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अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

by लौगाक्षि भास्कर

DevanagariHindipublished84 pages

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दीपिकाटीकासहितः। ७१ प्राप्त है। किन्तु सामान्य शास्त्र ( यजतिषु येयजामहं )-से प्राप्त येयजामहका अनुवादकर 'येयजामह'-को अनुयाजब्यतिरिक्त विषयकत्वका विधान करता है। अर्थात् अनुयाज भिन्न यागमें 'येयजामह' मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। ऐसे करनेसे कोई दोष नहीं होता है। अतः पर्युदास ही यहां उचित है। पर्युदासोपसंहारयोर्भेदवर्णनम्। नन्वेवं सामान्यशास्त्रप्राप्तस्य विशेषे संकोचनरूपादुपसंहारात्पर्युदास- स्य भेदो न स्यादिति चेन्न। उपसंहारो हि तन्मात्रसंकोचार्थः। यथा पुरोडाशं चतुर्धा करोतीति सामान्यप्राप्तचतुर्धाकरणम् आग्नेयं चतुर्धा करोतीति विशेषादाग्नेयपुरोडाशमात्रे संकोच्यते। पर्युदासस्तु तदन्यमात्र- संकोचार्थ इति ततो भेदात्। यहांपर प्रश्न होता है कि यदि पर्युदास स्थलमें भी सामान्य शास्त्रसे प्राप्तका विशेष में संकोच हो तो पर्युदास और उपसंहार में कोई भेद नहीं रहेगा क्योंकि सामान्य शास्त्रसे प्राप्तका विशेषमें संकोचको ही उपसंहार कहते हैं। इसका समाधान करते हैं कि सामान्यसे प्राप्तका विशेष मात्रमें संकोच करना ही उपसंहार होता है जैसे 'पुरोडाशं चतुर्धा करोति' इस सामान्य शास्त्र द्वारा प्राप्त पुरोडाशके चतुर्धाकरणसे 'आग्नेयं चतुर्धा करोति' इस विशेष शास्त्रसे अग्निदेवताक पुरोडाशका ही चतुर्धाकरण होता है दूसरे पुरोडाशका नहीं। पर्युदास स्थलमें सामान्यसे प्राप्तका विशेष शास्त्रसे विशेष भिन्नमें संकोच होता है इसलिये दोनोंमें बहुत भेद है। नवीनोंका मत है कि सामान्यसे प्राप्तका विशेषमें संकोच रूप जो विधि शास्त्रका व्यापार है उसे उपसंहार कहते हैं परन्तु 'पर्युदासः स विज्ञेयो यत्रोत्तर- पदेन नञ्' इस अभियुक्त वचनसे प्रत्ययातिरिक्त प्रातिपदिकार्थ अथवा धात्वर्थके साथ नञ्‌के सम्बन्धको पर्युदास कहते हैं। अतः पर्युदास और उपसंहारमें स्वरूपतः भेद स्पष्ट है। कुत्रचिद्विकल्पप्रसक्तावप्यनन्यगत्या प्रतिषेधाश्रयणम्। यथा 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाती'त्यादौ। अत्र हि 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाती'ति शास्त्र- प्राप्तषोडशिग्रहणस्य निषेधाद्विकल्पप्रसक्तावपि न पर्युदासाश्रयणम्, संभवात्। किसी स्थलमें विकल्प दोष होनेपर भी (अनन्यगत्या) पर्युदासका संभव नहीं होनेसे प्रतिषेधका ही आश्रयण होता है। जैसे 'अतिरात्रे षोडशिनं

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