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अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

by लौगाक्षि भास्कर

DevanagariHindipublished84 pages

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६६ अर्थसंग्रहः— नहीं माननेसे 'राजपुरुषमानय' यहांपर आनयन क्रियामें राजाका अन्वय होने लगेगा । इसलिए प्रत्ययार्थका ही नञर्थ अभावमें अन्वय होगा । प्रत्ययार्थमें भी आख्याताार्थ आर्थी भावनाका अन्वय नहीं होगा क्योंकि आर्थीभावना लिङ् अर्थ ( वाच्य ) शाब्दीभावनामं विशेषण है अतः सर्वापेक्षया प्रधान जो लिङर्थ शाब्दी भावना है उसीका नञर्थके साथ अन्वय होगा । नञ्स्वभावकथनम् । नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसमभिव्याहृतपदार्थविरोधिवोधकत्वम् । यथा 'घटो नास्ती'त्यादौ अस्तीतिशब्दसमभिव्याहृतो नञ् घटसत्त्वविरोधि घटासत्त्वं गमयति, तदिह लिङ्समभिव्याहृतो नञ् लिङर्थप्रवर्तनाविरो- थिनीं निवर्तनामेव बोधयति । विधिवाक्यश्रवणेऽयं मां प्रवर्तयतीति प्रती- तेः । तस्मान्निषेधवाक्यस्थले निवर्तनैव वाक्यार्थः । यदा तु प्रत्ययार्थस्य तत्रान्वये बाधकं तदा धात्वर्थस्यैव तत्रान्वयः । नञ्का यह स्वभाव है कि स्व ( नञ् ) समभिव्याहृत ( पासमें वर्तमान ) पदार्थका विरोधी जो है उसका बोधक होता है । जैसे 'घटो नास्ति' यहां पर अस्ति शब्दका समभिव्याहृत नञ् घटसत्त्वके विरोधी घटसत्ताभावका बोधक होता है उसी तरह लिङ्-समभिव्याहृत नञ् लिङर्थप्रवर्तनाके विरोधी अर्थात् निवर्तनाका बोधक होगा । क्योंकि जैसे विधि वाक्यके श्रवण होनेसे यह विधि मुझे यागादिमें प्रवृत्ति कराती है ऐसी प्रतीति होती है उसी तरह निषेध-वाक्य श्रवण होनेपर यह निषेध-वाक्य कलञ्ज-भक्षणसे मुझे निवृत्ति कराता है ऐसी प्रतीति होती है । इसलिये निषेध-वाक्य-स्थलमें निवर्तना ही वाक्यार्थ है । इस तरह निषेध-वाक्यस्थल में निवर्तनाको वाक्यार्थ माननेसे विधि और निषेधका भिन्नार्थत्व होता है । भक्षणाभावकर्तव्यताको वाक्यार्थ माननेसे विधि और निषेध दोनों जगह कर्तव्यता ही वाक्यार्थ होगा तो दोनोंमें समानार्थत्व हो जायगा । और समानार्थत्व अनुचित है । कहा भी है कि 'अन्तरं यादृशं लोके ब्रह्महत्याश्वमेधयोः । दृश्यते तादृगेवेह विधानप्रतिषेधयोः' यदि नञर्थ अभावके साथ प्रत्ययार्थका अन्वयमें बाधक हो तो धात्वर्थका ही अन्वय होता है । बाधकं द्विविधम् । तच्च बाधकं द्विविधम्–तस्य व्रतमित्युपक्रमो विकल्पप्रसक्तिश्च । तत्राद्यं