भी निवर्त्तना ( निषेध ) को बतलाता हुआ अपनेमें निवर्त्तकत्व ( निवृत्तिजनकत्व ) का निर्वाहके लिये निषेध्य कलञ्ज-भक्षणमें ( परानिष्ट ) नरकादिसाधनत्वका निश्चय करता हुआ कलञ्जादि-भक्षणसे निवृत्ति कराता है । विषाक्त बाणसे मारे गये पशुओंके मांसको कलञ्ज कहते हैं । लिङर्थशब्दभावनाया नञर्थेनान्वयः । ननु निषेधवाक्यस्य कथं निवर्तनाप्रतिपादकत्वमिति चेदुच्यते । न तावदत्र धात्वर्थस्य नञर्थेनान्वयः, अव्यवधानेऽपि तस्य प्रत्ययार्थभावनो- पसर्जनत्वेनोपस्थितेः । न ह्यन्योपसर्जनत्वेनोपस्थितमन्यत्रान्वेति । अन्यथा राजपुरुषमानयेत्यादावपि राज्ञः क्रियान्वयापत्तेः । अतः प्रत्ययार्थस्यैव नञर्थेनान्वयः । तत्रापि नाख्यातत्वांशवाच्यार्थभावनायाः । तस्या लिङंश- वाच्यप्रवर्तनोपसर्जनत्वेनोपस्थितेः, किन्तु लिङंशवाच्यशब्दभावनायाः, तस्याः सर्वापेक्षया प्रधानत्वात् । यहां पर यह प्रश्न उठता है कि ‘निषेध वाक्योंका अर्थ निवर्तना ( निवृत्ति ) नहीं हो सकता है क्योंकि नञर्थ-अभावका अन्वय धात्वर्थके साथ होगा । तब जैसे ‘यजेत’ यहांपर यागकर्तव्यता वाक्यार्थ होता है उसी तरह ‘न कलञ्जं भक्षयेत्’ इत्यादि स्थलमें भी कलञ्जकर्मक भक्षणाभावकर्तव्यता ही वाक्यार्थ होगा । इसका समाधान करते हैं कि धात्वर्थका नञर्थ-अभावके साथ अन्वय नहीं कर सकते हैं क्योंकि अव्यवधानसे धात्वर्थकी उपस्थिति होनेपर भी धात्वर्थकी प्रत्ययार्थ भावनामें ( उपसर्जनत्वेन ) विशेषण रूपसे उपस्थिति होती है । एकमें जो विशेषण रहता है वह फिर दूसरे पदार्थोंमें विशेषण नहीं होता यह नियम है, ऐसा नियम