अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
by लौगाक्षि भास्कर
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Read in contextयुक्तः । विकल्पे शास्त्रस्य पाक्षिकाप्रामाण्यापातात् । न ह्यनुयाजेषु येयजा- महमित्यस्यानुष्ठाने नानुयाजेष्वित्यस्य प्रामाण्यं संभवति, व्रीहियागानुष्ठाने यवशास्त्रस्येव । द्विरदृष्टकल्पना च स्यात् , विधिप्रतिषेधयोरपि पुरुषार्थ- त्वात् , अतो नात्र प्रतिषेधस्याश्रयणम् , किंतु नञोऽनुयाजसंबन्धमाश्रित्य पर्युदासस्यैव । पूर्वोक्त युक्तिसे निषेध्यशास्त्रका निषेधकशास्त्रसे सर्वथा बाध असंभव है अतः शास्त्रान्तरसे प्रतिषेध होने पर विकल्प ही होगा । परन्तु विकल्प उचित नहीं है । क्योंकि विकल्प होनेसे शास्त्रमें एकपक्षमें अप्रामाण्यापत्ति होगी । अनुयाजमें 'येयजामहं' मन्त्रका उच्चारण ( अनुष्ठान ) करनेसे 'नानुयाजेषु' इस शास्त्रमें प्रामाण्य कथमपि नहीं हो सकता अर्थात् जैसे व्रीहिसे याग करने पर यवशास्त्रमें अप्रामाण्य होता है उसी तरह 'नानुयाजेषु' इस शास्त्रका भी अप्रामाण्य होगा । और जैसे दर्शपूर्णमास यागमें मिथ्या नहीं बोलनेसे अदृष्टकी उत्पत्ति होती है उसी तरह विकल्प मानने से 'यजतिषु येयजामहं' इस शास्त्रमें भी यह ज्ञान होगाकि अनुयाजमें येयजामह मन्त्रके अनुष्ठानसे कोई उपकाररूप अदृष्ट होता है । एवं 'नानुयाजेषु' इस शास्त्रसे मालूम होगाकि अनुयाजमें 'येयजामह' मन्त्रका अनुष्ठान नहीं करनेसे भी उपकाररूप कोई अदृष्ट होता है इस तरह दो अदृष्टों की कल्पना करनी होगी । इसलिये यहां पर प्रतिषेधका आश्रयण अर्थात् प्रत्ययार्थका नञर्थके साथ अन्वय नहीं है किन्तु नञर्थका अनुयाजके साथ सम्बन्ध मान कर पर्युदासका ही आश्रयण है । इत्थं चानुयाजव्यतिरिक्तेषु 'यजतिषु येयजामहं' इति मन्त्रं कुर्यादिति वाक्यार्थबोधः नञोऽनुयाजव्यतिरिक्ते लाक्षणिकत्वात् । एवं च न विकल्पः । अत्र च वाक्ये येयजामहं इति न विधीयते, यजतिषु येयजा- महमित्यनेनैव प्राप्तत्वात् । किंतु सामान्यशास्त्रप्राप्त-येयजामहं इत्यनुवादेन तस्यानुयाजव्यतिरिक्तविषयकत्वं विधीयते । यद्यजतिषु येयजामहं करोति तदनुयाजव्यतिरिक्तेष्विति । तब नञ्को अनुयाजव्यतिरिक्त ( भिन्न ) में लक्षण मानकर अनुयाज भिन्न में 'येयजामह' इस मन्त्र का अनुष्ठान करना चाहिये ऐसा वाक्यार्थ बोध होगा । इस तरह करने पर विकल्प नहीं होता । 'नानुयाजेषु' इस वाक्यसे 'येयजामह' इस का विधान नहीं किया जाता है क्योंकि 'यजतिषु येयजामह' इसीसे येयजामह