अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
by लौगाक्षि भास्कर
Page 73 of 84
Read in contextदीपिकाटीकासहितः। ६७ 'नेक्षेतोद्यन्तमादित्य'मित्यादौ। तस्य व्रतमित्युपक्रम्यैतद्वाक्यपाठात्। तथा चात्र पर्युदासाश्रयणम्। नञर्थ अभावके साथ प्रत्ययार्थका अन्वय होनेमें दो बाधक हैं 'तस्य व्रतम्' यह (उपक्रम) प्रकरण और विकल्पप्राप्ति। उनमें 'नेक्षेतोद्यन्तमादित्यम्' यह प्रथमका उदाहरण है (तस्य) स्नातक विशेष ब्रह्मचारीका (व्रतम्) प्रजापति- देवताक आदित्यानीक्षणसंकल्पादि जो अनुष्ठेय नियम है उस प्रकरणमें 'नेक्षेतोद्य- न्तमादित्यं नास्तं यन्तं कदाचन' इसका पाठ है यहां नञर्थ पर्युदास मानना होगा अर्थात् यहां नञर्थमें धात्वर्थका ही अन्वय होगा प्रत्ययार्थका नहीं। तथा हि—व्रतशब्दस्य कर्तव्यर्थे रूढत्वात्तस्य व्रतमित्यत्र स्नातकस्य व्रतानां कर्तव्यत्वेनोपक्रमात्। किं तत्कर्तव्यमित्याकाङ्क्षायां 'नेक्षेतोद्यन्त- मि'त्यादिना कर्तव्यर्थ एव प्रतिपादनीयः। अन्यथा पूर्वोत्तरवाक्ययोरेक- वाक्यत्वं न स्यात्। यहां पर नञर्थमें प्रत्ययार्थका अन्वय नहीं होता है क्योंकि कर्तव्य अर्थमें व्रत शब्दकी रूढि है अतः 'तस्य व्रतम्' इस वाक्यसे स्नातकके व्रतोंका कर्तव्यत्वेन उपादान है अर्थात् स्नातक ब्रह्मचारियोंका क्या कर्तव्य है ऐसी आकांक्षा होनेपर 'नेक्षेतोद्यन्तम्' इत्यादि वाक्य कर्तव्यार्थ ही कहा गया है। यदि 'नेक्षेत' इत्यादि कर्तव्यार्थ नहीं कहा जाय तो 'तस्य व्रतम्' और 'नेक्षेत' इन दोनोंकी एकवाक्यता नहीं होगी। तथा च नञर्थेन न प्रत्ययार्थान्वयः कर्तव्यार्थानवबोधात्। विध्यर्थ- प्रवर्तनाविरोधिनिवर्तनाया एव तादृशनञा बोधनात्, तस्याश्च कर्तव्यार्थ- त्वाभावात। तस्मान्नेक्षेतेत्यत्र नञा धात्वर्थविरोध्यनीक्षणसंकल्प एव लक्ष- णया प्रतिपाद्यते तस्य कर्तव्यत्वसंभवात्। 'नेक्षेत' इससे कर्तव्यार्थको ही प्रतिपादित होनेके कारण नञर्थाभावके साथ प्रत्ययार्थका अन्वय नहीं होता क्योंकि प्रत्ययार्थके अन्वयसे कर्तव्यार्थका बोध नहीं होकर विध्यर्थ प्रवर्तनाके विरोधी निवर्तनाका ही बोध होगा और निवर्तनाका कर्तव्य अर्थ नहीं होता। किन्तु निवृत्ति अर्थ होता है। इसलिये 'नेक्षेत' यहां पर नञ्से धात्वर्थका विरोधी अनीक्षण संकल्पका लक्षणाद्वारा प्रतिपादन होता है और अनीक्षण संकल्पका कर्तव्यार्थत्व संभव है।