अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextकी हवियों और नमस्कारों के द्वारा पूजा करते हैं. (६) सूक्त-८९ देवता—इंद्र अस्तेव सु प्रतरं लायमस्यन् भूषन्निव प्र भरा स्तोममस्मै. वाचा विप्रास्तरत वाचमर्यो नि रामय जरितः सोम इन्द्रम्.. (१) हे ब्राह्मणो! तुम इंद्र के लिए स्तोमों का गान करो. तुम मंत्र रूप वाणी के पार जाओ. हे स्तुति करने वालो! तुम इंद्र को सोमरस से युक्त बनाओ. (१) दोहेन गामुप शिक्षा सखायं प्र बोधय जरितर्जरिमिन्द्रम्. कोशं न पूर्णं वसुना न्युष्ट्मा च्यावय मघदेयाय शूरम्.. (२) हे स्तोताओ! वाणी तुम्हारी मित्र है. उस का दोहन करो तथा जो इंद्र शत्रुओं को क्षीण करते हैं, उन्हें बुलाओ. जो सोमरस धन से युक्त कोष के समान शुद्ध है, उसे इंद्र के लिए तैयार करो. (२) किमङ्ग त्वा मघवन् भोजमाहुः शिशीहि मा शिशयं त्वा शृणोमि. अप्रस्वती मम धीरस्तु शक्र वसुविदं भगमिन्द्रा भरा नः.. (३) हे इंद्र! तुम भोक्ता हो. तुम शत्रुओं को क्षीण कर देते हो. तुम मुझे क्षीण मत करना. तुम मुझे धन प्राप्त करने वाला सौभाग्य दो. मेरी बुद्धि कर्मों की ओर अग्रसर हो. (३) त्वां जना ममसत्येष्विन्द्र संतस्थाना वि ह्वयन्ते समीके. अत्रा युजं कृणुते यो हविष्मान्नासुन्वता सख्यं वष्टि शूरः.. (४) हे इंद्र! मेरे पुरुष तुम्हीं को बुलाते हैं. जो वीर तुम्हारी मित्रता की कामना करते हैं तथा हवि वाला अनुष्ठान करते हैं, वे सोमरस का संस्कार भी करते हैं. (४) धनं न स्पन्द्रं बहुलं यो अस्मै तीव्रान्सोमाँ आसुनोति प्रयस्वान्. तस्मै शत्रून्सुतुकान् प्रातरह्वो नि स्वघ्नान् युवति हन्ति वृत्रम्.. (५) हवि धारण करने वाला जो पुरुष इंद्र के निमित्त सोमरस का संस्कार नहीं करता, उस का धन सरकता जाता है. इंद्र उसे अपने शत्रुओं में सम्मिलित कर के उस पर वज्र का प्रहार करते हैं. (५) यस्मिन् वयं दधिमा शंसमिन्द्रे यः शिश्राय मघवा काममस्मे. आराच्चित् सन् भयतामस्य शत्रुर्न्यस्मै द्युम्ना जन्या नमन्ताम्.. (६) जो इंद्र हमारी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं, जिन इंद्र की हम प्रशंसा करते हैं, उन इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*